दीर्घकालिक कैंसर का सफाया

नरेन्द्र तनेजा, जुलाई 2007 English
गुरु मेरी पूजा, गुरु गोविंद, गुरु मेरा पारब्रह्म, गुरु भगवन्त ……

फरवरी 2005 में चिकित्सकों ने मेरी पत्नि के गर्भाशय में कैंसर का निदान किया था। रोग बहुत फैल चुका था और प्राणघातक कोषाणु फेफड़ों के पास तक पहुँच गये थे। हमने सब चिकत्सकों को दिखाया किन्तु सर्जरी के अन्यथा और कोई उपाय नहीं था। अंततः अनीता की शल्य क्रिया बम्बई चिकित्सालय में हुई। उसके पश्चात प्रति तीन सप्ताह के अंतराल में छः बार कीमोथेरेपी होनी थी।

उसी समय, ईश्वर के दूत की भांति, मेरी बहन और उसके पति, जो गुरूजी के अनुयायी थे, हमारे घर आये। उन्होंने हमें गुरूजी के बारे में बताया और उनका आर्शीवाद लेने की सलाह दी। अगले बृहस्पतिवार हम गुरूजी के दर्शन के लिए गये।

हमने हॉल में प्रवेश किया ही था कि गुरूजी ने मेरी पत्नी से बात की। उन्होंने उसे उसके नाम और घर में प्यार वाले नाम से सम्बोधित किया, "अनीता …लखनऊ वाली बबली आंटी।" हमें एकदम आश्चर्य हुआ और अनीता में विश्वास और साहस का प्रादुर्भाव हुआ। उसे प्रतीत हुआ कि उसकी सब समस्याएँ समाप्त हो गयी हैं और गुरु कृपा उस पर सदैव बनी रहेगी। गुरूजी ने अनीता को एक तांबे का लोटा लाने को कहा जिसे उन्होंने अभिमंत्रित किया। अनीता प्रतिदिन उसका जल पीती थी। कैंसर का उपचार सरल नहीं है: कीमोथेरेपी और उसके दुष्प्रभाव - बालों का झड़ना, जी मिचलाना और उदासी आदि अत्याधिक होते हैं। उसके बाल झड़ने की प्रक्रिया से, उससे अधिक, उसके परिवार वाले चिंतित थे। कीमोथेरेपी होते हुए उसने अपना धैर्य और साहस बनाये रखा। यह सब गुरुकृपा के कारण हुआ। गुरूजी भी उसे ढाढ़स देते रहते थे - उन्होंने तो उसे कह दिया कि वह स्वस्थ है और प्रतिदिन एकाध पेग व्हिस्की भी पी सकती है।

इन्हीं दिनों गुरूजी ने बताया कि हमारे पुत्र का प्रेम विवाह होगा और ऐसा ही हुआ - उसने अपनी पसंद की कन्या के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा तो वह सहर्ष मान गई। उन दोनों को हम गुरूजी के पास लाये और उनका आर्शीवाद दिलवाया।

अनीता को कैंसर हुए अब तीन वर्ष हो गये हैं। उसमें अब उस रोग के कोई लक्षण नहीं हैं और वह पुनः पहले की भाँति मिलनसार और हँसमुख है। गुरूजी ने उस पर दया कर के उसे स्वस्थ घोषित कर दिया है। समस्त परिवार के सदस्य, मित्रगण और उसके चित्सक भी, उसे सवस्थ देखकर, गुरूजी द्वारा दिये गये नव जीवन में उसे आनन्द उठाते हुए देखकर अति प्रसन्न हैं।

गुरूजी का हमारे जीवन में आगमन कितने उचित समय पर हुआ। अनीता के कैंसर का निदान हुए सात महीने ही हुए थे कि मेरे ह्रदय की तीन धमनियाँ बंद मिलीं। गुरूजी ने मेरी चिकित्सा अपनी विधि से की। यद्यपि मैं उनके पास अपनी एंजियोग्राफी के उपरान्त गया था, उन्होंने मुझे तुरन्त सर्जरी करवाने से मना कर दिया। मेरे कुछ बोलने से पहले ही उन्होंने पूछा कि क्या मैंने परीक्षण करवाया है। मेरे हाँ कहने पर उन्होंने मुझे थैलियम परीक्षण भी करवाने को कहा। उसका परिणाम आने पर मैं अत्यंत निराश हुआ। परिणाम के पश्चात उन्होंने मुझे सर्जरी करवाने को कहा। मेरे विचार से वह उचित समय की प्रतीक्षा में थे - मेरे मधुमेह के कारण उस समय विपदा की संभावना अधिक रही होगी। उस अंतराल में अनीता लगातार गुरूजी के दर्शन के लिए जाती रही। उन्होंने मुझे भी आशीष दिया और मेरे वापिस आने पर बोले कि उन्होंने हम दोनों को नव जीवन दान दिया था। यह कदाचित सत्य भी है।

अनीता बिल्कुल स्वस्थ है, मेरे पुत्र का विवाह उसकी इच्छा से हुआ है, और दोनों खुश हैं; मैं भी पहले जैसा जीवन व्यतीत कर रहा हूँ। क्या गुरूजी और उनकी दिव्य कृपा के अन्यथा यह संभव था? गुरूजी अनीता को कहते थे की वह स्वस्थ है और जीवन का आनन्द उठा सकती है।

उनके आर्शीवाद से अब हम दोनों में अधिक आत्मविश्वास, सुख - शान्ति और उल्लास है। हमें सदा उनकी उपस्थिति का आभास रहता है। हमारे लिए वह पर्मेश्वर हैं। निष्कपट आस्था के साथ उनके पास पहुँचे प्रत्येक मनुष्य को उनकी दिव्य कृपा की प्राप्ति होती है।

नरेन्द्र तनेजा, दिल्ली

जुलाई 2007