मेरे गुरु के वचन - अनमोल रत्न

सबीना कोच्चर, मई 2012 English
मुझे वो समय याद है जब गुरूजी अपनी संगत को उनके सत्संग लिखने को कहा करते थे। वह मुझे प्रायः कहते, " और लिख। " मैं सोचती थी कि अगर मैं और अधिक लिखूँगी तो पूरी किताब भी कम पड़ेगी! अब मुझे गुरूजी के कहे शब्द, जगमग अनमोल रत्नों की तरह याद आते हैं : गुरूजी ने हमें यह भी बताया कि वह सूरज को भी नियंत्रित कर सकते हैं। सामान्यतः वह किसी भी इंसान के भाग्य में हस्तकक्षेप नहीं करते हैं, परन्तु वह चाहें तो किसी का भी भाग्य बदल सकते हैं।

गुरूजी को लोगों का पंडितों के पास जाना पसंद नहीं था। एक बार भाग्य के विषय में बात करते हुए उन्होंने कहा " लोगों को पंडितों पर बहुत निर्भर नहीं रहना चाहिए। " वह बोले, " क्या हो अगर उसे ज्ञान ही न हो तो ?" मैं सोच में पड़ गई कि गुरूजी ने हमें ऐसा क्यों कहा, जबकि हम पंडितों के पास जाते ही नहीं थे। गुरूजी ने यह भी बताया कि जन्म-रत्न (बर्थ स्टोन) समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य के लिए पहने जाते हैं, किन्तु उनसे बुरा असर भी पड़ सकता है, इसलिए नहीं पहनने चाहिए। मैंने गुरूजी से कहा कि हम में से कोई भी पत्थर नहीं पहनता, जिस पर उन्होंने स्पष्ट किया कि वह ऐसा किसी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं बल्कि एक सामान्य बात कह रहे थे। जब उनसे पूछा कि क्या वास्तव में काला जादू होता है तो उन्होंने हाँ कहा और यह भी कहा कि वह करने वाले पर ही आकर उल्टा पड़ता है।

गुरूजी ' ॐ नमः शिवाय शिवजी सदा सहाय ' मंत्र का जाप करने के लिए कहते थे।

एक बार मेरे ससुर जी ने गुरूजी से उनके उत्तराधिकारी के बारे में पूछा। गुरूजी बिलकुल स्पष्ट रूप से बोले, "पहले वि मैं, हुण वि मैं, ते बाद विच वि मैं, ऐथे कोई गद्दी नहीं चलदी। " (पहले भी मैं था, आज भी मैं हूँ और कल भी मैं ही रहूँगा, यहाँ कोई उत्तराधिकारी नहीं है।) - यह कथन आज के समय में बहुत मायने रखता है। अपने दिव्य आसान पर गुरूजी ही अनंत काल तक रहेंगे। बड़े मंदिर में 12 ज्योतिर्लिंगों की शक्ति है - यह गुरूजी ने कहा था। " जो भी यहाँ आएगा उसका कल्याण होगा ", यह उनका वचन है।

गुरूजी कहा करते थे कि संगत बहुत बढ़ जायेगी और मंदिर चाहे कितना ही बड़ा हो जाये, संगत से भरा रहेगा। गुरूजी ने ऐसा तब कहा था जब वह केवल उन्हीं से मिलते थे जिन्हें वह स्वयं चुनते थे। आज के परिपेक्ष में यह सच होता दिखाई दे रहा है।

गुरूजी कहते थे कि असली गुरु वही होता है जो अपना ढिंढोरा नहीं पीटता है। और मीडिया में गुरूजी के बारे में बात करने की किसी को भी अनुमति नहीं थी।

गुरूजी हमेशा सत्संग के महत्व के बारे में कहते थे और संगत को जो आशीर्वाद मिले हैं उनके बारे में सत्संग करने के लिए कहा करते थे। वह कहते थे कि सत्संग करने वाले का भी भला होता है और सत्संग सुनने वाले का भी भला होता है। गुरूजी ने संगत पर जो कृपा की हैं, 'सत्संग' के अतिरिक्त और कोई माध्यम नहीं है जिससे हम उनकी कृपा का धन्यवाद कर सकते हैं और वह हम सभी को करना भी चाहिए। गुरूजी नित्य कहा करते थे : " बताओ जो तुम्हारा कल्याण हुआ है। "

गुरूजी संगत को 'डायरेक्ट कनेक्शन' बनाने के लिए विशेष रूप से कहते थे। विश्वास ही आधार है। "जिसे मुझ पर विश्वास है, उसके लिए सब कुछ संभव है", यह उनका वचन था। "अगर विश्वास नहीं तो कुछ भी नहीं।"

