चित्र से उपचार

वीरेन्द्र व सुदेश बौरी, जुलाई 2007 English
मेरे ससुर सेवा निवृत होने के पश्चात हरिद्वार में रहने लगे थे। वह मधुमेह से पीड़ित थे - और उनके मधु की मात्रा कभी सीमा में नहीं रहती थी। यद्यपि उनके ह्रदय की चिकित्सा हो चुकी थी, फिर भी रोग बना हुआ था। उनका एक गुर्दा भी काम नहीं कर रहा था।

एक दिन फोन आया कि वह गंभीर अवस्था में चिकित्सालय में हैं। मेरी पत्नी ने रोना शुरू कर दिया। अगले फोन के पश्चात आशा टूटने लगी। उनकी अवस्था और बिगड़ गयी थी। मंगलवार का दिन था और हम गुरूजी के पास नहीं जा सकते थे। हमारा विश्वास समाप्त होने लगा। मैंने एक पुराने भक्त को फोन किया तो वह बोले कि गुरूजी को सबका ज्ञान है। इससे हमें आश्वासन मिला और हम सो पाये।

गुरुकृपा से बृहस्पतिवार को गुरूजी का एक चित्र मिला और अगले दिन ही हम हरिद्वार चले गये। चिकित्सालय में हमने स्थिति का अनुमान लगाया और मेरी पत्नी ने गुरूजी का चित्र अपने पिता को दिया। उन्होंने उसे अपने मस्तक से लगाया और अपनी कमीज़ की जेब में रख लिया। वह कभी भी गुरूजी के पास नहीं गये थे।

तुरन्त ही गुरूजी की सुगन्ध उस कक्ष में फ़ैल गयी और हम सबको आभास हुआ कि भौतिक दूरियाँ होते हुए भी वह अपने भक्तों के करीब होते हैं।

हम लौट आये और एक सप्ताह बीतने वाला था। चिकित्सक अब पेरलिटिक अटैक का अनुमान लगा रहे थे। पर चमत्कारिक रूप से सी टी स्केन स्पष्ट था। चिकित्सक अचम्भे में थे और बृहस्पतिवार को उन्होंने निर्णय लिया कि उनको निकट देख रेख के लिए एक सप्ताह और वहाँ रखा जाएगा - उस समय तक कुछ भी हो सकता था।

अगले दिन प्रातः मैं अपने कार्यालय में था। मेरी पत्नी ने फोन किया तो मेरे मन में पहला विचार आया कि 'बुज़ुर्गवार लुढ़क गये'। मेरे हाथ काँप रहे थे और मैं अपनी पत्नी की बात सुन नहीं पा रहा था। मेरी पत्नी को दोबारा कहना पड़ा कि वह चिकित्सालय से घर आ गये हैं। वह रो रही थी और गुरूजी को बार बार अपना धन्यवाद प्रकट कर रही थी। शाम को जब हम गुरूजी के पास गये तो उन्होंने कहा कि उसके पिता की स्थिति पहले से बहुत अच्छी है।

जब मेरे ससुर गुरूजी के दर्शन के लिए आये तो उन्हें गुरूजी ने एक और भेंट दी। उनकी पत्नी, मेरी सास, आर्थ्राइटस की रोगी थीं। वह अपने पति के साथ गुरूजी के पास आयीं थीं। जब वह वापिस हरिद्वार गयीं तो उन्हें आभास हुआ कि बिना हाथ में दर्द हुए वह अपने पोते के लिए स्वेटर बुन सकती थीं।

यह महिला जिन्होंने अपनी समस्या के लिए गुरूजी से विनती भी नहीं की थी, रोग से मुक्त हो गयीं थीं। गुरूजी की ऐसी दया होती है।

वीरेन्द्र व सुदेश बौरी

जुलाई 2007