"कल्याण कर दिया"

शालू दीवान, फरवरी 2012 English
हमें गुरूजी के बारे में विंग कमांडर आर्य से पता चला जो मेरे पिता के साथ एयर फोर्स में कार्यरत थे। उन्होंने हमें जलवायु टावर, गुड़गाँव के कम्युनिटी सेंटर में गुरूजी के सत्संग में, रविवार के दिन बुलाया। मेरे पिता को हमेशा से आध्यात्मिक कार्यों में रुचि रही है इसलिए वे सत्संग में चले गए। (वह परिहास में बोले कि अगर उन्हें चाय और नाश्ता मिलेगा तो वह जायेंगे और उन्हें वह मिला!) गुरूजी स्वयं वहाँ नहीं थे; वहाँ केवल एक आसान रखा हुआ था जिस पर उनकी तस्वीर थी। मेरे पिता ने जब इसके बारे में पूछा तो उन्हें कहा गया कि यह संगत का विश्वास है : गुरूजी हमेशा अपने आसान पर और अपनी संगत के साथ अपने दिव्य रूप में उपस्थित रहते हैं।

मेरे पिता गुरूजी से मिलने के लिए बहुत इच्छुक थे क्योंकि हमें उनकी सहायता की आवश्यकता थी। मेरी दीदी को मस्तिष्क पक्षघात (सेरिब्रल पाल्सी) रोग था। साल 2003 में उनकी हालत और बिगड़ गई जब वह रात को नींद में बिस्तर से गिर गईं; उसके बाद उनके लिए चलना भी बहुत कठिन हो गया था। एक साल बाद, मेरे पिता ने अपने मित्र को उन्हें एम्पायर एस्टेट ले जाने के लिये कहा और हमें गुरूजी के दर्शन प्राप्त हुए।

मुझे आज भी वो दिन याद है, साल 2004 में अक्टूबर में नवरात्रों के दिन थे। एम्पायर एस्टेट का हॉल, शान्ति और पवित्रता से भरा हुआ था और शबद चल रहे थे। हम थोड़ी देर के लिए वहाँ बैठे परन्तु लंगर किये बिना वापस जाना चाहते थे क्योंकि हमने नवरात्रों का व्रत रखा हुआ था। जैसे ही हम जाने लगे, एक संगत ने हमें लंगर करने के लिए कहा–वह बोले कि यह प्रसाद है। जब भी मैं उस दिन के बारे में सोचती हूँ तो उन कृपालु संगत का धन्यवाद करती हूँ। गुरूजी ने ही उन्हें हमारे पास भेजा था। तब हमें इस बात का एहसास नहीं हुआ कि गुरूजी ने हमें तभी आशीर्वाद दे दिया था, कुछ समय बाद यह बात स्पष्ट हो गई।

इसी समय हम हरयाणा में अपने पिता के घर, वार्षिक पैतृक पूजा के लिए गए। वापस आते समय हम दिल्ली के पास एक ढाबे पर दोपहर के खाने के लिए रुके। वहाँ से निकलने से पहले मेरे पिता ने गाड़ी की डिक्की में सामान ठीक से रखा और जैसे ही डिक्की बंद की, मेरी बहन चीख पड़ी क्योंकि उसकी उंगलियाँ बीच में आ गई थीं। मैंने तुरंत ढाबे वाले से बर्फ लेकर उसकी उंगलियों पर लगाई और फिर हम दीदी को दिल्ली कैंटोन्मेंट में बेस अस्पताल लेकर गए। मेरी माँ की चचेरी बहन, जो वहाँ मेजर हैं, दीदी को एक्स-रे के लिए लेकर गईं। एक्स-रे में कोई चोट नहीं दिखाई दी, यहाँ तक कि हेयरलाइन फ्रैक्चर भी नहीं। हमें विश्वास नहीं हो रहा था। अस्पताल जाते समय मैंने देखा भी था कि दीदी को किसी भी उंगली में सूजन नहीं आई थी–जो हड्डी टूटने का संकेत होता है–किन्तु हमें समझ नहीं आया था : दीदी को भी गुरूजी का आशीर्वाद प्राप्त था।

