मिर्चीला उपचार

(स्वर्गीय) राजेन्द्र सिंह कैंथ, जुलाई 2007 English
एक मित्र से गुरूजी के बारे में सुनकर हम उनके पास पहुँचे थे। उन्होंने हमें आशीर्वाद दिया और सप्ताह में दो बार आने के लिए कहा। उस समय मैं बवासीर और मधुमेय से पीड़ित था। संगत में हमें लंगर परोसा गया जिसमें बहुत मिर्ची थी। इतनी मिर्ची देखकर मुझे भय था कि वह मेरे बवासीर रोग को और गंभीर कर देगी। किन्तु गुरूजी का लंगर होने के कारण मैंने वह खा लिया।

मैं आकर लंगर ग्रहण करता रहा और मेरी अवस्था में सुधार होने लगा। फिर एक दिन वह रोग - जिसका दस वर्षों से कोई उपचार नहीं हो पा रहा था - लोप हो गया। अब मैं घर पर भी अपने भोजन के साथ मिर्चें ले लेता हूँ।

जहाँ तक मेरे मधुमेह का प्रश्न है, उसका भोजन से पहले और बाद का स्तर 125/175 था जबकि उसका आदर्श स्तर 100/140 होना चाहिए। गुरूजी के यहाँ जब भी मैं जाता था आधा किलो मिठाई का प्रसाद खाता था। सामान्यतः मेरे मधु का स्तर बढ़ना चाहिए था किन्तु वह घट कर 91/141 हो गया।

वास्तव में आजकल मुझे घर पर भी मिठाई खानी पड़ती है जिससे मधु का स्तर अधिक नहीं गिरे। मैंने रात को इस रोग की औषधियाँ लेनी बंद कर दीं हैं और प्रातः कालीन की मात्रा कम हो गयी है। गुरूजी की कृपा ऐसी होती है।

मेरी एक और समस्या थी - मूत्र मार्ग में अवरोध। गुरूजी के पास आने से पूर्व दिल्ली के सर गंगाराम चिकित्सालय में मेरी एक साधारण सर्जरी हुई पर उसके दो माह के बाद उसमें फिर अवरोध आ गया था। उसी चिकित्सक ने कहा कि इस उपचार के पश्चात मूत्र मार्ग सिकुड़ जाता है और फिर से सर्जरी की सलाह दी। दूसरी सर्जरी भी हुई किन्तु चार - पाँच माह के बाद वह फिर से अवरुद्ध हो गया।

मैंने संगत के एक सदस्य को गुरूजी को इससे अवगत कराने की विनती की। गुरूजी ने उपाय बताया जिसको करने के उपरान्त मैं स्वस्थ हो गया। यदि अब कभी वह रोग होता है तो मैं औषधि खाकर स्वस्थ हो जाता हूँ।

हम राजौरी गार्डन के मुख्य बाज़ार में एक किराए के मकान में रहते थे। 1999 में मकान मालिक ने उसे एक भवन निर्माता को बेच दिया जो वहाँ दुकानें बनाना चाहता था। हमें वह मकान खाली करने के लिए कहा गया किन्तु तुरन्त ऐसा करना संभव नहीं था।

एक दिन मैंने गुरूजी से इसका उल्लेख किया तो वह मेरी ओर देखकर चुप रहे। मैंने पुनः उनसे विनती की तो भी वह चुप रहे। मैंने निश्चय किया कि गुरूजी उत्तर नहीं दे रहे हैं, अतः उनसे प्रार्थना करने में भलाई है।

परन्तु उनके चुप रहने का कारण अगले दिन पता लगा। अगले दिन संगत में आते हुए हम धौला कुआँ पर एक यातायात अवरोध में फंस गये और अचानक कार के ब्रेक ने काम करना बंद कर दिया। एक मिस्त्री ने आकर सहायता की और वह सही भी हो गये। किन्तु जब यह घटना घटी और जहाँ घटी, उसके लिए हम गुरूजी के आभारी हैं, अन्यथा दुर्घटना हो सकती थी। मुझे स्पष्ट हो गया कि पिछले दिन जब मैं गुरूजी से विनती कर रहा था वह इस दुर्घटना से हमारा बचाव कर रहे थे। मैं उनसे एक छोटी सी बात के लिए कृपा की आशा कर रहा था जबकि वह हमें संभव मृत्यु से बचा रहे थे।

