सरकारी अधिकारी को न्याय

राम लखन सुधीर, जुलाई 2007 English
जब विपत्तियों का सामना करता हुआ मनुष्य समुद्र में पतवार विहीन नाव भांति घूमने लगता है, गुरूजी की कृपा उसकी रक्षा करती है। यद्यपि मैं गुरूजी को बहुत पहले से जानता था, मैंने 2000 से नियमित रूप से उनके पास जाना आरम्भ किया था। इस अवधि में मुझे उनके अनेक चमत्कारों से परिचय हुआ है, और संगत के सदस्यों से उनके अनुभव सुनने का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ है। गुरूजी के चमत्कारों का वृत्तांत सुनने के पश्चात हम सब इसी निर्णय पर पहुँचते हैं कि गुरूजी सर्वविद्यमान, सर्वज्ञाता और सर्वशक्तिशाली हैं।

गुरूजी दिव्य आश्रय के वह असीम स्त्रोत हैं जहाँ पर सबका स्वागत है। गुरूजी उस दया के भण्डार हैं जो बिना कहे और बिना बताये आपके पास आती है।

मैंने गुरूजी को बिना किसी के बताये, पहली बार आये नये अनुयायियों को उनके नाम से संबोधित करते सुना है और आगन्तुक की आँखें खुली की खुली रह जाती हैं। यह मेरी पत्नी के साथ हुआ था जब वह पहली बार गुरूजी के पास आयी थी। गुरूजी ने मेरी पत्नी का पंजाबी में "आओ प्रेमा आंटी आओ" कहकर स्वागत किया तो मैं विस्मित रह गया था। मेरे एक वरिष्ठ अधिकारी गुरूजी के पास पहली बार आये तो उनकी पत्नी, सुनन्दा, को भी गुरूजी ने उसके पहले नाम से संबोधित किया था। जब उन्होंने उसके रोग के बारे में बताया तो वह और चकित हो गयीं। सबसे बड़ा अचम्भा उन्हें तब हुआ जब उनके सम्मुख वही दिव्य पुरुष बैठे थे, जिन्हें उन्होंने पिछली रात स्वप्न में देखा था। एक अन्य अवसर पर मेरे एक घनिष्ठ सम्बंधी और उनकी पत्नी ने जब गुरूजी के पहले दर्शन किये तो उन्होंने मुस्कुरा कर प्रश्न किया, "लव मैरिज?" दम्पत्ति थोड़े शर्मा गये थे पर उन्होंने हाँ में उत्तर दिया। गुरूजी को इन सबके बारे में कैसे पता चलता है? अपनी सर्वज्ञाता प्रतिभा से।

गुरूजी की उपचार करने की क्षमता तो सर्वविदित है। उन्होंने कैंसर, सोरायसिस आदि अनेक असाध्य रोगों को ठीक किया है। निःसंतान और बाँझ महिलाओं को संतान हुई है। युवकों के अनेक उदाहरण हैं जहाँ पर उन्होंने किसी परीक्षा में उतीर्ण होने की आशा छोड़ दी थी किन्तु गुरूजी की दया से वह अति उत्तम अंकों से सफल हुए हैं। अनेक अनुयायियों को उनके आशीर्वाद से नौकरियाँ मिली हैं।

एक दिन मेरे एक मित्र, जो न्यूयॉर्क निवासी थे, गुरूजी के दर्शन के लिये आये। मेरा छोटा पुत्र शशि उनके निकट बैठा हुआ था, जब गुरूजी ने बातों बातों में कहा कि वह भी न्यूयॉर्क जायेगा। उस समय शशि दिल्ली में ही एक जापानी बैंक में कार्यरत था और उसके मन में विदेश जाने का कोई विचार नहीं था। कालांतर में शशि के मन में अमरीका में कुछ समय कार्यरत रहने के बाद एम बी ए करने का विचार उत्पन्न हुआ। वह आवश्यक परीक्षाओं में बैठा और उसने गुरूजी के आशीष के लिए विनती की। सब परीक्षाओं में उसके अच्छे अंक आये पर न्यूयॉर्क के एम बी ए विद्यालय से समाचार आने शेष थे। अंत में उस सूचना के आने पर गुरूजी का कथन सत्य सिद्ध हुआ। शशि न्यूयॉर्क गया और उसने अपना पाठ्यक्रम अति उत्तम अंकों से पूर्ण किया और अब वहीं पर जे पी मॉर्गन चेस बैंक में कार्यरत है।

