जागृति

जोगा चीमा, जुलाई 2007 English
जे सौ चंद उगे, सूरज चढ़े हज़ार,
इत्थे चानन हुंदियां गुरु बिन घोर अंध्यार।।
          - श्री गुरु ग्रन्थ साहिब

1995 में मेरे भाई ने गुरूजी से मेरा परिचय करवाया। पहली बार मैं उनके चरण स्पर्श कर ही रही थी कि उन्होंने मुझे जतिंदर कह कर संबोधित किया। मैं चकित रह गयी क्योंकि यह मेरा औपचारिक नाम होते हुए भी कोई मुझे इससे नहीं पुकारता है। सब मुझे मेरे छोटे नाम जोगा से संबोधित करते हैं और मेरा यह औपचारिक नाम केवल मेरे घनिष्ट परिवार वालों को ही पता है।

मैंने इसे संयोग समझ कर टाल दिया। जब मैं अगली बार गुरूजी से मिलने गयी तो मुझे विश्वास था कि तर्क सिद्ध हो जाएगा। मैं योग मुद्रा में अपनी आखें बंद कर गुरूजी के सामने बैठी थी। अचानक मुझे प्रतीत हुआ कि मैं पृथ्वी से ऊपर उठ कर तैर रही हूँ। स्वतः मेरे दोनों हाथ पृथ्वी को छूने के लिए किनारे आ गये और मुझे एक झटका लगा। जब मैंने गुरूजी को देखा तो वह मुस्कुरा रहे थे। मुझे आभास हुआ कि उन्होंने ही विश्वास जागृत करने के लिए यह किया था। आज तक मुझे वह याद है।

तीन वर्ष की आयु से मुझे अस्थमा रहा था और पिछले तीस वर्ष से मैं प्रतिदिन, रोग की अवस्था के अनुरूप, विभिन्न मात्रा में, 5 से 30 मिलीलीटर तक स्टिरोइड की गोलियां खाती आयी थी। फलस्वरूप समस्याएँ हो गयीं थीं; मेरी पाचन क्रिया अति क्षीण थी और उदर रोग एवं अन्य सम्बंधित रोग उत्पन्न हो गये थे। अस्थमा और स्पोंदियोलोसिस के लिए अक्सर चिकित्सालय में समय व्यतीत करना पड़ता था।

गुरूजी की संगत में आने के उपरान्त धीरे धीरे मेरे सब रोग और तनाव समाप्त हो गये। प्रत्येक संगत में आकर मुझे और अधिक शांति मिलती थी। कुछ ही दिनों में, गुरुकृपा से, मैं अपने आप को सामान्य अनुभव करने लगी और रोग का उपचार बिना किसी औषधियों या तप के हुआ। केवल लंगर और आस्था के साथ मैं स्वस्थ हो रही थी।

कुछ वर्ष पूर्व मेरे पति ने अपने रिकॉर्डिंग स्टूडियो के लिए कीमती स्विस मशीनें लीं थीं। व्यवसाय में अड़चनें थीं और मशीनों की अति आवश्यकता थी। पर व्यवसायिक ध्वनि केंद्र के लिए उन्हें आयात करने में बहुत अधिक और जटिल नियम थे - अतः कठिनाइयाँ मुंह पसारे खड़ीं थीं। फिर अचानक ही उस विदेशी कंपनी से कोई सज्जन आये और उन्होंने मेरे पति से मिलकर थोड़े से वार्तालाप के बाद आयात करने में सहायता कर दी। हम उनको जानते नहीं थे: ऐसा लगा जैसे उन्हें हमारे पास भेजा गया हो। व्यवसाय में उत्पन्न कठिनाइयों को दूर करने के लिए हम गुरूजी के आभारी हैं।

संगीत के स्वर

एक अवसर पर एक प्रसिद्ध पंजाबी गायिका गुरूजी की संगत में गाने के लिए आ रही थी। गुरूजी ने मेरे पति को उनका कार्यक्रम रिकॉर्ड करने को कहा। उस स्थल पर संगीतकार के यंत्र पहले ही लगे हुए थे। जब मेरे पति ने गुरूजी को इस बारे में बताया तो उन्होंने उन्हें संगत में बैठ कर संध्या का आनंद लेने को कहा।

तीन घंटे का कार्यक्रम होने के पश्चात् गुरूजी ने रिकॉर्ड किये हुए गाने बजाने को कहा, पर कोई ध्वनि नहीं आयी। आधे घंटे तक यंत्रों से उलझने के बाद ध्वनि यांत्रिक ने बताया कि कोई गाना रिकॉर्ड नहीं हुआ था। गुरूजी ने मुस्कुरा कर मेरे पति की ओर देखा और कहा कि गायिका के अगले कार्यक्रम में वह रिकॉर्डिंग का कार्य संभालेंगे। गुरु कृपा से संगीत का वह टेप, जो मेरे पति ने रिकॉर्ड किया था, प्रत्येक संगत में बजाया जाता है।

