दशक बाद पुत्र रूपी आशीर्वाद की प्राप्ति

मीनू शर्मा, जुलाई 2007 English
मुझे गुरूजी के दर्शन 2001 में हुए। जब गुरूजी ने मेरे पुत्र, शान्तनु की मिर्गी की बीमारी ठीक करी। उसी समय से हमारी बढ़ती हुई माँगों में एक और माँग जुड़ गई - कि गुरूजी, गीता (मेरी छोटी बहन) को एक बच्चे का आशीर्वाद दें। गीता का विवाह 1995 में हुआ था और अभी तक उसकी कोई संतान नहीं थी।

गीता कनाडा में रहती है। वह पहले कनाडा और उसके बाद भारत में पिछले पाँच सालों से अनुर्वरता चिक्तिसालयों (इन्फर्टिलिटी क्लिनिक) में इलाज करा रही थी। जिसके परिणाम संतोषजनक नहीं आ रहे थे। गुरूजी ने मुझे : उससे सोमवार का व्रत रखने और कोई एक फल, जो उसके लिए छोड़ना आसान हो त्यागने को बोला। मैंने गीता को यह बात बतायी और उसने अमरूद खाना छोड़ दिया - जो उसे पसंद भी नहीं था।

व्रत रखने के कुछ ही महीनों में वो गर्भवती हुई जिससे सारा परिवार बहुत प्रसन्न था। पर गुरूजी की माया – एक पार्टी में उसने गलती से अमरूद खा लिया, जिसके बारे में उसने मुझे तुरंत फोन करके बताया। किन्तु, कुछ ही हफ्तों में उसका गर्भपात हो गया और उसने बच्चे को खो दिया।

जब मैंने यह बात गुरूजी को बतायी तो उन्होंने गीता को शिवरात्रि पर, जो बस एक ही सप्ताह बाद थी, आने को कहा। गुरूजी के आशीर्वाद से वह दिल्ली आ पाई। गुरूजी ने यह कहकर कि उन्होंने उसे आशीर्वाद दे दिया, कनाडा वापस जाने को कहा।

कनाडा लौटकर भी उसने व्रत रखना जारी रखा। इस तरह एक साल व्यतीत हो गया, और एक दिन अचानक साल 2005 में, गुरूजी ने मुझसे पूछा कि - क्या मेरे पास गीता की कोई तस्वीर है। जोकि उस समय मेरे पास नहीं थी। तो उन्होंने मुझे अगली बार उसकी तस्वीर लेकर मंदिर आने को कहा।

इस बात के करीब एक महीने के अंदर ही गीता ने मुझे फोन पर बताया कि वह गर्भवती थी, किन्तु तब तक इस बात की पुष्टि उसकी चिकित्सक ने नहीं की थी। चिकित्सक ने शीघ्र ही उसकी बात की प्रमाणित कर दी। 22 मई 2006 को गीता ने एक स्वस्थ पुत्र को गुरूजी के आशीर्वाद स्वरूप जन्म दिया।

यह केवल गुरूजी के आशीर्वाद से ही सम्भव हो पाया था क्योंकि चिकित्सक उसके लिए कुछ नहीं कर पाए थे। इससे यह बात भी स्पष्ट होती है कि जन्म और मरण, दोनों गुरूजी के हाथ में हैं।

मीनू शर्मा, एक भक्त

जुलाई 2007