माँ के आंसू पौंछे

कँवर लाल, जुलाई 2007 English
1998 में लाल परिवार का सब कुछ बदल गया। दिल्ली छावनी क्षेत्र में उनके बड़े पुत्र की दुर्घटना में मौत हो गयी थी और श्री कँवर लाल की पत्नी इस मानसिक आघात से बहुत विचलित हो गयीं थीं।

फिर परिवार के एक मित्र, श्री प्रेम सिंह, सिंगापुर में भारत के भूतपूर्व राजदूत, अचानक एक दिन उन्हें मिले। स्वाभाविक रूप से उन्होंने परिवार के बारे में पूछा तो उन्हें इस विपदा की सूचना भी दी गयी। लाल परिवार से अनभिज्ञ, प्रेम सिंह गुरूजी के अनुयायी थे और उन्होंने उन्हें गुरूजी से मिलने की सलाह दी।

कँवर एम्पाएर एस्टेट में एक दिन सुबह पहुंचे और उन्होंने राजदूत का परिचय पत्र दिखा कर गुरूजी से मिलने की इच्छा व्यक्त करी। द्वार पर ही एक भक्त, सुदामा, ने उनको रोका और कहा कि यह गुरूजी से मिलने का समय नहीं है और वह शाम को आयें। कँवर ने पुनः कर सुदामा को वह कार्ड गुरूजी को दिखाने को कहा। पर सुदामा अप्रभावित रहे और व्यथित पिता को बोले कि गुरूजी की संगत शाम को होती है, उसमें अनेकों राजदूत आते हैं, अतः वह भी शाम को ही आयें। कँवर वापस चले गये और उन्होंने अपने मित्र से बात करी तो उन्होंने भी शाम को जाने को कहा। संध्या को कँवर को उनके मित्र, प्रेम सिंह, एम्पाएर एस्टेट के बाहर प्रतीक्षा करते हुए मिले और वह दोनों अन्दर गये। गुरूजी ने कँवर को अपनी व्यथा व्यक्त करने का अवसर दिया। पत्नी के उपचार के लिए उन्होंने अभिमंत्रित ताम्बे के लोटे से जल ग्रहण करने को कहा। फिर, जैसे सदा होता आया है, वह जल ग्रहण कर कँवर की पत्नी 15 दिन में ही स्वास्थ्य की राह पर चल पड़ीं। उन्होंने रोना बंद कर दिया, उनका निम्न रक्त चाप सामान्य हो गया और उन्हें स्वस्थ प्रतीत होने लगा।

मई 2000 में परिवार ने गुरूजी के पास आना आरम्भ कर दिया।

परिवार कुछ दिनों के लिए मनाली गया था। जब वह वापस दिल्ली आये तो कँवर को पता लगा कि उन्हें स्थानांतरित कर नया कार्य सौंप दिया गया है। अब उन्हें अंतर्राष्ट्रीय विमान पतन छोड़ कर 15 जुलाई से नई दिल्ली में सीमा शुल्क भवन में बैठना पड़ेगा। सतगुरु के पास जाने पर उन्हें पुनः छुट्टी पर जाने का सुझाव मिला। यह घटना 24 जून 2000 की है। उस समय तक कँवर के मन में गुरूजी के लिए पूर्ण विश्वास जागृत नहीं हुआ था - ऐसा वह अब कहते हैं। उनकी अवहेलना करते हुए कँवर ने कार्यालय जाना आरम्भ कर दिया। उसी सप्ताह सीमा शुल्क विभाग के 48 अधिकारियों के विरुद्ध कार्यवाही आरम्भ कर दी गयी। कँवर भी उनमें से एक थे। यदि उन्होंने गुरूजी का कहा माना होता तो उनका नाम नहीं आता।

कँवर ने यह समस्या पुनः गुरूजी के समक्ष व्यक्त करी तो सर्वज्ञाता ने उन्हें चिंतामुक्त रहने के लिए कह कर एक और समस्या की ओर उनका ध्यान आकर्षित किया: उनकी बेटी का विवाह। कँवर को संतोष तो नहीं हुआ पर तथ्यों से स्पष्ट होता है कि उनकी चिंता निराधार थी। 48 नामांकित अधिकारियों में से 33 के विरुद्ध कार्यवाही हुई। सूची क्रम में कँवर और उनके नीचे के समस्त अधिकारियों का नाम नहीं लिया गया। तत्पश्चात उन 33 अधिकारियों पर अभियोग लगाते समय भी कँवर का नाम कहीं नहीं था।

विवाह के लिए गुरूजी मध्यस्थ बने

गुरूजी के कहने पर कँवर ने अपनी बेटी के लिए वर ढूंढना आरम्भ कर दिया। भारतीय तेल निगम के एक यांत्रिक इस सम्बन्ध के लिए उचित लगे थे और परम्पराओं के अनुसार अपने माता पिता के साथ उनके यहाँ आ रहे थे। उस अति महत्वपूर्ण भेंट से पूर्व, गुरूजी ने, कँवर को बुला कर, वर के पिता को सफ़ेद रसगुल्ला खिलाने को कहा।

लड़के के माता पिता के लिए अति सुन्दर भोजन परोसा गया। उसके बाद पहले कँवर, फिर उनकी पत्नी और अंत में उनके पुत्र ने वर के पिता को रसगुल्ले प्रस्तुत किये। पर हर बार, जिसके कारण सतगुरु को ही ज्ञात होंगे, उन्होंने मना कर दिया। कँवर के परिवार को अब तक गुरूजी के तौर-तरीकों से पता लग गया कि कुछ बात अवश्य है। जब वह शाम को गुरूजी के दर्शन के लिए एम्पाएर एस्टेट आये तो गुरूजी ने संक्षेप में कहा कि गुलाब के पुष्प में भी कांटे होते हैं। परिवार समझ गया कि वह लड़का उचित नहीं था और उस ओर से भी मनाही आ गयी।

