कर्म बंधनों से मुक्ति

ज्योति वर्मा, जुलाई 2007 English
ज्योति वर्मा के सास और ससुर दोनों को रक्त कैंसर होने की पहचान हुई। इस समाचार के पश्चात् ज्योति वर्मा और उसके पति देहरादून में अपना कारखाना और पेट्रोल पम्प बेच कर दिल्ली आ गये थे।

देहरादून की तुलना में दिल्ली में रहना अधिक महंगा था। वर्मा परिवार में उनके दो बच्चों के अलावा उनके माता पिता भी थे; उन्हें लगता था कि यहाँ पर वह कभी भी सुख और समृद्ध जीवन व्यतीत नहीं कर पायेंगे। उन्हें प्रतीत होता था कि कर्मों के बंधनों में जकड़े हुए वह सब किसी अंतहीन, अँधेरी गुफा में फंसे हुए, बिना किसी दिशा के चक्कर काट रहे हैं। कर्मों के चक्र उन्हें घुमा रहे थे। नव जीवन पुनः आरम्भ करने के लिए उन्होंने किसी अन्य छोटे शहर में रहने का निश्चय कर लिया था। यहाँ तक कि देहरादून से आने के बाद उन्होंने अपना सामान भी नहीं खोला था।

फिर एक मित्र के कहने पर, जिसकी बेटी के विवाह में वह गये थे, वह गुरूजी के पास पहुंचे। अगले दिन वह एम्पाएर एस्टेट आये और उन्होंने घंटों बैठ कर गुरूजी का आशीर्वाद प्राप्त किया।

उनकी आर्थिक चिंताएँ इतनी अधिक थीं कि गुरूजी के यहाँ आते हुए ज्योति ने अपने पति को कहा कि प्रतिदिन 500 रुपये का पेट्रोल व्यय कर गुरूजी के पास आने का तात्पर्य समझ नहीं आ रहा था। वर्मा परिवार गाज़ियाबाद से एम्पाएर एस्टेट आते थे, जिसकी दूरी कम नहीं है। उन दिनों सातों दिन संगत होती थी और वह वहां पर जैसे खींचे चले आते थे। उन्हें अचानक आश्चर्य हुआ जब सब व्यथाएं धीरे धीरे दूर होने लगीं: गुरूजी के निर्देशन में कर्मों की कसी हुई रस्सियाँ ढीली हो रहीं थीं।

शीघ्र ही उन्होंने बेक्स्टर हेल्थकेयर नामक कंपनी का मानव रक्त से निर्मित शिरा द्वारा दिया जाने वाला एक विशेष तरल पदार्थ आयात कर बेचना आरम्भ कर दिया। उनकी कंपनी जो कभी भी छह से दस हज़ार से अधिक शीशियाँ प्रतिवर्ष नहीं बेच पाती थी आज उनकी मांग पूरी नहीं कर रही थी। वर्मा परिवार की आर्थिक चिंताएं दूर हो गयी थीं। उनका रुका हुआ धन भी वापस आ गया था। अपनी कठिनाइयाँ व्यक्त करने से पूर्व ही वर्मा परिवार को गुरुकृपा का आभास हो गया था। गुरूजी के पास जाते हुए वह दोनों यही वाद विवाद करते रहते थे कि गुरूजी को अपने कष्टों के बारे में बताया जाये या नहीं। परन्तु गुरूजी ने उनके कहे बिना ही उनकी यह पहेली हल कर दी थी।

इस बीच में ज्योति वर्मा के ससुर के स्वास्थ्य में भी परिवर्तन आया। एक दिन कीमोथेरेपी करते हुए उन्हें मृत घोषित कर दिया गया था। उनकी जेब में सदा गुरूजी का चित्र रहता था; उन्हें न केवल नव जीवन मिला, अपितु वह रोग मुक्त भी हो गये। उसके बाद उन्होंने कभी कैंसर का उपचार नहीं करवाया।

अपने अनूठे तरीके से गुरूजी ने उनके पति की भी जीवन रक्षा करी। एक बार उन्होंने संगत से आज्ञा लेते समय उनके पति को बैठने को कहा। पाँच मिनट के उपरांत उन्होंने जाने की आज्ञा भी दे दी। किसी को समझ नहीं आया कि गुरूजी ने ऐसा क्यों किया। पर वर्मा परिवार को शीघ्र ही इसका कारण पता चल गया। मार्ग में उन्होंने कुछ ही देर पहले हुई एक भयंकर दुर्घटना देखी। यदि गुरूजी ने उनका निकलना नहीं रोका होता तो उनका भी संभवतः यही परिणाम होना था।

गुरूजी की कृपा ज्योति के सम्बन्धियों पर भी हुई है। रीढ़ की हड्डी में एक चक्र के हिलने से उनके पति शय्या पर थे। डेढ़ माह तक गुरूजी ने उनके बारे में पूछा भी नहीं। फिर अचानक एक दिन उन्होंने उन्हें हल्दी वाला दूध पिलाने को कहा। उसे पीकर वह स्वस्थ हो गये।

