आस्था की दृष्टि से

ललित माथुर, फरवरी 2006 English
ॐ नमः शिवाय, शिवजी सदा सहाय
ॐ नमः शिवाय, गुरूजी सदा सहाय

गुरुजी के चरण कमलों में मेरा सादर नमन। अपने जीवन में हुए समस्त चमत्कारों के लिए भरे मन से मैं गुरुजी को सम्मान एवं आभार प्रकट करती हूँ। हम उनके अत्यंत कृतज्ञ हैं क्योंकि उन्होंने हमें अपनी छत्रछाया में स्वीकार किया है। वह ईश्वर के अवतार हैं, शिव के मूर्त स्वरूप और साथ ही अत्यंत मानवीय, मिलनसार, उदार दिव्य ऊर्जा हैं जो हमारा सही मार्गदर्शन कर, झूठे रीति-रिवाजों और रूढ़ीवाद से उठने को प्रेरित करते हैं। उन्होंने हमें जीवन, धर्म और आस्था को समझने का एक विभिन्न अर्थ प्रदान किया है। सब कुछ अति सहज हो गया है।

बहुत सौभाग्यशाली है वह दिन जब हम पहली बार गुरुजी की शरण में पहुँचे थे। जब पहली बार मेरे पिता उनके पास गये थे, उन्होंने हमारे बारे में प्रश्न किया था। उन्हें पता था कि मेरे पति कहाँ पर कार्यरत हैं और मेरी बेटी को क्या रोग है - रूबेला सिंड्रोम। यह अप्रैल 1995 की घटना है। मैं प्रसन्न हो गयी।

मेरी गर्भावस्था के पहले तिमाही में मुझे जर्मन खसरा हो गया था। अतः अदिति को जन्म से ही अनेक समस्याएँ थीं जिसके कारण उसमें दृष्टि दोष था - जन्मजात मोतियाबिंद के कारण उसे लघु ओप्थेल्मिया, लघु शुक्ल, निस्तेग्मस और अधिमंथ जैसी जटिल समस्याएँ उत्पन्न हो गयीं थीं। अपने छोटे से जीवन के प्रथम दो वर्षों में उसकी आँखों की पाँच शल्य क्रियाएँ हो चुकी थीं - तीन मोतियाबिंद के लिए और शेष दो अधिमंथ के लिए। इतना सब कुछ होने के बाद भी उसकी दृष्टि में कोई विशेष सुधार नहीं आया था। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के चिकित्सकों को भी कोई विशेष आशा नहीं थी। उनके अनुसार, क्योंकि उसका दृष्टिपटल क्षतिग्रस्त था, वह कभी भी पूरी तरह से स्पष्ट देख पाएगी, इसकी संभावना बहुत कम थी।

इस दृष्टि दोष के अलावा उसके हृदय की एक धमनी, जो जन्म के बाद बंद होनी चाहिए थी, बंद नहीं हुई थी; अतः उसे पी डी ए नामक रोग भी था। यह उसके तीसरे वर्ष में शल्य क्रिया द्वारा ठीक किया गया। इन सब समस्याओं के कारण उसका विकास बहुत धीमी गति से हो रहा था। शारीरिक व्यायाम प्रक्रियाओं की सहायता से उसने तीन वर्ष की आयु में चलना प्रारम्भ किया तो हमने उसे स्कूल भेजना आरम्भ कर दिया। मनोवैज्ञानिक परीक्षणों से पता लगा कि उसका बौद्धिक स्तर केवल 70 से 79 की श्रेणी में है। मनोवैज्ञानिक ने उसे मंदबुद्धि छात्रें को पढ़ाने वाले विशेष अध्यापकों की देख रेख में रखने का प्रस्ताव दिया।