उपचारात्मक स्पर्श

यद्यपि गुरूजी अपनी कृपा देने के लिए विभिन्न पद्धतियाँ अपनाते हैं, आवश्यक यह है कि उनके कथन पर पूर्ण रूप से पालन किया जाये। मेरी भाभी के प्रसंग से यह स्पष्ट हो जाएगा। वह आठ वर्ष की आयु से माइग्रेन से ग्रस्त थी। एक बार गुरूजी की संगत में उसे यह पीड़ा प्रारंभ हो गयी। लंगर होने के समय गुरूजी ने उसे दो चपातियाँ दीं। उसने वह साहस करके खा लीं। उसके बाद गुरूजी ने उसे दो चपातियाँ और दीं। उसमें से उसने एक ही खायी और दूसरी अपने बैग में छिपा ली। शीघ्र ही उसका दर्द कम होने लगा। जब वह अगली बार गुरूजी के पास आयी तो उसने गुरूजी से कहा कि उसकी अधिकतर पीड़ा समाप्त हो चुकी है, केवल 10% शेष है। गुरूजी हंस कर बोले कि यदि उसने चौथी चपाती भी खाई होती तो उसका रोग भी समाप्त हो गया होता। वह अचंभित रह गयी क्योंकि किसी को पता नहीं था कि उसने चपाती छिपायी थी।

मेरे पिता प्रशासनिक सेवा से निवृत हुए हैं और गुरूजी के परम भक्त हैं। एक दिन वह मेरे भाई के साथ संगत में गये। गुरूजी ने मेरे भाई को बाज़ार से 51 रुपये के पान के पत्ते लाने को कहा। फिर गुरूजी ने वह पान के पत्ते मेरे पिता के पेट पर रखे और कहा कि उन्होंने उनका ऑपरेशन कर दिया है। मेरे पिता अचंभित थे क्योंकि वह अपने आप को बिलकुल स्वस्थ समझ रहे थे। कुछ दिन पश्चात् मेरे पिता के मूत्र में रक्त आया और उन्हें चिकित्सालय में प्रविष्ट करना पड़ा। चिकित्सकों ने मूत्राशय (ब्लैडर) के कर्कट रोग का परिणाम निकल कर उनकी शल्य क्रिया कर दी। स्पष्ट था कि गुरूजी ने उनको आशीष दिया था। यदि गुरूजी ने वह प्रक्रिया नहीं करी होती तो उनके कर्कट रोग का कभी पता नहीं लगता। गुरूजी ने इस प्रकार से उनके रोग का पता लगने से पूर्व ही उसका उपचार कर दिया था।

एक अन्य अवसर पर गुरूजी ने एक ऐसे व्यक्ति, जो उनसे कभी मिले नहीं थे, का उपचार कर हमें भावविह्वल कर दिया।

हमें कुत्तों से प्रेम है; अतः हमारे घर एक पशु चिकित्सक आते रहते थे। एक दिन जब वह घर आये तो चिंतित लगे। उनके ससुर तृतीय श्रेणी के कर्कट रोग से पीड़ित थे; वह और उनकी पत्नी उनसे मिलने चिकित्सालय जा रहे थे। मैं बाहर अपने पति की प्रतीक्षा करती हुई उनकी पत्नी से मिली। यद्यपि न उसने इससे पहले गुरूजी के बारे में सुना था न ही उनको जानती थी, मैंने गुरूजी का एक छोटा चित्र दिया। वह अपने पिता के लिए कुछ भी करने को तैयार थी। उन्होंने वह संभवतः अपने पिता की कमीज की जेब में या तकिये के नीचे रख दिया, जैसा मैंने उनको कहा था। उस रात्रि उनके पिता की अवस्था बिगड़ी पर अगले दिन उसमें आश्चर्यजनक सुधार आया और चार दिन में वह चिकित्सालय से घर आ गये। ऐसा लगा कि किसी ने उनके रोग को खींच कर बाहर निकाल दिया था क्योंकि उनकी पीठ में एक गड्ढा सा बन गया था। हमारी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा जब वह संगत में आये। उनके ससुर ने जब मुझे धन्यवाद दिया तो मैंने उन्हें गुरूजी को धन्यवाद करने को कहा।

मेरे अमरीकी बच्चे

पाठशाला में पढ़ते हुए मेरे बच्चों को गुरूजी अमरीकी कह कर पुकारते थे। हमें इसका कारण समझ नहीं आता था। बच्चों के मन में विदेश जाने की न तो कोई रुचि थी न ही कोई योजना। परन्तु वह तो भविष्य देखते हैं। आज मेरा बड़ा पुत्र कनाडा में है और छोटे को केलिफोर्निया की एक शिक्षा संस्था में प्रवेश मिला है। गुरूजी ने मेरे बच्चों के अध्ययन में भी सहायता करी। उनकी दया से मेरे छोटे बेटे को कंप्यूटर विज्ञान परीक्षा में राज्य में द्वितीय स्थान प्राप्त हुआ।

आज के युग में धोखा, संदेह और नकारात्मकता बहुत अधिक है। रोग हर स्थान पर हैं। गुरूजी से मिल कर मैं भाग्यशाली हूँ; उन्होंने जीवन के कष्ट और समस्याएँ दूर कर विश्वास, स्वास्थ्य और अध्यात्म (स्पिरिचवैलटी) दिया है। इससे हम जीव और परम की अति सुन्दर विधियों को समझ पाये हैं। गुरूजी के अद्भुत भाव से प्रत्येक अनुयायी को उनके समक्ष विशिष्ट होने का आभास होता है और प्रत्येक दिन उनकी कृपाओं से परिपूर्ण होता है।

जोगा चीमा, चंडीगढ़

जुलाई 2007