उनकी छत्रछाया में

ब्रिगेडियर (सेवा निवृत) जे एस अलघ, जुलाई 2007 English
हम गुरूजी की शरण में अगस्त 1998 में पहुंचे। यद्यपि मैं 1975 से 1984 तक जालंधर में सेवारत रहा था और हम उनके मंदिर के निकट ही रहते थे किन्तु गुरूजी ने हमें 1998 में अपनी दया का पात्र चुना। उस वर्ष से अब तक कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा।

1998 में हम दुबई में रह रहे अपने एकमात्र पुत्र का विवाह कर रहे थे। गुरूजी ने मुझे उसका और वधू के चित्र लाने को कहा और उन्होंने दोनों को अपना आशीष दिया।

तत्पश्चात, मेरे पुत्र का विवाह मार्च 1999 में संपन्न हुआ। ऐसा लगा कि गुरूजी का रक्षा आवरण सब आयोजनों पर बना हुआ था। मैंने उससे पूर्व ही नोएडा में अपना मकान बनवाया था और धन की कमी थी। पर गुरूजी की कृपा से सब आयोजन बहुत अच्छे प्रकार से संपन्न हुए। स्वागत समारोह दिल्ली के ताज होटल में हुआ था। उस अवसर पर चित्र लेने वाले सज्जन ने प्रभावित होकर कहा कि वह दिल्ली में 500 से अधिक विवाह आयोजनों में कार्य कर चुके हैं और प्रत्येक पंजाबी विवाह में शराब के बाद झगड़े अवश्य होते हैं पर यहाँ पर ऐसा कुछ नहीं हुआ।

वसंत कॉन्टिनेंटल होटल में एक अन्य समारोह के बाद हमारे अतिथियों को नोएडा ला रही बस में कुछ खराबी आ गयी। महिलायों ने भारी गहने पहने हुए थे और आधी रात बीत चुकी थी पर सब सुरक्षित घर पहुँच गये। केवल सर्व विद्यमान गुरूजी ही उन्हें घर तक पहुंचा सकते थे।

पूर्ण परिवार को अमरीका का दस वर्षीय वीसा

मेरा पुत्र दूरसंचार इंजीनियर है पर वह दुबई में सुखी नहीं था। यदा कदा मैं गुरूजी से इसका उल्लेख करता तो वह चिंता करने को मना करते थे। मेरा पुत्र और उसकी पत्नी जनवरी 2000 में भारत आ रहे थे। दस जनवरी को गुरूजी की संगत में जाते हुए मैं परिवार के चारों सदस्यों के चार भरे हुए वीसा पत्र जेब में रख कर ले गया। मैंने गुरूजी को कहा कि मेरा पुत्र और उसकी पत्नी अर्ध रात्रि को दुबई से आ रहे हैं और अगले दिन प्रातः हम सब इन्टर्व्यू के लिए अमरीकी दूतावास जा रहे हैं। गुरूजी ने केवल कहा, "तेरा कल्याण कर दित्ता।"

वीसा मिलने की पद्धिति भी पेचीदा थी। दूतावास के बाहर औपचारिकताएं पूर्ण होने के बाद, अन्दर पहले एक वरिष्ट सलाहकार प्रारम्भिक जाँच करने के पश्चात् एक इन्टर्व्यू के लिए भेजते थे। पंक्ति में मैं सबसे आगे था; मेरे पीछे मेरी पत्नी, फिर पुत्र और उसकी पत्नी थे। मेरी बारी आने पर मैंने चारों पारपत्र दे दिए। मेरे से प्रश्न किया गया कि क्या मैं श्री जे एस अलघ हूँ। मैंने उत्तर दिया कि मैं ब्रिगेडियर अलघ हूँ। उन्होंने फिर प्रश्न किया कि क्या मेरे पीछे मेरी मित्र खड़ी हुई है; मैंने कहा कि वह मेरी पत्नी हैं। जिस प्रकार से वह अधिकारी बात कर रहे थे, ऐसा लगा कि स्वयं गुरूजी वहां पर बैठे हुए हैं। क्या मुझे दस वर्ष का वीसा चाहिए; उन्होंने फिर प्रश्न किया। जब मैंने उनसे पूछा कि क्या वह हम चारों को दस वर्ष का वीसा देंगे, तो उनका उत्तर हाँ में था। उन्होंने मुझे पहले नंबर की खिड़की पर जाने को कहा जहाँ दस वर्ष के वीसा मिलते थे। मेरे पुत्र के लिए वह असंभव था। पर हम सबको दस वर्ष के वीसा मिले। उस दिन जब हम गुरूजी के पास पहुँचे तो उन्होंने कहा, "हो गया काम?" हमने उनके चरण स्पर्श किये: यह चमत्कार ही था।