गुरुजी के पास आने के पश्चात् यह सब नाटकीय ढंग से परिवर्तित हो गया। उस समय अदिति बारह वर्ष की थी और साधू वासवानी स्कूल के विशेष विभाग में पढ़ती थी। अपने पिता के माध्यम से गुरुजी का आदेश प्राप्त करने के उपरान्त हम ग्रेटर कैलाश में गुरुजी के मंदिर पहुँचे। यह एक अनोखा अनुभव था। हमने कभी ऐसे मनमोहक और स्वयं की ओर आकर्षित करने वाले गुरु नहीं देखे थे। गुरुजी हमें कुछ विशेष दिनों को ही आने को कहते रहे। उनके पाँचवे दर्शन के अवसर पर उन्होंने अदिति को प्रतिदिन प्रातः सूर्य नमस्कार करने और दूध में मूंगफली और उनके द्वारा अभिमंत्रित मिश्री डाल कर पीने को कहा। यह 51 दिन तक करना था। इक्कीसवें दिन उसने कहा कि उसकी दृष्टि में सुधार है। हम अति आनंदित थे। शीघ्र ही गुरुजी चंडीगढ़ चले गये जहाँ वह तीन वर्ष रहे। हमने दो बार उनके पास जाकर अदिति के लिए कुछ करने का निवेदन किया तो उन्होंने उत्तर दिया कि वह दिल्ली वापस आकर उसे स्वस्थ करेंगे।

1998 को बैसाखी के दिन, जब गुरुजी का फोन आया और उन्होंने उस दिन शाम को सुल्तानपुर में स्थित एम्पायर एस्टेट में आने के लिए कहा, तो मेरी प्रसन्नता का ठिकाना नहीं रहा। उसके बाद मैं बार- बार उनसे अदिति का उपचार करने का आग्रह करती रही।

उन्होंने किया - पर अपने ढंग से। जून 1998 में एक दिन वह हमारे घर आये। अगले दिन ही हम पुनः आनंदित हुए जब अदिति समाचार पत्र और अपनी दसवीं कक्षा की पुस्तक के छोटे अक्षर भी पढ़ पाई, जो पहले नहीं कर पाती थी। यह दिव्य हस्तक्षेप नहीं तो और क्या है? ऐसा चमत्कार तो केवल ईश्वर से ही संभव है। उसके बाद अदिति के सब भौतिक परिमाणों में भी अभूतपूर्व वृद्धि हुई। उसने दसवीं, बारहवीं और स्नातक के प्रथम वर्ष की परीक्षाएँ प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करी हैं और अब वह समाज विज्ञान में स्नातक कर रही है। जीवन के वह काले बादल अब छंट गए हैं।

तेरह वर्ष पूर्व हमें विश्वास नहीं था कि वह यह सब करने में सक्षम हो पाएगी। गुरुजी के आशीर्वाद से अदिति में अत्याधिक सुधार हुआ है। न केवल उसकी दृष्टि, दोनों दूर और निकट की, बहुत अच्छी हो गयी है, उसकी स्मरण शक्ति भी बहुत उन्नत हुई है। दो मास पूर्व जब उसका दृष्टि परीक्षण हुआ था तो वह एक और पंक्ति पढ़ पाई थी।

अदिति अब एक आत्मविश्वासी किशोरी है। मेरे लिए इसका क्या अर्थ है? उसके भविष्य की चिंता छोड़ कर मुझे विश्वास हो गया है कि गुरुजी उसका ध्यान रखेंगे। मुझे अब शांति प्राप्त हो गयी है और मैंने संसार से प्रश्न करना छोड़ दिया है, "मैं क्यों? मेरी प्रथम संतान के साथ ही ऐसा क्यों हुआ?" गुरुजी ने न केवल हमारे जीवन परिवर्तित कर दिये हैं, उन्होंने हमें साहस और शक्ति से जीवन की समस्याओं का सामना करना सिखाया है। उनमें आस्था होने के कारण हमें विश्वास है कि उनकी छत्रछाया हमारे ऊपर बनी हुई है और कुछ प्रतिकूल नहीं हो सकता है।