ज्योति के एक घनिष्ट सम्बन्धी, जो लखनऊ स्थित हिन्दुस्तान एरोनौटिक लिमिटेड में एक वरिष्ट अधिकारी थे, की विचित्र समस्या थी। उनकी अपने वरिष्ट अधिकारी से अनबन थी और उस अधिकारी ने उनकी पदोन्नति रोकी हुई थी। उन्होंने मन ही मन पद त्यागने का निश्चय कर लिया था। परन्तु गुरूजी की दया से उनकी पदोन्नति हुई और हैदराबाद तबादला हो गया। चेन्नई में अपने इन्टर्व्यू के उपरान्त उन्होंने स्वयं कहा था कि उनकी पदोन्नति असंभव है। आज वह भी प्रसन्न हैं और कुछ बड़े विभागों का कार्य संभाले हुए हैं।

गुरूजी के संरक्षण में

गुरूजी अपने भक्तों को प्रतिकूल परिस्थितियों से भी बचाते हैं। वर्माजी के कारखाने में 18 - 20 फुट गहरे एक विशाल भूमिगत पानी की टंकी का निर्माण हो रहा था जिसमें 20 - 25 श्रमिक काम कर रहे थे। अचानक उसमें एक पत्थर गिरा और सब मजदूर खतरे को भांपते हुए बाहर आ गये। जैसे ही अंतिम मजदूर बाहर निकला, वह 18 फुट ऊँची और 65 फुट लम्बी दीवार ढह गयी। किसी को चोट नहीं आई, यहाँ तक कि एक शिशु की जान भी बच गयी। क्या यह गुरूजी की दया के अन्यथा संभव था?

एक और सन्दर्भ...ज्योति की बहन के विवाह को सात वर्ष हो गये थे और वह पेट दर्द से पीड़ित थी। उसका उपचार हो चुका था, यहाँ तक कि ऑपरेशन भी हुआ था। परन्तु रोग वैसा ही बना हुआ था। उसके परिवार वाले ज्योतिषियों और तांत्रिकों के चक्कर लगा चुके थे जिन्होंने कुछ असफल उपाय किये थे। ज्योति ने जब गुरूजी को इस बारे में बताया तो उन्होंने उसे अभिमंत्रित ताम्र लोटे से जल पीने को कहा। गुरूजी के निर्देश का पालन कर के वह स्वस्थ हो गयी।

खोया हुआ बेटा घर लौट आया

ज्योति के घर में काम करने वाली का 11 वर्षीय बेटा खो गया था। वह दिल्ली एक माह पूर्व ही गाँव से आये थे और यहाँ के बारे में कुछ भी पता नहीं था। उसको ढूँढने के सब प्रयास निष्फल रहे थे; उसके पास उसका कोई चित्र भी नहीं था। घबराई माँ ने ज्योति से निवेदन किया तो ज्योति ने गुरूजी से प्रार्थना कर एक माँ की सहायता करने की विनती करी। उसी शाम को उसका बेटा वापस आ गया। उसने बताया कि ऐसा लगा जैसे कोई उसे उसके घर के सामने छोड़ गया है।

किशोर पुत्र की निगरानी

गुरूजी ने ज्योति के पुत्र को छात्रावास में रहने के लिए कहा। यह उसके लिए पहला अवसर था जब वह घर से दूर अकेला रह रहा था और अक्सर उदास हो जाता था। एक दिन उसके सब मित्र उसे छोड़ कर अपनी महिला मित्रों के साथ समय व्यतीत करने चले गये। वह मन ही मन दुखी होता रहा कि उसकी कोई ऐसी मित्र नहीं है; इसमें कोई हानि तो नहीं है, केवल समय व्यतीत करने का अच्छा तरीका है। यह सोचते हुए वह सो गया। अचानक गुरूजी उसके स्वप्न में आये और उन्होंने उसे डांटा। पसीने में भीगा हुआ, भयभीत वह जागा तो दो बजे थे। उठ कर गुरूजी से प्रार्थना करने के पश्चात् ही उसे ठीक से नींद आयी। उसने जब यह प्रसंग ज्योति को बताया तो वह आश्वस्त हुई कि गुरूजी पुत्र का ध्यान रख रहे हैं।

ज्योति कहती हैं कि गुरूजी की शरण में आने के बाद कुछ सोचने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन - किन्तु - परन्तु के बारे में भूल कर अपने मन को समर्पित करना ही पर्याप्त है। हम उनके पास दीर्घकालिक रोगी की भांति आते हैं और वह सब समस्याएँ, कष्ट और अहित दूर कर देते हैं। गुरूजी के उपचारों को समझना संभव नहीं है। उनके आशीर्वाद अक्सर अप्रत्यक्ष होते हैं। हम अपनी मानवीय प्रकृति के कारण अपनी समस्याएँ बोलने को बाध्य होते हैं। जब उनको अंतिम आश्रय मान कर आये हैं तो तुरन्त हल मिलने की बात सोचना सही नहीं है। केवल आस्था और समर्पण के भाव उनसे मेल करवाते हैं और उससे ही भविष्य उज्जवल होता है। कहावत है, "जितना गुड़ डालोगे, उतना ही मीठा फल पाओगे।" भक्तों को उनसे इतनी ऊर्जा मिलती है कि कोई उनको हानि नहीं पहुंचा सकता है।

ज्योति वर्मा, गाज़ियाबाद

जुलाई 2007