मुझे गुलाबों की सुगंध आयी

नंदिता चंदर, जुलाई 2007 English
अपने परिवार के एक घनिष्ट मित्र के माध्यम से मैं गुरूजी से 2004 में मिली। पहली बार मंदिर जाते हुए मुझे पता नहीं था कि वहां पर क्या होगा। एक हॉल में बहुत से भक्त बैठे हुए थे, गुरूजी के बहुत बड़े बड़े चित्र थे और गुरूजी स्वयं एक सिंहासन पर आसीन थे। मैंने भी जाकर गुरूजी के चरण स्पर्श किये और फिर एक दीवार के साथ जाकर बैठ गयी। हर बार जब मैं गुरूजी की ओर देखती थी, मुझे लगता था कि वह मुझे ही देख रहे हैं। मैं अपने नेत्र बंद कर सुन्दर भजनों के रस में डूब गयी। एक दो बार मैंने अपनी आँखें खोलने का प्रयास किया पर नहीं कर पायी। अचानक कुछ अनूठा हुआ: मुझे गुलाब के फूलों की सुगंध आयी! यह अर्क या अगरबत्ती से नहीं थी क्योंकि वहां पर वह वस्तुएं नहीं थीं। यह तो ताज़े गुलाबों की महक थी। उनकी सुगंध चारों ओर से लहरों की भांति आ रही थी और मैं उनके आनंद में डूब रही थी। मैंने अपनी आँखें खोलीं और देखा कि गुलाब तो कहीं नहीं थे, केवल कुछ अप्राकृतिक पुष्प रखे हुए थे। मैंने गुरूजी की ओर देखा तो वह मुझे देख रहे थे। वह बोले, "हुन दस प्रक्टिकल अए के सी?" (समझा सकती हो यह क्या था?) और मैं उसका विश्लेषण नहीं कर पायी। भला मैं कैसे उनसे प्रश्न करती?

मुझे गुरूजी के पास इसीलिए लाया गया था क्योंकि चिकित्सकों ने मेरे मस्तिष्क में ट्यूमर बताया था। वह मेरी दृष्टि की नस के ऊपर था और अधिक बढ़ने पर मैं दृष्टिहीन भी हो सकती थी। मुझे अति तीव्र औषधियां दी जा रहीं थीं - प्रतिदिन तीन ब्रोमोक्रोप्तिन। इसके कारण मैं अत्यंत व्याकुल रहती थी। मैं कार्यरत हूँ और अपना कार्य ठीक से नहीं कर पाती थी।

मैं गुरूजी के पास जाकर, शांति से बैठ कर प्रार्थना करती थी। मैं आशा करती थी कि शल्य क्रिया करवा कर ट्यूमर को निकलवा दूं और औषधियां बंद कर दूं। गुरूजी ने मेरी विनती सुन ली। औषधियों के साथ भी वह बढ़ता जा रहा था और अक्टूबर 2004 में मेरी शल्य क्रिया हुई। उन्होंने मुझसे तिथि, चिकित्सालय और चिकित्सक का नाम पूछा और बोले कि उनका आशीर्वाद मेरे साथ है और मुझे कुछ नहीं होगा। मुझे भी पता था कि अब कुछ असामान्य नहीं हो सकता है। यह एक अत्यंत जटिल शल्य क्रिया थी पर मैं प्रसन्न थी। मुझे पता था कि गुरूजी मेरे साथ हैं। मेरा स्वास्थ्य लाभ अनुमान से कहीं अधिक तीव्र गति से हुआ और कीमोथेरेपी, जो सामान्यतः दो मास के उपरान्त शुरू करनी थी, तीन सप्ताह के बाद ही आरम्भ कर दी गयी! किसी को विश्वास नहीं हो रहा था।