मृत्यु को धोखा - तीन बार

गुरुजी की कृपा के पात्र मेरे परिवार के अन्य सदस्य भी रहे हैं। उन्होंने मेरे पति को तीन बार मृत्यु का ग्रास बनने से रोका है। पहली बार वह जिस टैक्सी में यात्रा कर रहे थे वह सीधे जाकर एक अशोक लेलेंड ट्रक से टकरा गयी। उसकी अवस्था इतनी विकृत हो गयी थी कि देखने वालों ने सोचा कि कोई भी यात्री जीवित नहीं बचा होगा। दुर्घटना से कुछ ही पल पूर्व उन्हें झपकी आ गयी थी; फिर भी उनको केवल भौंह, ठोड़ी और एक दांत पर थोड़ी सी चोटें आयीं और वह बच गये। उनकी भौंह और ठोड़ी पर कुछ टाँके अवश्य लगे। आश्चर्यजनक रूप से उन्होंने वारंगल से अपनी यात्रा आरम्भ करने से पूर्व शिव मंदिर में जल अर्पित किया था और विशेष पूजा की थी, जो साधारणतः वह ऐसे अवसरों पर नहीं करते। फिर क्या हम कहते नहीं हैं कि गुरुजी ही शिव हैं?

13 दिसंबर 2001 को जब आतंकवादियों ने संसद भवन पर आक्रमण किया था, तो मेरे पति उससे कुछ क्षण पूर्व प्रवेश करने वाले अंतिम व्यक्ति थे। उनके घुसने के तुरन्त बाद गोलियों की ध्वनि से वातावरण गूँज उठा और जिस सुरक्षा कर्मचारी ने उनको प्रवेश करवाया था उसकी भी मृत्यु हो गयी। निश्चित रूप से गुरुजी मेरे पति की रक्षा कर रहे थे।

तीसरा अवसर श्रीनगर के गोल्फ मैदान में आया। अँधेरा होने के बाद मेरे पति के मन में वहाँ टहलने का मूर्खतापूर्ण विचार आया और वह घूमने निकल पड़े। एक मोड़ पर उन्हें लगा कि उन्होंने एक कुत्ते को थोड़ी दूरी पर देखा है। वह आश्चर्यचकित थे कि इतनी सुरक्षा होते हुए कोई आवारा कुत्ता कैसे प्रवेश कर सकता है कि उसी समय उस प्राणी ने उनमें रुचि दिखाकर उनकी ओर बढ़ना शुरु कर दिया। तब उन्हें आभास हुआ कि पूँछ हिलाता हुआ वह प्राणी पूर्ण विकसित तेंदुआ है। वह अपने स्थान पर जड़ हो गये। उन्होंने उसे जाने का संकेत दिया और अविश्वसनीय रूप से उस तेंदुए ने उनकी आज्ञा का पालन किया! जब वह वहाँ से चले तो उसे तेंदुए ने मेरे पति का पीछा भी नहीं किया। गुरुजी द्वारा रक्षा का एक और स्पष्ट प्रमाण।

गुरुजी ने न केवल मेरे पति की जीवन रक्षा की है, उनकी वृत्ति पर भी दया की है। उन्हीं के आशीर्वाद से मेरे पति को पदोन्नति और स्थानान्तरण मिले। त्रुटिहीन रिपोर्ट होते हुए भी मेरे पति की उन्नति में बाधाएँ थीं। केवल गुरुजी के आशीर्वाद से उनको सचिव श्रेणी में स्थान मिला और दिल्ली आने से पूर्व वह श्रीनगर जैसे प्रमुख स्थान में रहे।

1997 में मेरा पुत्र एक मोटर साईकल के पीछे बिना हेलमेट के यात्र कर रहा था कि एक तेज़ी से जाती हुई कार से दुर्घटना हो गयी। उस समय कुछ भी हो सकता था, जैसे गंभीर चोटों के कारण गर्दन की मोच या पक्षाघात। चमत्कार से वह थोड़ी सी चोटों के साथ बच गया। जब स्वस्थ हो कर मेरा बेटा गुरुजी के पास गया तो उन्होंने उसे बताया कि उन्होंने उसकी जीवन रक्षा की थी।