गुरूजी उनको आशीर्वाद देते थे जो उनके पास नयी संगत लेकर आते, और जो भक्त उनकी ओर एक कदम बढ़ाते, गुरूजी उनकी ओर सौ कदम बढ़ाते। वह हमेशा कहते थे : "मैं 'प्रैक्टिकल' गुरु हूँ जो प्रवचन नहीं करता है बल्कि करके दिखाता है।"

इसलिए गुरूजी ने संगत को किसी धर्मग्रन्थ को पढ़ने के लिए नहीं कहा। अपने दैनिक जीवन के कर्तव्यों का निवर्हन करना भी पूजा ही है। गुरूजी ने मुझसे कहा था, "जीवन आसान नहीं है" परन्तु प्रार्थना से किसी भी समस्या का समाधान हो सकता है। " जो प्रार्थना करते हैं उन्हें आशीर्वाद मिलता है। "

गुरूजी कहते थे कि सबसे उच्च स्तर की पूजा तब होती है जब पति-पत्नी एक दूसरे का ध्यान रखें; दोनों मिलकर अपने बच्चों का ध्यान रखें और घर को खुशहाल और चिंतामुक्त रखें।

पंडितों से पूजा करवाना गुरूजी को कदापि पसंद नहीं था। एक बार हमारे सामने गुरूजी ने एक ग्रन्थी को यह कहते हुए डाँटा था कि रात को उन्होंने, पाठ करते हुए ग्रन्थ के कुछ पन्ने यह सोचकर छोड़ दिये कि किसी को पता नहीं चलेगा। उन्होंने इस बात की भी आलोचना की कि आजकल लोग पवित्र मूर्तियों को भी दिखावटी सामान की तरह रखते हैं। उन्होंने कहा था, "गणेश जी की सही जगह मंदिर में होती है, ना कि धरती पर किसी दिखावटी वस्तु या पत्र भार (पेपर वेट) के रूप में।"

एक बार उन्होंने हमें यह कहते हुए डाँटा था कि चर्चा करने से ईश्वर नहीं मिलते हैं : "डिस्कशन करण नाल रब नहीं मिलदा।" यह चेतावनी गुरूजी के सत्संग पर भी लागू होती है कि सत्संग उनके विषय में चर्चा करने के लिए नहीं हैं। गुरु और शिष्य के बीच की बात कोई नहीं जान सकता।

घर भी एक आध्यात्मिक केंद्र है। गुरूजी, किसी कलाकार के बारे में जाने बिना, उसकी बनाई हुई महँगी चित्रकारी घर में लगाने के विरुद्ध थे। इससे अनजाने में उस कलाकार की नकारात्मकता घर में आ जाती है। जब मैंने गुरूजी से कहा कि मेरी इतनी क्षमता नहीं थी कि मैं करोड़ों की चित्रकारी खरीद सकूँ तो वह बोले कि वह सामान्य बात कर रहे थे।

गुरूजी ने यह भी कहा कि घर में इंसानों, जानवरों और पक्षियों की मूर्तियाँ नहीं रखनी चाहिए। उन्होंने मुझसे कहा कि अगर ऐसा कुछ घर पर है तो उसे जल में प्रवाहित कर देना चाहिए, नहीं तो फेंक देना चाहिए। वह बोले कि घर को फूलों से अथवा फूलों की तस्वीरों से ही सजाना चाहिए।

गुरूजी ने कुछ रंगों के बारे में भी हमें बताया। सकारात्मकता और समृद्धि के लिए सबसे अच्छे रंग होते हैं लाल, क्रीम (दूधिया) और काला; इनके बाद आते हैं संतरी, गुलाबी, पीला, हरा, जामुनी और सफेद। गूढ़ नीला (रॉयल ब्लू) गुरु का रंग नहीं होता है और पहनने वाले पर नकारात्मकता लाता है। फिरोज़ी नीला, आसमानी नीला, और नेवी ब्लू रंग ठीक होते हैं।

"गुरु दी गल पत्थर दी लकीर, " उन्होंने कहा था। गुरु के कहे गए वचन सच होकर ही रहते हैं और संगत ने ऐसा होते हुए स्वयं देखा है।

"जानवर तो मर कर भी काम आते हैं, " गुरूजी नित्य कहा करते थे। "उनके चमड़े से जूते, बेल्ट और पर्स बनते हैं, लेकिन इंसान मरने के बाद किसी काम नहीं आता है। इसलिए भगवान को याद करना ही एक ऐसा महत्त्वपूर्ण कर्म है जो इंसान कर सकता है।"

