गुरुजी में विश्वास रखो: गुरुजी आप को अपनी शरण में ले लेंगे

राजश्री अग्रवाल, अक्टूबर 2015 English
मैं गुरूजी के आश्रम में पहली बार मई 2014 में गई थी। मैं रक्त के कैंसर (क्रनिक मयेलोगेनोस लेकिमिया) से पीड़ित थी, तभी एक भक्त ने मुझे गुरूजी के बारे में बताया। मुझे बताया कि गुरूजी ने बहुत लोगों के गंभीर रोगों का उपचार किया है। यह जान कर मेरी गुरूजी के पास जाने कि इच्छा प्रबल हो गयी। एक दिन मुझे अवसर तब मिला जब मेरे पति की मेहरौली में एक ऑफिस सम्बन्धी मीटिंग थी। मैं बहुत प्रसन्न थी क्यों कि मुझे आशा थी कि मेरे पति मुझे गुरूजी के आश्रम तक छोड़ देंगे।

परन्तु ज्योंही हम कार में बैठे, मेरे पति ने मुझे गुरूजी के आश्रम तक ले जाने को मना कर दिया और मुझे भी उस मीटिंग में साथ रहने को कहा। मुझे बहुत निराशा हुई और मैं कार में से यह सोच कर निकल गई कि मुझे आज तो गुरूजी के पास जाना ही है। यद्यपि मुझे रास्ते का पता नहीं था फिर भी मैं सीधा चलती गयी। वास्तव में मुझे गुरूजी के बारे में कुछ भी पता नहीं था। मैंने बहुत बार लोगों से गुरूजी के बारे में पूछा परन्तु किसी ने कुछ नहीं बताया। मैं सोचने लगी कि कहीं मेरा गुरूजी के आश्रम आने का निर्णय गलत तो नहीं था? मैंने अपनी बड़ी बहन को फ़ोन किया जिसने मुझे गुरूजी के बारे में बताया था। मेरी बहन ने मुझे प्रोत्साहित करते हुए मुझे आगे बढ़ते रहने को कहा और दबाव देकर कहा कि मुझे लंगर प्रसाद लेकर ही वापिस आना चाहिए। इस के बाद मैं सीधे चलती गई।

अचानक एक बड़ी सी कार मेरे सामने आकर रुक गयी जिसमे तीन सवारी बैठी हुई थी। उन्होंने मेरे से पूछा क्या मैं गुरूजी के आश्रम जा रही थी? वो जा रहे थे और मैं भी उनके साथ कार में बैठ गयी। हम सब शीघ्र ही गुरूजी के आश्रम पहुँच गए। मैंने गुरूजी का बहुत धन्यवाद किया और जल प्रसाद, चाय प्रसाद और लंगर प्रसाद गृहण किया। मेरे मन में चिंता होने लगी कि मैं घर वापिस कैसे जाऊंगी।

एक भक्त ने मेरे पति से संपर्क करने का प्रयास किया परन्तु उनका फ़ोन नहीं लग पाया। जिस कार में मैं गुरूजी के आश्रम आई थी उन्ही लोगों ने फिर मेरी सहायता की। मैंने उन्हें महरौली में एक होटल के पास छोड़ने को कहा। मुझे आशा थी कि मैं अपने पति से वहां मिल जाऊंगी। यधपि मैं इस स्थान से परिचित नहीं थी, फिर भी मैं उन लोगो को रास्ता बताती गयी। होटल पहुंच कर मैंने कार से उतर कर उन भक्तों का धन्यवाद किया। मुझे पूर्ण विश्वास नहीं था कि मैं अपने पति को यहाँ मिल पाऊंगी, भिर भी मैं मीटिंग स्थान की ओर जाने लगी और देखा कि मेरे पति मेरी तरफ ही आ रहे थे।

मैं गुरूजी के प्रति दिल से आभारी थी। गुरूजी के मंदिर का सफर और वापिस पति से मिलना एक चमत्कार था। अभी बहुत कुछ और बताना है, परन्तु यह एक महान शुरुआत थी। जय गुरूजी।

राजश्री अग्रवाल, एक भक्त

अक्टूबर 2015