पान के पत्तों से श्वसनी ऐंठन का उपचार

मुझे भी गुरुजी ने अपने स्नेह से वंचित नहीं रखा है। बीस वर्ष से मुझे अस्थमा के दौरे पड़ते रहे थे और मैं अक्सर स्टिरोइड की गोलियाँ खाती थी। मैंने सदा गुरुजी से अपने बच्चों के लिए आशीष माँगा था पर अपनी समस्या उनके सम्मुख कभी प्रकट नहीं की थी। तीन वर्ष पूर्व मुझे अचानक आभास हुआ कि मेरा श्वास रोग समाप्त हो गया है। गुरुजी ने बताया कि उन्होंने मुझे स्टिरोइड से मुक्त कर दिया है, जो सत्य है क्योंकि उसके बाद मुझे कभी उनकी आवश्यकता ही नहीं पड़ी है।

तीन ग्रीष्म ऋतुओं से मुझे हल्का ज्वर रहने लगा था जो छः मास तक रहता था और मुझे शक्तिहीन कर देता था। रक्त परीक्षण कैंसर या तपेदिक की ओर संकेत दे रहे थे। चिकित्सकों ने अन्य अनेक परीक्षण करवाने को कहा था। मेरे पति ने मेरी समस्या का उल्लेख गुरुजी से किया तो उन्होंने प्रतिदिन अभिमंत्रित पान के पत्ते सिर के नीचे रख कर सोने को कहा। कुछ ही दिन में मेरा ज्वर कभी वापस नहीं आने के लिए विलीन हो गया।

स्वप्न दर्शन

अपने परिवार पर गुरुजी की दयावृष्टि का मैं लगातार वर्णन कर सकती हूँ। उन्होंने मेरे माता और पिता को कैंसर से मुक्त किया है। मेरे पिता उनके पास 1995 में अपनी कैंसर की शल्यक्रिया के पश्चात् गये थे। उसके बाद उन्हें कभी यह रोग नहीं हुआ, यद्यपि परिवार में उसकी अनेक दुखद घटनाएँ हुई हैं। मेरी माँ को उनकी शल्यक्रिया के पश्चात् कभी कीमोथेरेपी की आवश्यकता नहीं पड़ी। शल्यक्रिया की पूरी अवधि में उन्हें लगा कि गुरुजी ने उनका हाथ पकड़ा हुआ है। गुरुजी के दर्शन के समय उन्होंने उन्हें एक गुलाबी और स्वर्ण रंग की साड़ी भी दी।

गुरुजी ने अक्सर हमें स्वप्न में दर्शन दिये हैं। एक बार मेरे पुत्र आशुतोष को स्वप्न आया कि गुरुजी के दर्शन करते हुए उन्होंने उसे अपने साथ बड़े मंदिर में चलने के लिए कहा। जब किसी कारणवश गुरुजी वहाँ नहीं गए तो हम वापस घर आ गए। गुरुजी ने आशुतोष से उसके फोन पर बात कर के प्रश्न किया कि हम बड़े मंदिर क्यों नहीं गए। फिर उन्होंने कहा कि वह उसे कुछ दिखायेंगे। उसके बाद जो हुआ वह दिव्य दर्शन हैं। उसने हमारे प्रांगण में अपने से दूर जाती एक भव्य आकृति देखी। जानने को उत्सुक कि वह कौन है, उसे शिव की जटाएँ और त्रिशूल दिखायी दिये। फिर वह आकृति उसकी ओर मुड़ी। फिर शिवजी ने पहले हनुमान और उसके बाद गणेश के रूप धारण कर लिए। हमारे पुत्र को वास्तव में आशीष प्राप्त हुआ है।

