गुरूजी 100 किलोमीटर बिना ईंधन के कार ले गये

जगबीर सिंह ग्रेवाल, जुलाई 2007 English
श्री ग्रेवाल पंजाब कृषि विश्वविद्यालय में अपनी ससुराल में थे जब गुरूजी अपने कुछ अनुयायियों के साथ वहां पहुंचे। लंगर करते हुए बहुत रात्रि हो गयी थी।

श्री ग्रेवाल को गुरूजी को जालंधर में उनके मंदिर तक पहुंचाना था। श्री ग्रेवाल की मारुती 800 गाड़ी में वह दोनों चल पड़े। थोड़ी दूर जाने पर श्री ग्रेवाल को आभास हुआ कि गाड़ी में पेट्रोल समाप्त होने वाला है। वह चिंतित हो गये। उन्हें पता था कि इस समय कोई पेट्रोल पम्प खुला नहीं होगा। यह नव्वे का दशक था जब पंजाब में आतंकवाद फैला हुआ था और दुकानें जल्दी बंद हो जाती थीं। श्री ग्रेवाल को यह भी पता था कि देर रात में पुलिस और आतंकवादी, दोनों घूमते रहते थे।

उनके साथ बैठे हुए गुरूजी ने उनके मन की बात पढ़ते हुए उनको चिंतामुक्त रहने के लिए कहा। श्री ग्रेवाल को याद है कि गुरूजी ने कहा था कि वह चिंता क्यों कर रहे हैं, उनके पास वहां तक पहुँचने के लिए पर्याप्त ईंधन है और वह गाड़ी चलाते रहें। वह कार चलाते रहे किन्तु उन्हें पता था कि देर सबेर पेट्रोल समाप्त हो जाएगा।

लुधियाना - जालंधर राजमार्ग पर मध्य दूरी पर स्थित गोराया पहुँचने पर श्री ग्रेवाल के मन को पुनः उन्हीं चिंताओं ने घेर लिया। गुरूजी तुरन्त बोले कि वह व्यर्थ शंका कर रहे हैं; वह केवल विश्वास के साथ चलते रहें, पेट्रोल पर्याप्त है। उनके कहने पर श्री ग्रेवाल को अचानक आभास हुआ कि उस गाड़ी में चार किलोमीटर से अधिक का पेट्रोल नहीं था और वह 40 किलोमीटर आ चुके थे। तब उन्हें विश्वास हुआ कि उनकी कार पेट्रोल से नहीं अपितु दिव्य शक्ति से चल रही है। शीघ्र ही वह जालंधर में गुरूजी के मंदिर पर पहुँच गये। गुरूजी जब उतरे तो उन्होंने कहा कि वह गाड़ी को बिना पेट्रोल के ले आये हैं, प्रातः होते ही वह पेट्रोल भरवा लें - उसके बाद कार बिना पेट्रोल के नहीं चलेगी।

श्री ग्रेवाल कहते हैं कि दिव्य ऊर्जा के इस अद्भुत अनुभव के पश्चात् उन्होंने अपने आप को गुरूजी को समर्पित कर दिया। उन्हें विश्वास हो गया कि गुरूजी कोई साधारण पंडित या संत न होकर अति असाधारण हैं: वास्तव में वह सतगुरु हैं।

80 वर्ष उपरान्त राजस्थान के कूप में जल भरा

गुरूजी की दया अपरम्पार है। वह करुणा के अपार सागर हैं जिसकी कोई समानता नहीं की जा सकती है। जयपुर में लाखों ने गुरूजी का आशीर्वाद प्राप्त किया था। 1994 में गुरूजी वहां गये थे और ब्रिगेडियर (अब सेवा निवृत जनरल) मोहन सिंह के यहाँ महीने भर तक रहे थे। उनके दर्शन के लिए सैंकड़ों लोग आते थे। दर्शनार्थी राजस्थान के पृथक - पृथक ग्रामों से अपनी पत्नियों, बच्चों आदि के साथ बैलगाड़ियों, तांगों और अन्य नाना प्रकार की सवारियों में अपनी समस्याओं और चिंताओं को लेकर आये थे। गुरूजी अपनी संवेदनशील दृष्टि, ताम्र लोटे इत्यादि से उनको आशीष देते रहे। उनके अनुयायी, जिसमें श्री ग्रेवाल भी थे, दुभाषिये का काम कर रहे थे।

उनको याद है कि किस प्रकार से एक पंचायत के सदस्य ने उनके पास आकर विनती करी कि क्या गुरूजी उनके गाँव में पिछले 80 वर्ष से एक सूखे कुँए में फिर से जल भर सकते हैं?

तीन दिन के बाद उनको अपनी विनती का उत्तर प्राप्त हो गया। ग्रामवासी जयपुर की सड़कों पर शोर शराबे के साथ, ढोल बजाते हुए और "गुरु बाबा, जल आ गया" चिल्लाते हुए आये। गुरूजी ने आनंदित ग्रामवासियों को कभी भी उसका जल न बेचने का निर्देश दिया। अन्य सभी दर्शनार्थी भी लाभान्वित हुए - भले ही वह रोग या मानसिक चिंता से ग्रस्त हों या फिर पारिवारिक समस्या हो। केवल आम जनता को ही लाभ नहीं मिला; महाराजा भवानी सिंह को चार कन्धों पर उठा कर लाया गया। कुछ ही दिनों के बाद वह स्वस्थ होकर चलने लगे।

हीरे और पुष्प

कभी कभी किसी भक्त का मनोरथ होता है कि गुरूजी, शिव के अवतार, जो आशुतोष के समान सरलता से प्रसन्न हो जाते हैं, कोई कामना पूर्ण करें। ऐसा ही कुछ श्री ग्रेवाल की पत्नी, श्रीमती रिम्पल के साथ हुआ। गुरूजी संगरूर में संगत कर रहे थे। अचानक उन्होंने श्रीमती रिम्पल को अपने पास बुलाया और अपने हाथ में प्रकट हुए दो हीरे उनके हाथ में दिये। वह ब्रिटेन के पाउंड में लिपटे हुए थे। आज बारह वर्ष बाद भी उनमें से गुलाब की सुगंध आती है - गुरूजी के होने का प्रमाण।

अन्य अवसरों पर भी गुरूजी विशेष कृपा करते हैं। नव वर्ष की पूर्व संध्या पर श्री ग्रेवाल की ससुराल में गुरूजी की संगत हो रही थी। अचानक उनके ससुर पर पुष्पों की पंखुड़ियां बरसने लगीं और कुछ देर तक ऐसे हो बरसती रहीं। दस मिनट के उपरान्त, एक अन्य महिला अनुयायी श्रीमती बरदान पर ऐसा ही हुआ। यह चमत्कार भक्तों पर गुरूजी का प्रेम दर्शाते हैं। श्री ग्रेवाल कहते हैं कि गुरूजी अपने भक्त से कोई मांग नहीं करते। वह तो आपके कर्म अपने ऊपर अंतरित कर आपको मुक्त कर देते हैं। वह केवल प्रेम और आस्था चाहते हैं।

जगबीर सिंह ग्रेवाल, गुड़गाँव

जुलाई 2007