कुछ समय बाद एक और सुयोग्य लगता हुआ वर मिला - दिल्ली में कार्यरत एक न्यायिक मजिस्ट्रेट। वह घर पर कँवर की बेटी से आकर मिला और वहां से जाने के बाद, कँवर को फोन पर कहा कि उसे यह सम्बन्ध स्वीकार है। साथ ही उसने अपने माता पिता की स्वीकृति भी लेने को कहा। लाल परिवार उसके माता पिता को मिलने उसके मूल स्थान भी गये। पर उनसे कोई उत्तर नहीं आया। एक दिन गुरूजी ने कँवर को फोन किया और अचानक ही पूछा कि दिल्ली में सबसे अच्छी चाट कहाँ मिलती है। कँवर ने उत्तर दिया कि उनकी जानकारी में सबसे अच्छी चाट शाहजहाँ मार्ग पर संघ लोक सेवा आयोग के भवन के कोने पर मिलती है। गुरूजी ने उन्हें वहां शाम को 6:30 बजे पहुँचने के लिए कहा।

6:30 बजे गुरूजी वहां कुछ अनुयायियों के साथ पहुँच गये। चाट के आने पर गुरूजी ने एक प्लेट कँवर को देते हुए बेटी का विवाह निश्चित होने पर बधाई दी। उपस्थित अनुयायियों ने भी ऐसा ही किया। कँवर को समझ नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है। क्योंकि केवल उन्हें पता था कि लड़के वालों से पिछले दो माह से कोई उत्तर नहीं आया था। किन्तु शीघ्र ही वह समाचार भी आ गया। सदा की भांति गुरूजी के शब्द सत्य सिद्ध हुए।

दामाद पर उपकार

कँवर के दामाद विभागीय परीक्षा में एक को छोड़ कर सब विषयों में उत्तीर्ण हो गये थे। यह उन्हें विचित्र लग रहा था। कँवर ने इसका उल्लेख गुरूजी से किया। सतगुरु ने उत्तर दिया कि उसे तो पूर्ण उत्तीर्ण हो जाना चाहिए था और हो जाएगा। कँवर को लगा कि गुरूजी संभवतः किसी की ओर संकेत कर रहे हैं जिसने उनके दामाद के मार्ग में रुकावट डाली है। शीघ्र ही उच्च न्यायालय के समस्त न्यायाधीशों के पूरे समुदाय ने उनके दामाद की परीक्षा की समालोचना करी। उनकी कार्यशैली और वार्षिक गोपनीय रिपोर्टों के आधार पर उनके पक्ष में निर्णय लिया और उत्तीर्ण घोषित कर दिया।

पुत्र रक्षा

कँवर के पुत्र रोहित को गुडगाँव से बाहर सोहना - पलवल मार्ग पर स्थित एपीजे यांत्रिक महाविद्यालय में प्रवेश मिलने के बाद वहां के छात्रावास में स्थान नहीं मिल रहा था। अपने एक पुत्र को दुर्घटना में खोने के बाद कँवर उसे प्रतिदिन 65 किलोमीटर दूर की यात्रा कराने में हिचक रहे थे पर गुरूजी ने आश्वासन दिया। फिर जैसे नियति थी, एक दिन जिस गाड़ी में वह यात्रा कर रहा था, एक ट्रक से दुर्घटनाग्रस्त हो गयी। वाहन चालक एक आँख खो बैठा और अन्य सब छात्र भी घायल हुए। पर रोहित को, जैसे गुरूजी की इच्छा थी, एक खरोंच भी नहीं आयी।

कँवर जब उस शाम को संगत में पहुंचे तो गुरूजी ने कहा कि उन्होंने उनके पुत्र को बचा लिया था। गुरूजी की कृपा उसके बाद भी उस पर बनी रही। वह अपने पाठ्यक्रम के तृतीय वर्ष में प्रवेश नहीं पा रहा था क्योंकि उसका प्रथम वर्ष के प्रथम सत्र का एक विषय शेष था। जब गुरूजी को इस बारे में पता लगा तो उन्होंने कहा कि उसे प्रवेश मिल जाएगा।

फिर जैसे विधाता की इच्छा थी, एपीजे ने अपने नियम बदल दिये। अब यदि विद्यार्थी 20 में से 18 विषयों में उत्तीर्ण हो तो वह तृतीय वर्ष में प्रवेश कर सकते थे। इस प्रकार रोहित तृतीय वर्ष में प्रवेश कर सका। यह वास्तव में गुरु कृपा ही थी, क्योंकि अगले वर्ष एपीजे ने पुनः पुराना नियम घोषित कर दिया। स्पष्ट है कि नियमों को सतगुरु की अभिलाषानुसार बदलना पड़ता है।

शल्य क्रिया बिना उपचार

कँवर की सास की दिल्ली के सर गंगाराम चिकित्सालय में शल्यक्रिया होनी थी क्योंकि उनके दायें घुटने में बहुत पीड़ा थी। परन्तु गुरूजी ने उसके लिए मना कर दिया; साथ ही यह निर्देश भी दिया कि उनको चिकित्सालय के आसपास भी नहीं ले जाना है। सतगुरु ने पुनः अभिमंत्रित ताम्बे के लोटे का उपचार करवाया जिससे चमत्कार हुआ। उनके घुटने की पीड़ा एक माह में समाप्त हो गयी और वह उसे पहले जैसे हिला डुला भी सकती थीं।

कँवर लाल, दिल्ली द्वारा कथित

जुलाई 2007