पितृ रक्षक गुरूजी

जितेन्द्र पन्त, जुलाई 2007 English
वर्ष 2006 में, होली से दो दिन पूर्व, देर रात्रि में अपनी बहन से फोन पर वार्ता होते ही मैं अपने पिता की शय्या के पास पहुंचा। अति उच्च रक्त चाप के कारण उनको कुमाऊँ की तराई में स्थित हल्द्वानी शहर के एक चिकित्सालय में गहन चिकित्सा केंद्र में प्रविष्ट कराया गया था।

मेरी बहन से फोन पर समाचार मिलने के तुरन्त बाद मेरी पत्नी और मुझे समझ आया कि गुरूजी इसकी चेतावनी पहले से ही देते रहे थे। फरवरी 2006 में शिवरात्रि से पूर्व, शीतकाल में, जब मेरे पिता भीमताल से गुडगाँव हमारे साथ रहने आये थे, तो गुरूजी ने उनके बारे में पूछा था। गुरूजी जानना चाहते थे कि क्या वह शिवरात्रि से पहले ही घर वापस चले गये हैं, जो सत्य था। गुरूजी ने एक अन्य भक्त, मेरे मामाजी, कर्नल (सेवानिवृत) जोशी के द्वारा सन्देश भी दिया था कि मेरे माता पिता मेरे पास रहने के लिए आ जाएँ। गुरूजी के सदा भविष्यसूचक कथन को हमने अनसुना कर दिया था।

अतः मेरे पिता उस उच्च रक्तचाप के दौरे से बच नहीं पाये। जब उनको यह हुआ वह हल्द्वानी से वापस भीमताल अपने घर जा रहे थे। वह जीवन बीमा निगम से सेवानिवृत हुए थे और हल्द्वानी में उस संस्था द्वारा आयोजित एक समारोह में भाग लेने आये थे।

दौरे का आवेग बहुत अधिक था और यदि गुरुकृपा नहीं होती तो प्राणघातक हो सकता था। रक्त चाप के बढ़ने से मेरे पिता की नक्सीर फूट गयी थी और इस प्रकार रक्त धमनियों पर उसका प्रभाव कम हो गया। यदि ऐसा नहीं हुआ होता तो संभवतः घातक हृदय का दौरा पड़ता या पक्षाघात हो जाता।

आई सी यू में मुझे पश्चाताप करते हुए पिता मिले। उन्हें गुरूजी के कथन न मानने पर अपनी भूल का आभास हो रहा था। परन्तु गुरूजी की ही दया से वह एक रात्रि चिकित्सालय में बिताकर घर आ गये। हल्द्वानी में ही एक सप्ताह स्वास्थ लाभ करने के पश्चात् हम सब गुडगाँव आये। वहीँ पर स्वास्थ्य लाभ करते हुए मेरे पिता ने मुझे कहा कि गुरूजी उन्हें बड़े मंदिर में कुछ समय व्यतीत करने दें।

मुझे अपने पिता के रक्त चाप की अत्यधिक चिंता थी - वह कम नहीं हो रहा था। यह चिंता व्यर्थ ही थी क्योंकि हम सब गुरूजी की शरण में थे। दयावान, रक्षक पिता समान, गुरूजी हमारे कष्ट दूर करने में लग गये। सर्वप्रथम, उन्होंने मेरे पिता को, उनकी अव्यक्त कामना के अनुसार, बड़े मंदिर जाने दिया। फिर मेरे पिता को एक तांबे का लोटा लाने को कहा जिसे अभिमंत्रित कर उन्होंने उसका जल पीने को कहा। मेरे पिता ने गुरूजी की सब बातें मानी: वह बड़े मंदिर गये, उन्होंने जल ग्रहण किया और पेट भर कर लंगर भी खाया।

यह चिकित्सक के निर्देशों के विपरीत था। उन्हें हल्का, लवण रहित भोजन खाना था। निश्चित रूप से, गुरूजी का लंगर इस प्रकार का नहीं होता। मेरे पिता को पूर्ण शय्या विश्राम का भी निर्देश था पर वह बड़े मंदिर में बैसाखी समारोह के आयोजन में लगे रहे।

गुडगाँव आने के तीन सप्ताह उपरान्त हम चमत्कृत हो रहे थे। उस मायावी अभिमंत्रित लोटे से जल ग्रहण करने के कुछ दिन बाद ही उनके स्वास्थ्य में अभूतपूर्व सुधार आया। उनका रक्त चाप भी कम हो गया।

गुरूजी के आशीर्वाद से न केवल रक्त चाप कम हुआ, अपितु उससे चिकित्सक की दी हुई औषधियाँ भी व्यर्थ हो गयीं। चिकित्सा विज्ञान को पुनः आस्था और विश्वास के रहस्यों ने आह्वान किया था। मेरे पिता के लिए गुरूजी जीवन रक्षक सिद्ध हुए हैं। मेरी पत्नी और मुझे गुरूजी की दया और कृपा के इतने अधिक सुअवसर प्राप्त हुए हैं कि उनका ह्रदय से आभार प्रकट करने के लिए हमारे पास शब्द नहीं हैं। यदि वह अनुमति दें, तो हम यह जीवन उनके कमल चरणों में व्यतीत करना चाहेंगे। गुरूजी को सदा हमारा सादर प्रणाम।

जितेन्द्र पन्त, गुड़गाँव

जुलाई 2007