श्रद्धा से अनुग्रह

परमिंदर कौर, जुलाई 2007 English
1999 में मेरे पति, कर्नल देवेन्द्र सिंह, जो दिल्ली में कार्यरत थे, को पंचकुला निवासी एक मित्र ने गुरूजी के बारे में बताया। हम उनका आशीर्वाद प्राप्त करने से खुद को नहीं रोक पाये और शीघ्र ही एम्पायर एस्टेट पहुँच गये।

उस समय हमें अनेक समस्याएँ थीं। मेरे पति के दोनों गुर्दे पट्रांसप्लांट हो चुके थे और वह अत्यंत बीमार चल रहे थे। उनके लिए सेना में कार्य करते रहना भी कठिन प्रतीत हो रहा था। हमारी पूरी जमा - पूँजी दूसरे गुर्दे के ट्रांसप्लांट में व्यय हो गयी थी जो एक सामान्य असैन्य चिकित्सालय में हुआ था, और उसके पश्चात मेरे पति का ढाई लाख रूपये का रीइम्बर्स्मन्ट क्लेम रक्षा लेखा विभाग (सी डी ए) द्वारा लौटा दिया गया था।

पहले ही दर्शन पर गुरूजी ने हमें सहर्ष प्रेम पूर्वक स्वीकार किया। हमें प्रतीत हुआ कि हमारी समस्त समस्याएँ समाप्त हो गयी हैं। गुरूजी के रूप में हमें स्वयं प्रभु और उनके स्वर्ग की प्राप्ति हुई थी। गुरूजी ने अगली बार आते हुए एक तांबे लोटा और एक चाँदी का कड़ा लाने को कहा। उन्होंने उन दोनों वस्तुओं को अभिमंत्रित किया और हमारे जीवन में उनकी दया का प्रवाह होने लगा।

सर्वप्रथम मेरे पति के स्वास्थ्य में सुधार आने लगा। उनके चिकित्सा परीक्षण सामान्य निकले और उन्होंने कार्यालय जाना आरम्भ कर दिया। फिर रक्षा लेखा विभाग ने हमारा अटका हुआ क्लेम स्वीकृत कर लिया। मुझे उस विभाग से इसकी सूचना तार से मिली। अगले दिन जब हम गुरूजी के पास गये तो उन्होंने पूछा कि क्या हमें पैसा मिल गया।

मेरे पति स्टेरॉयड्स ले रहे थे जिसके फलस्वरूप उनके हिप जॉइंट में एक नर्व अवरुद्ध हो गयी। चिकित्सक ने सर्जरी का सुझाव दिया। जब हम गुरूजी के पास गये तो उन्होंने इसके लिए मना कर दिया और कहा कि वह स्वतः ही ठीक हो जाएगी। उनके कथन के अनुसार थोड़े दिन में वह पुनः खुल गयी और आज तक सर्जरी की आवश्यकता नहीं पड़ी है।

मेरे अनुभव के अनुसार गुरूजी को कुछ भी कहने की आवश्यकता नहीं है। अपनी सभा में आये हुए प्रत्येक भक्त की आकांक्षा को वह जानते हैं। उनके साथ, अच्छा या बुरा, जो भी होता है उसका भी उन्हें ज्ञान है।

मेरे एक पुत्र और पुत्री थे परन्तु मैं एक और पुत्र चाहती थी। उनकी संगत में बैठे हुए मैंने इसकी कामना की। सर्वज्ञाता गुरूजी को इस बारे में पता चल गया। घर जाने से पहले जब मैं आज्ञा लेने उनके पास पहुँची, तो उन्होंने कहा, "ला झोली कर।" वह मुझे अपना दुपट्टा अपने सामने फैलाने के लिए कह रहे थे ताकि वह अपनी कृपा मुझ पर कर सकें। बिना जाने हुए कि वह क्या दे रहे हैं मैंने उनकी आज्ञा का पालन किया।

छः मास के बाद मुझे अपनी गर्भावस्था का अहसास हुआ। इतने दिन तक मुझे इस बारे में कुछ पता नहीं चला कि गुरूजी ने उस दिन मुझे पुत्राशीष दिया था। चिकित्सक भी अचंभित थे।

गुरूजी ने हमारी सहायता फिर की जब कुछ असामाजिक तत्वों ने कुछ राजनीतज्ञों के साथ मिलकर एक प्लाट पर हमारे आधे बने हुए मकान को हथिया लिया। उन्होंने हमें बहुत तंग किया और हम असहाय थे। जब हमने गुरूजी को इस बारे में बताया तो वह बोले कि चिंता मत करो, वह अपने आप चले जायेंगे। उनके इस आशीर्वाद के साथ ही स्थिति में परिवर्तन होने लगा। शीघ्र ही घर की चाबियाँ हमें दे दी गयीं।

गुरूजी ईश्वर हैं। वह ही हमारे सुख और आनंद के स्त्रोत हैं। हम उन्हें ह्रदय से प्रेम और धन्यवाद करते हैं। गुरूजी के पास जो भी श्रद्धा भाव से आएगा, उनके अनुग्रह का पात्र बनेगा।

परमिंदर कौर

जुलाई 2007