गुरूजी कहते थे कि "बहुत अधिक पैसा होना अच्छी बात नहीं है किन्तु यदि सही तरीके से कमाया गया पैसा हो तो संसार के सभी सुख-साधनों का आनंद उठाया जा सकता है। वह कहते थे कि स्वयं प्रयास करना अनिवार्य है; केवल मरी हुई मछली ही पानी के बहाव के साथ बहती है ("ओनली डेड फिश स्विम विथ द टाइड") ।

गुरूजी हमारे अमरीका जाने और मुझे वहाँ का वीज़ा लेने के लिए विशेष रूप से कहते थे, किन्तु किसी ना किसी कारणवश यह टलता रहता, और कुछ ही समय में उन्होंने समाधि ले ली।

उनके शब्दों में जो आशीर्वाद छुपा हुआ था वह हमें अमरीका जाने के बाद पता चला। हाल ही (2012) में मुझे टाँगों में दर्द होने लगा था (यह वो दर्द नहीं था जो गुरूजी ने पहले ठीक किया था)। जैसे ही हम अमरीका पहुँचे, मेरी एक टाँग और उँगिलयों के जोड़ों का दर्द ठीक हो गया। अमरीका में, मैं एक संगत से मिली और उनके यहाँ लंगर किया, जिसके बाद मेरी दूसरी टाँग का दर्द भी ठीक हो गया और उस दिन के बाद मुझे वो दर्द फिर कभी नहीं हुआ है।

जैसा कि इस घटना से पता चलता है, लंगर का बहुत महत्त्व है। गुरूजी ने मुझे एक बार कहा था, "यह लंगर खा, यह तेरी दवाई है।"

मैंने उनके बहुत सारे आशीर्वादों का आनंद उठाया है। बहुत साल पहले उन्होंने मुझे एक वरिष्ठ माध्यमिक विद्धयालय (सीनियर सेकन्डरी स्कूल) का आशीर्वाद दिया जिसका नाम उन्होंने 'गुरूजी महाराज पब्लिक स्कूल' रखा। उन्होंने स्कूल के एक प्रारंभिक अनुभाग (प्रिपरेटरी सेक्शन) को भी आशीर्वाद दिया जिसे मैं चलाती हूँ और उसका नाम 'लिटिल पीपल्स अकैडमी' रखा है। उन्होंने मुझे शाम को बच्चों की ट्यूशन लेने को कहा और किसी भी विद्धयालय में टीचर की नौकरी करने से मना किया।

अप्रैल 2012 में मुझे उनका आशीर्वाद दोबारा प्राप्त हुआ। रविवार रात को हम खाना खाने बाहर गए जब मेरी साँस फूलने लगी। मुझे माथे पर सुइयाँ चुभने का आभास हो रहा था और मैं अपनी हथेलियाँ महसूस नहीं कर पा रही थी। मैं अपने पति को भी कुछ बता नहीं पा रही थी और वह मुझे तुरंत चिकित्सक के पास लेकर गए। मैंने गुरूजी से प्रार्थना की और अपने पति को मुझे गुरूजी के मंदिर ले जाने को कहा। जैसे ही हम मंदिर की सड़क पर पहुँचे, मेरी स्थिति में सुधार होने लगा और मंदिर के अंदर मेरी बेचैनी और दुर्बलता भी जाती रही। गुरूजी ने एक बार फिर मुझे बचा लिया।

यह गुरूजी का आदेश था कि एक गुरु को कभी चिट्ठी नहीं लिखनी चाहिए।

गुरूजी ने यह भी कहा था कि जब मंदिर में शबद चल रहे हों तो वहाँ सोना नहीं चाहिए : "कल्याण अधूरा रह जांदा है।" (कल्याण अधूरा रह जाता है)। प्रायः मंदिर में वह अपने सामने हमें नृत्य करने को कहते थे। उन्होंने मुझे बताया था कि जब संगत उनके आगे नृत्य करती है तो वे उनके पूरे शरीर का एक्स-रे करके उन्हें ठीक कर देते हैं।

एक बार जब हम गुरूजी के यहाँ अभी नये ही थे, गुरूजी ने मुझे लुधियाना जाकर, एक रात अपनी बहन के यहाँ रहकर अगली सुबह वापस आने को कहा। वापस लौटकर, जब मैं गुरूजी के यहाँ पहुँची तो उन्होंने मुझे एक-एक बात बतायी जो मैंने वहाँ की, यहाँ तक कि यह भी कि मैंने पिछले एक घंटे में क्या खाया था। गुरूजी से कुछ भी छुपा नहीं है।

गुरूजी के आशीर्वाद अनगिनत हैं। मैं तो केवल एक इंसान हूँ, जो भाग्यशाली है कि उसे गुरूजी का आशीर्वाद प्राप्त हुआ है।

सबीना कोच्चर, एक भक्त

मई 2012