शांति स्त्रोत का अनुयायी बना

राजेश कौशिक, जुलाई 2007 English
जया से विवाह के उपरान्त मैं गुरूजी के संपर्क में आया। उनके प्रथम दर्शन मुझे 2003 में उनके जन्मदिवस पर हुए। मेरी पत्नी के परिवार के सदस्य उनके प्रति भक्तिभाव रखते थे। मैं उनके साथ गुरूजी का आशीर्वाद लेने गया था। उनको देखकर मेरे मन में ऐसा आकर्षण हुआ कि कुछ समय बाद मैं उनके दर्शन के लिए संगत में गया।

संगत शांति का उद्गम स्थल था। गुरूजी के आने से पूर्व भी ह्रदय में शांति थी। सब उपस्थितगण शांतिपूर्वक बैठे थे, अधिकतर हाथ जोड़कर, कुछ आँखें बंद कर और कुछ पाशर्व में बज रहे भजनों में अपने सुर मिलाते हुए। वहाँ पर 100 के आसपास श्रद्धालु थे पर चारों ओर पूर्ण सद्भावना का वातावरण बना हुआ था।

गुरूजी के प्रवेश करते ही हम सब आदरपूर्वक खड़े हो गये और उनके स्थान ग्रहण करने पर खुद भी बैठ गये। हलचल समाप्त होने पर सब कुछ वैसा ही हो गया जैसा उनके आने से पूर्व था। मैं उनको देखना चाह रहा था पर उनसे निकलती ऊर्जा इतनी तीव्र थी कि उन पर दृष्टि बनाये रखना असंभव था। अपनी हार मानकर मैंने अपनी आँखें मूँद लीं। मुझे असीम निश्चिंतता और शांति का अनुभव हो रहा था। कभी - कभी वह संगत से बातें और हास्य विनोद भी कर रहे थे। तब से मैं शांति स्त्रोत का अनुयायी हो गया हूँ।

एक वर्ष बीत गया था और मन में दो चिंताएँ लगातार बनी हुईं थीं - अपने लिए एक अच्छा कार्य और अपनी बहन के लिए सुयोग्य वर। उन्हीं दिनों मुझे एक स्वप्न आया जिसमें मैं अपने ससुराल वालों के साथ एक आश्रम में गुरूजी के निकट बैठा हूँ और उन्होंने मुझे शिवलिंग दिया। जब मैंने यह स्वप्न अपनी पत्नी जया को बताया तो उसने कहा कि गुरूजी ने हमें आशीर्वाद दिया है। गुरुकृपा से कुछ दिनों में मुझे अच्छा काम मिल गया। मैं अपना नियुक्ति पत्र लेकर गुरूजी के पास गया और उनको अपनी बहन के लिए एक अच्छे वर की चिंता के बारे में बताया तो वह बोले, "मौज कर।" यह शब्द मुझे सांत्वना देने के लिए पर्याप्त थे कि गुरूजी सब ठीक कर देंगे। इस अवधि में मुझे पुत्र प्राप्ति भी हुई। कुछ समय पश्चात मेरी बहन के लिए एक अच्छा रिश्ता आया और अब वह सुख पूर्वक अपना दांपत्य जीवन व्यतीत कर रही है।

अब मैं भी अपने परिवार सहित आनन्दपूर्वक जीवन व्यतीत कर रहा हूँ। मुझे जर्मनी में कार्य मिल गया है जिसके बारे में गुरूजी ने मेरी पत्नी को दो वर्ष पूर्व स्वप्न में बताया था और उस समय हमने विदेश जाने का सोचा भी नहीं था।

राजेश कौशिक, म्यूनिख

जुलाई 2007