मेरे संदर्भ में गुरूजी ने मुझे मेरे साथ हुए अन्याय की क्षतिपूर्ति के लिये पुरस्कृत किया। शासकीय अभिलेखों में मेरी जन्म तिथि गलत थी। प्रमाण सहित उनको सही करवाने के सब प्रयत्न विफल रहे थे। फ़लस्वरूप मुझे अपनी सेवा अवधि का लाभ नहीं मिल रहा था और मेरी पदोन्नति भी रुकी हुई थी। गुरूजी की दया से मेरे सेवानिवृत होने से पूर्व मुझे एक राष्ट्रीय आयोग का सदस्य नियुक्त किया गया जहाँ मेरी अवधि पाँच वर्ष की थी। उसे बाद में बढ़ा कर 65 वर्ष की आयु तक कर दिया गया। इस कारण मैं उसका अध्यक्ष भी बन सका। सरकार में मेरे कोई संबंध नहीं थे। यह केवल गुरुकृपा थी।

गुरूजी की सुगन्ध उनका एक अति महत्त्वपूर्ण गुण है। गुलाब के पुष्प के समान वह सुगन्ध गुरूजी की अपनी है। सिर से पाँव तक वह उस सुगन्ध से परिपूर्ण हैं। उनके शरीर का कोई भी अंग छू लेने से वह सुगन्ध हाथ में आ जाती है। इसका एक अन्य विशेष लक्षण है कि यह कहीं भी, कभी भी, जहाँ पर चाहें, आपको मिल सकती है। यह उनकी सर्वविद्यमानता का संकेत है। एक बार मुझे अपने घर के बाग़ में यह सुगन्ध आयी।

एक बार मेरे एक संबंधी को उनके घर में, एक दीवार पर टंगे हुए, सतगुरु के चित्र से वह सुगन्ध आती हुई प्राप्त हुई। गुरूजी ने अपनी एक जूती देकर हम पर अत्यंत दया की है। हमने उन्हें आदरपूर्वक घर में बने हुए लकड़ी के मंदिर में रखा हुआ है। हम उनका विशेष ध्यान रखते हैं और प्रतिदिन उसकी पूजा करते हैं। यथार्थ में हम गुरूजी की अनुपस्थिति में उन्हें गुरूजी का ही स्तर प्रदान करते हैं। यह चमत्कार ही है, कि उसे घर में आये चार वर्ष हो गए हैं, किन्तु उसमें गुरूजी की सुगन्ध अभी तक बनी हुई है। यदि आपकी गुरूजी में निष्ठा है तो उनकी वह सुगन्ध कहीं भी आ जायेगी।

एक बार मेरा बड़ा पुत्र संजय एक वर्ष के पाठ्यक्रम के लिए ऑक्सफोर्ड गया था। उसे वहाँ विद्यालय के प्रांगण में एक स्थान पर उनकी यही सुगन्ध मिली। इसकी पुनरावृत्ति मेरे छोटे पुत्र के साथ हुई जब उसे मेनहट्टन में यही सुगन्ध मिली।

गुरूजी की छत्र छाया प्राप्त होने से हमारा परिवार अत्यंत भाग्यशाली है। परिणाम स्वरुप अच्छे फल स्वतः ही मिलते रहते हैं, भले ही हम उसकी आशा न करें। इसके लिए हम गुरूजी के अत्यंत आभारी हैं।

राम लखन सुधीर, दिल्ली

जुलाई 2007