अमरीका में कार दुर्घटना

जुलाई 2004 में मेरा पुत्र अपनी पत्नी और बेटे के साथ अमरीका में रहने गये - उसे वहाँ पर काम मिल गया था। उन दिनों वह लॉस एंजेलिस में रहते थे। सितम्बर में मेरी पत्नी भी कुछ दिन के लिए उनके पास रहने चली गयी। गुरूजी के कथनानुसार मेरी पत्नी उनका एक चित्र सदा कार में रखती थी। उस माह मैं मंदिर में सत्संग के लिए गया था और जब वहाँ से लौटा तो मेरे कपड़ों में से गुरूजी की सुगंध आ रही थी। कपड़े उतारने पर भी उस सुगंध की तीव्रता बनी रही। प्रातः सोकर उठने पर नियम के अनुसार मैंने अपनी पत्नी को फोन किया तो बेटे ने फोन पर बताया कि उनके साथ बहुत भयंकर कार दुर्घटना हुई थी। एक चौराहे पर उनकी कार से एक दूसरी कार टकराई थी पर वह सब सुरक्षित रहे। कार बेकार हो गयी थी। मेरी पत्नी ने बताया कि हमारा पोता जो कार के पिछले भाग में शिशु सीट पर बंधा हुआ था उछल कर उसकी गोद में आ गिरा था। वह उसके साथ पीछे ही बैठी हुई थी। मेरी पत्नी ने भय के कारण बहुत देर तक अपनी आँखें नहीं खोलीं। अंततः जब खोलीं तो वह मुस्कुरा कर उसकी ओर देख रहा था। सब को सुरक्षित पाकर उसने गुरूजी को धन्यवाद दिया। अगली बार एम्पाएर एस्टेट में गुरूजी के दर्शन के लिए पहुँचने पर मैंने गुरूजी को पूरी घटना बतायी तो उन्होंने मुस्कुरा कर मुझे बैठने को कहा। उन्हें इसका पूर्वाभास था।

दुर्घटना से बचाव

मई 2006 में एक मित्र के यहाँ भोजन करने के पश्चात् घर वापस आते हुए जब मैं सड़क के दूसरी ओर घूमने के लिए यू टर्न ले रहा था कि तभी एक तेजी से आ रही गाड़ी से टक्कर होते होते बची। वह कार 150 किलोमीटर की गति से आ रही होगी। मैंने तुरन्त ब्रेक लगायी और अंतिम क्षण पर वह कार झटके से मुड़ती हुई आगे निकल गयी - जैसे कोई रक्षा कर रहा हो। यदि मैंने पूरा मोड़ ले लिया होता तो वह हमें पीछे से आकर अन्यथा किनारे से मारती। मैंने गुरूजी का धन्यवाद किया। गुरूजी के चमत्कार होते रहते हैं। उनकी छत्रछाया सदा मेरे परिवार पर बनी हुई है।

ब्रिगेडियर (सेवा निवृत) जे एस अलघ, नोएडा

जुलाई 2007