उनकी दया वहीं पर समाप्त नहीं हुई। एक माह में हम एक नया घर खरीद कर उसमें जा सके।

प्रत्येक को आशीर्वाद

गुरूजी के प्रत्येक भक्त को आशीर्वाद मिलता है। उनसे कोई अछूता नहीं रहता है। वह भी, जिनके पास उनका चित्र है या जो उनके बारे में सुनते हैं और जो उनसे विनती करते हैं - सबको उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है।

नाभा निवासी, मेरी पत्नी के भाई, गुरचरण सिंह मान के साथ ऐसा ही हुआ। हम उन्हें गुरूजी के सत्संग सुनाया करते थे। एक दिन वह दिल्ली आये और गुरूजी ने उन्हें यह कहकर आशीर्वाद दिया कि वह प्रसन्नचित्त और आनंदित रहें। उनकी पुत्रवधु ने गुरूजी का चित्र माँगा जो उसे दिया गया। कुछ दिन के पश्चात गुरूजी ने उसे स्वप्न में दर्शन दिये। उस समय वह गर्भवती थी और गुरुकृपा से उसने एक सुन्दर पुत्र को जन्म दिया।

गुरूजी के आशीर्वाद से उत्पन्न सब बच्चे अपनी आयु से अधिक कुशाग्र बुद्धि और चंचल होते हैं। जब सौभाग्यशाली दम्पत्ति ने गुरूजी से उसका नामकरण करने की विनती की तो गुरूजी ने उसका नाम गुरभजनीत सिंह रखा। जब गुरूजी किसी परिवार को अपने संरक्षण में लेते हैं तो वह परिवार सदा सुखी रहता है।

जब गुरचरण को गुर्दों में अत्यन्त कष्ट हुआ तो उसने गुरूजी से उनकी दया के लिए प्रार्थना की। वह शीघ्र ही स्वस्थ हो गये। फिर उसको मूत्रमार्ग में पथरी के अवरोध के कारण बहुत वेदना हुई। दर्दनाशक औषधियाँ लेते हुए भी उसका शूल बना रहा। उन्होंने मुझे गुरूजी से निवेदन करने के लिए कहा। जब मैंने ऐसा किया तो गुरूजी ने केवल अपना सिर हिलाया। शीघ्र ही गुरचरण की पथरी और वेदना लुप्त हो गये।

गुरचरण के सामने एक और समस्या आई। वह नाभा में एक निजी विद्यालय चलाते थे। 2005 में पंजाब सरकार ने ऐसे सब विद्यालयों को निषेध कर दिया जिनको मान्यता प्राप्त नहीं थी। उन्होंने मुझे फोन पर गुरूजी से विनती करने के लिए कहा। हमने मंदिर में प्रार्थना की और उन्हें मान्यता के लिए आवेदन देने का परामर्श देने के साथ गुरूजी के चित्र के सामने प्रार्थना करने को कहा। शीघ्र ही गुरूजी की दया से उनके विद्यालय को सबसे पहले मान्यता प्राप्त हुई और उसमें छात्रों की संख्या में वृद्धि भी हुई।

गुरूजी सबको अपना आशीर्वाद देते हैं। उसके लिए केवल समर्पण और आस्था ही आवश्यक हैं, उनको अपनी समस्या बताने की भी आवश्यकता नहीं है। हमारे लिए जो भी आवश्यक है, वह देते हैं। साथ ही समस्याओं का निवारण भी करते हैं और अंत में वह जो भी अहितकारी होता है, उसे नष्ट कर देते हैं। इन कारणों से गुरूजी ईश्वर हैं। हम उनके दर्शन कर, उनसे कुछ कह पाने के लिए अत्यंत भाग्यशाली हैं।

(स्वर्गीय) राजेन्द्र सिंह कैंथ, दिल्ली

जुलाई 2007