गुरुजी ने जो कुछ भी हमारे लिए किया है उसके लिए मैं उनका आभार और कृतज्ञता प्रकट करने में असमर्थ हूँ। जब उन्होंने हमें संरक्षण दिया, तब चिकित्सकों ने अदिति को पूर्ण स्वस्थ करने में अपनी असमर्थता व्यक्त कर दी थी। उसका रोग निवारण उनकी दिव्य शक्तियों का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।

शब्द गुरुजी की महानता व्यक्त नहीं कर सकते। उन्होंने हमारा जीवन परिवर्तित कर दिया है - आस्था से ऊर्जा और स्फूर्ति प्रदान की है; हमें वातावरण के प्रति अधिक सहनशील बनाया है; स्थितियों को स्वीकार करना सिखाया है और हम में साहस और शक्ति का समावेश किया है। वह छप्पर फाड़ कर देते हैं और बदले में मात्र पूर्ण, निर्विवाद आस्था की आशा करते हैं। हमें अपने जीवन का नवीन अर्थ मिला है। उन्होंने हमें प्रचुर मात्रा में आगे बढ़ने की आशा, दृढ़ता और सामर्थ्य भी दिया है। उन्होंने हमें सुयोग्य मानव बना दिया है।

मेरा विश्वास है कि वह परमात्मा के अवतर हैं - उन्हें चाहे किसी भी नाम, जैसे शिव, कृष्ण या गुरु नानक से पुकार लें - वह तो एक रूप में ही सब हैं। हमारे जीवन के सब चमत्कार दिव्य शक्ति से ही संभव थे। मैं सदा उनकी शरण में रहने की विनती करती हूँ। वह अनुयायी धन्य हैं जो बिना किसी इच्छा से उनकी सेवा करते हैं। उनके परिवार में, उनकी छत्रछाया में सब एक समान हैं। वह सबको अनुभव, सुख और दुःख बँटवा कर, जैसा एक परिवार में सदा होता रहा है, सच्ची नम्रता और दीनता का पाठ देते हैं - वास्तव में हम उन्हें इस विशाल ब्रह्माण्ड में मानव ब्रह्म के रूप में देखते हैं।

गुरुजी के बारे में इतना कुछ कहना अभी भी शेष है - मुझे अपना यथास्थान दिखाने की उनकी अनोखी शैली, "मंगा न कर" या "यूँही तुरदी फिरदी है पंडिता दे कोल" से लेकर उनकी रहस्यमय, मधुर दिव्य मुस्कान या फिर घर में अचानक वह सुगन्ध जो उनकी प्रत्यक्ष उपस्थिति की ओर संकेत देती है। फिर वह ॐ जो अचानक ही पहले घर में उनके सब कैलेंडरों पर प्रकट हुए और उसके पश्चात् घर के पूरे फर्श पर सैंकड़ों की संख्या में छपे हुए दिखायी दिये कि समझ नहीं आ रहा था कि चलते हुए कहाँ पर पाँव रखें। जब मैंने उनसे इसका उल्लेख किया तो वह बोले, "देखदी चल"। फिर एक बार उनके द्वारा अभिमंत्रित ताम्र लोटे के जल का स्वाद उसी अमृत सा हो गया था, जो उन्होंने उससे पूर्व चखाया था।

गुरुजी की सबसे प्रमुख बात है कि उनसे सहजता से, बिना झिझक बात की जा सकती है। ऐसी चिंता कभी नहीं हुई या ऐसा प्रतीत हुआ हो कि उन्होंने हमारी बात नहीं सुनी और हमारी किसी समस्या का समाधान नहीं किया हो। विश्वासपूर्वक मैं यह निष्कर्ष निकाल सकती हूँ कि किसी को अपने कष्ट बताने की भी आवश्यकता नहीं है। विनती है कि वह हमें सदा अपने संरक्षण में बनाये रखें।

ललित माथुर, दिल्ली

फरवरी 2006