हम गुरूजी के यहाँ जाते रहे और मेरी दीदी धीरे-धीरे चला करती थी। उसे अपने पाँव घसीटने पड़ते थे, उसे एक सीढ़ी चढ़ने में भी कठिनाई होती और वह हर समय पीड़ा में रहती थी। जनवरी 2007 में एक सुबह माँ को गुरूजी के दर्शन हुए। उन्होंने गुरूजी को एक महिला के रूप में संगत के साथ बैठे हुए देखा। माँ दीदी के साथ उनके चरण छूने के लिए आगे गईं। उन महिला ने बायीं ओर से दीदी के बाल पकड़ कर बलपूर्वक झटका दिया। आस-पास बैठी संगत बोली : "कल्याण कर दिया।"

सुबह जब दीदी उठीं तो वह माँ से बोलीं, "मैं चल नहीं सकती। मुझे पता नहीं कैसे चलते हैं।"

दीदी के लिए एक बहुत कठिन समय शुरू हो गया। अपने बिस्तर से स्नानघर तक के पाँच सेकंड के रास्ते को पार करने में उसे आधा घंटा लगता था। वह सारा समय अत्यंत कष्टदायक दर्द में होती थी और जब हम उसे शौचालय में बिठाते तो वह दर्द से चीखती थी। अपने घुटने मोड़ना उसके लिए अत्यधिक कष्टदायी था। उसे इतना दर्द होता था कि वह चीखें मारती थी और पसीने-पसीने हो जाती थी। मेरे माता पिता एक एक कर, रात और दिन उसके साथ बैठते। चार लंबे महीने तक वह सो नहीं पाती थी और सारा समय असहनीय पीड़ा में रहती थी।

मेरे पिता उसे बहुत सारे न्यूरोफिज़िश्यंस के पास लेकर गए परन्तु उसकी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ। एक बार मैं उनके साथ दिल्ली में आर्मी के रिसर्च एंड रेफरल अस्पताल गई। दीदी के बहुत सारे चिकित्सकीय परीक्षण तथा एम आर आइ किये गए, किन्तु कोई निष्कर्ष नहीं निकला। जब मेरे पिता ने दबाव डाला कि दीदी का कुछ तो इलाज होना चाहिये तो दीदी को पेडियेट्रिक न्यूरोफिज़िश्यन (बच्चों के चिकित्सक) के पास भेजा गया। उसने कुछ एक्स-रे करवाने को कहा और दीदी के लिए बस कैल्शियम की दवाइयाँ लिख कर दे दीं। अगले दस दिनों में दीदी की हालत में बहुत ही तीव्र गति से सुधार आया।

आज भी जब मैं दीदी के इस चमत्कारी सुधार के बारे में सोचती हूँ तो मेरी आँखें भर आती हैं। दीदी जब बिस्तर पर पड़ गई थीं, उससे पहले हम केवल एक सोमवार बड़े मंदिर गए थे। मेरे पिता को दीदी को मंदिर की सीढ़ियों पर गोद में उठाकर ले जाना पड़ा था। इसके बाद हम बड़े मंदिर गुरूजी की महासमाधि के बाद गए। उस दिन, ना सिर्फ दीदी अपने आप, बिना किसी मदद के, मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ कर ऊपर गईं बल्कि गुरूजी के आगे माथा भी टेक पायी, और जो विकलांगता कुछ हफ्ते पहले लाइलाज लग रही थी, उसके अब कोई लक्षण नहीं बचे थे। दीदी के हाव-भाव बिलकुल ठीक हो गए और अब वह आराम से चल भी पाती थीं। तब मेरी समझ में आया : मेरी माँ के सपने में गुरूजी ने मेरी दीदी का कल्याण किया था।

शालू दीवान, एक भक्त

फरवरी 2012