चिकित्सालय से बाहर आते ही मैं गुरूजी को धन्यवाद करने गयी तो उन्होंने मुझे नये जीवन पर बधाई दी। मुझे पता था कि उन्होंने मुझे नव जीवन प्रदान किया है! रेडीएशन चिकित्सा होते हुए भी मेरे ऊपर कोई दुष्प्रभाव नहीं हुआ। मैं अन्य रोगियों को स्ट्रेचर और पहिये वाली कुर्सियों पर बाहर आते हुए देखती थी। इसके विपरीत उन दिनों प्रातः मैं अपने कार्यालय का काम करने के बाद चिकित्सालय जाती थी और उसके उपरान्त बाज़ार में घूमती थी; मैं सामान्य जीवन व्यतीत कर रही थी। सब गुरूजी की कृपा का फल था। जिन दिनों मैं अपोलो चिकित्सालय में अपनी रेडीएशन चिकित्सा के लिए जा रही थी, गुरूजी ने अनेक अन्य उन रोगियों पर भी अपनी दया वृष्टि करी जिनके संपर्क में मैं आयी थी। मुझे एक नौ वर्षीय बच्चे का सन्दर्भ याद है जिसे मस्तिष्क में ट्यूमर था। उसके अभिभावकों को चिकित्सा कुछ दिनों तक रोकनी पड़ी क्योंकि उसके निर्धन पिता, जो कहीं दूर सरकारी नौकरी कर रहे थे, अवकाश लेकर आये थे। उसकी चिकित्सा में समय लग रहा था और जितना अधिक समय लगता उतना ही उनको धन का अभाव होता।

मेरे पास गुरूजी का एक लाकेट था - मैं अपने साथ सदा गुरूजी का चित्र रखती हूँ। मैंने उसकी माँ को वह लाकेट उसकी आँखों पर प्रतिदिन रखने के लिए कहा। मुझे विश्वास था कि गुरूजी उसकी सहायता अवश्य करेंगे। एक सप्ताह के बाद वह मुझे पुनः मिले। वह बालक कीमोथेरेपी के लिए वापस आ गया था और अधिक स्वस्थ दिख रहा था। उसकी माँ ने कहा कि जबसे उसने वह लाकेट उसके ऊपर प्रतिदिन प्रातः रखना आरम्भ किया वह अच्छा होने लगा है और चिकित्सक भी उसका स्वास्थ्य लाभ देख कर अचंभित हैं।

जब मेरा बेटा ढ़ाई वर्ष का था (मेरी चिकित्सा के तुरन्त बाद), हमें पता लगा कि शौच करते हुए उसमें रक्त भी आ रहा है। परीक्षण करवाये गये। उसके बाद हमें बताया गया कि उसके मलाशय की शल्य क्रिया होगी जिसमें 45 मिनट से एक घंटे तक का समय लगेगा। बाहर प्रतीक्षा करते हुए मैं गुरूजी से यही विनती करती रही कि वह अन्दर जय के साथ रहें। उस प्रक्रिया में तीन घंटे लग गये! जब चिकित्सकों ने हमें अन्दर बुलाया तो वह चिंतित थे। इतनी देर लगने का कारण उनको मिली दूषित फुंसियाँ थीं जिनकी बाओप्सी करवानी थी।

उन चार दिनों में मैं अत्यंत व्याकुल रही। मैं गुरूजी से हर समय उनकी कृपा के लिए ही प्रार्थना करती रही। गुरूजी ने जय को आशीर्वाद दिया। परिणामों में कुछ विशेष नहीं निकला, केवल साधारण संक्रमण, जो एक सप्ताह की औषधि से चला गया। उस घटना को अब हम भूल गये हैं।

गुरूजी ने सदा मेरी कामनाएँ पूर्ण करी हैं - भले ही वह भौतिक हों या स्वास्थ्य सम्बंधित। गुरूजी के पास जाने पर उनको पता चल जाता हैं कि हमें किस वस्तु की आवश्यकता है, हम उसके प्रति अनजान रहते हैं - वह दोनों प्रदान करते हैं। उनको कुछ भी कहने की आवश्यकता नहीं है।

मैं उनके बारे में पूरे दिन बैठ कर लिख सकती हूँ कि उन्होंने हमारे लिए कितना कुछ किया है। पर जैसा वह स्वयं कहते हैं, "शॉर्ट में सुनायीं।" हम सब पर दया करने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद।

नंदिता चंदर, गुड़गाँव

जुलाई 2007