जीवन की पाठशाला में गुरु कृपा

जया कौशिक, जुलाई 2007 English
गुरूजी की संगत में पहली बार जाने का अवसर मुझे अपने इक्कीसवें जन्म दिवस पर मिला। मेरे पिता, कमांडर शर्मा दर्शन के लिए जाते रहे थे पर मेरी माँ और मेरी दो बहनें कभी नहीं गयीं थीं। पता नहीं क्यों उस दिन मेरे अन्दर गुरूजी के दर्शन करने की अभिलाषा जागृत हुई।

मैं सदा से सामान्य छात्रा रही हूँ। कक्षा 12 में 64% अंक लेकर मुझे दिल्ली यूनिवर्सिटी के किसी अच्छे कॉलेज में विज्ञान (कॉर्स) में प्रवेश नहीं मिला तो मेरे पिता ने मुझे इग्नोऊ के बी सी ए में प्रवेश दिला दिया। मुझे पता नहीं था कि वहां पर बी सी ए और एम सी ए में केवल 3% विद्यार्थी पहली बार में सफल हो पाते हैं। गुरूजी की कृपा से, मैंने सामान्य विद्यार्थी होते हुए भी न केवल बी सी ए, अपितु एम सी ए भी पहले प्रयास में पूरा कर लिया। जैसे यह कम था मैंने ग्रेजुएशन के साथ साथ बहुत अच्छे अंकों के साथ एन आई आई टी का कॉर्स भी पूरा किया और पोस्ट-ग्रेजुएशन करते हुए डेढ़ वर्ष का सोफ्टवेयर डेवेलपर का अनुभव भी प्राप्त किया। यह कौन सोच सकता था कि मेरे जैसी लड़की इतना एक साथ कर सकती है? गुरूजी की कृपा से ही मैं यह सब करने में समर्थ हुई।

शीघ्र ही पूरे परिवार ने गुरूजी के दर्शन के लिए जाना आरम्भ कर दिया। एम सी ए करने के उपरान्त मुझे एक नई नौकरी की आवश्यकता थी। मेरी परीक्षाओं के बाद हम सब गुरूजी के दर्शन के लिए गये। वहां पर मेरी माँ ने गुरूजी से मेरे लिए दस हज़ार रुपये वेतन की नौकरी के लिए प्रार्थना करी। मुझे पता नहीं कि माँ ने वह अंक क्यों चुना। परन्तु जब मुझे नौकरी मिली तो मुझे दस हज़ार रुपये का ही वेतन दिया गया। जब मैंने उनसे पूछा कि उन्होंने इतने के लिए ही क्यों प्रार्थना करी, तो उन्होंने उत्तर दिया कि वही अंक उस समय उनके मन में आया था अतः उन्होंने उतने के लिए ही प्रार्थना करी। दिसंबर 2002 में मेरी परीक्षाएं समाप्त होने के शीघ्र बाद ही 5 जनवरी को मुझे नई नौकरी मिल गयी।

जब मैं इंटरव्यू के लिए मैनेजर के समक्ष पहुँची तो उन्हें आभास हुआ कि उस कार्य के लिए मुझमें योग्यता नहीं है। वह इस दुविधा में थे कि योग्यता न होते हुए मुझे कैसे बुलाया गया। किन्तु उन्होंने मुझे एक अन्य रिक्त पद के लिए प्रश्न पूछे और मुझे वहां नौकरी मिल गयी। इसके बाद मैं कुछ दिन तक माँ को छेड़ती रही कि केवल दस हज़ार के लिए ही क्यों प्रार्थना करी।

मेरे 23 वर्ष पूरे होने पर मेरे परिवार वालों के मन में आया कि मेरा विवाह कर देना चाहिए। मेरे माता पिता वैवाहिक विज्ञापन देखने लगे। मेरे सम्बन्ध के लिए मेरे माता पिता को एक परिवार उपयुक्त लगा और उन्होंने वहां पर सप्ताहांत में वहां जाने का निर्णय लिया। वहीँ से एक और विवरण भी आया था; क्योंकि यह अधूरा सा था इसीलिए मेरे माता पिता का वहां जाने का विचार नहीं था। परन्तु जब वह घर से निकलने वाले थे तो उस परिवार से लड़के के पिता ने फोन किया। चूंकि वह फरीदाबाद जा ही रहे थे उन्होंने दूसरे घर (अब मेरी ससुराल) भी जाने का निर्णय ले लिया। उसके उपरान्त गुरूजी की कृपा से सब कुछ कुशलपूर्वक संपन्न हुआ।

2004 में एक रात्रि के अंतिम प्रहर में मुझे गुरूजी का स्वप्न आया जिसमें उन्होंने कहा कि दो वर्ष के पश्चात् हम विदेश जाएंगे। उस समय तक विदेश जाने का विचार तक मेरे मन में नहीं आया था और ऐसा नहीं लगता था कि वहां जाकर हम आनंदपूर्वक रह पाएंगे। किन्तु दो वर्ष उपरान्त परिस्थितियाँ भिन्न थीं। मैं चकित थी कि उन घटनाओं को देख कर मैं प्रसन्न थी। हमारी जर्मनी जाने की योजना सितम्बर 2003 में साकार हुई - गुरूजी के स्वप्न के ठीक दो वर्ष बाद!

इसके अलावा और भी अनेक अनुभव हैं। जर्मनी में नौकरी के लिए मेरा फोन पर इंटरव्यू हो रहा था। यद्यपि वह अच्छा नहीं हुआ था उसके तुरन्त बाद मुझे गुरूजी की विशिष्ट सुगंध आयी। सन्देश स्पष्ट था: चिंता की कोई आवश्यकता नहीं है, वह मुझ पर और मेरे प्रियजनों पर अपना स्नेह बनाए हुए हैं।

जया कौशिक, जर्मनी

जुलाई 2007