18 वर्ष की वेदना: 18 दिन में समाप्त

गोपाल सेठी, जुलाई 2007 English
मेरी पत्नी 18 वर्ष से रोग ग्रस्त थी। 1982 में उसके शरीर की गांठें उभर आयी थीं जिनमें तपेदिक रोग के कीटाणु थे। अति क्षीण काया और तीव्र औषधियों के कारण उसे विभिन्न प्रकार के रोग होने लगे - उदर का नासूर, पित्ताशय की पथरी, अंत्र वृद्धि, कर्ण अर्बुद, गर्भाशय के रोग आदि।

हमने हर प्रकार की चिकित्सा कर ली - एलोपेथी, होम्योपेथी, आयुर्वेदिक, यूनानी - यहाँ तक कि रेकी भी। परन्तु सब प्रयास विफल रहे, उसके शरीर पर नये रोग प्रकट होते रहे। 1987 और 1999 की अवधि में उसकी पांच बड़ी शल्य क्रियाएँ हुईं। उसकी भूख समाप्त हो चुकी थी और वह कभी पूरा भोजन नहीं कर पाती थी। उसकी श्रवण शक्ति आधी रह गयी थी। ऊपर से ज्योतिषियों की भविष्यवाणी के अनुसार उसका जीवन इतना ही था। परिवार में सब निराश थे, आशा की कोई किरण दिखायी नहीं दे रही थी। ऐसे समय में गुरूजी के रूप में ईश्वरीय कृपा प्राप्त हुई। उनके बारे में हमें एक पारिवारिक मित्र ने बताया और 20 फरवरी 2000 को उनके प्रथम दर्शन हुए। संगत के उस पहले दिन ही शांति की प्राप्ति हुई और हम आश्वस्त हुए।

चिकित्सकों के अनुसार मेरी पत्नी को किसी भी प्रकार के तेल की चुटकी भर मात्रा से अधिक और मसाले वाला भोजन निषिद्ध था। उसे आठ बजे से पूर्व भोजन करना होता था। संगत में गुरूजी ने, नौ बजे उसे मुठ्ठी भर शुद्ध घी से बना हुआ कड़ा प्रसाद दिया और एक घंटे के उपरान्त हमने लंगर किया, जिसमें मसालेदार भोजन था। घर लौटने पर हम सोच रहे थे कि होने वाली यातना को वह कैसे सह पायेगी - घर पर सात बजे भोजन करने पर भी वह व्याकुल रहती थी और अर्ध रात्रि तक उसे नींद नहीं आती थी। परन्तु उस दिन, 20 फरवरी को वह तुरन्त सो गयी और रात भर चैन से सोयी। उस दिन से वह बिना किसी परेशानी के सामान्य भोजन करती आ रही है।

मार्च के प्रथम सप्ताह में, महा शिवरात्रि को, हम पहली बार बड़े मंदिर गये। गुरूजी का आशीर्वाद, उनका प्रसाद और लंगर करते ही उसके सब रोग विलीन हो गये। उसे शरीर में एक अद्भुत स्फूर्ति और ताजगी का अनुभव हुआ। कुछ दिन पश्चात् हम फिर चकित हुए जब उसने कहा कि टी वी का स्वर बहुत अधिक है। यह वही थी जिसे अपनी कमजोर श्रवण शक्ति के कारण फोन की घंटी भी सुनाई नहीं देती थी।

18 वर्ष की वेदना 18 दिन में समाप्त हो गयी थी। कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि गुरूजी को कृपा करने के लिए अतिरिक्त समय की आवश्यकता है। वह तो सदा वृष्टि कर रहे हैं, हम योग्य होने पर ही उसे ग्रहण कर सकते हैं। इन महापुरुष के पलक झपकते ही सृष्टि की रचना अथवा इति हो जाती है। अनगिनित आत्माएं शरीर रूप लेती हैं और त्याग देती हैं। हम तो केवल इतना ही कह सकते हैं - "तुम सम सर नहीं दयाल, मोहे सम सर पापी।"

जिव्हा पर जिप

मेरी पत्नी की दूसरी शल्य चिकित्सा के उपरान्त मैंने उससे परिहास किया था कि वह अपने शरीर पर जिप लगवा ले क्योंकि चिकित्सक सदा शल्य क्रिया का सुझाव देते रहते हैं। एक दिन संगत में जब मैं अपने संस्मरणों का वर्णन कर रहा था, गुरूजी ने मुझे यह बात भी बताने को कहा। उन्होंने उन्हीं शब्दों का प्रयोग किया जिन्हें मैंने अपनी पत्नी से अपनी आपसी वार्ता में दस वर्ष पूर्व किया था!

गुरूजी की सर्वज्ञता कभी कभी अचानक प्रकट होती है। मेरी बड़ी बहन जब दूसरी बार गुरूजी के दर्शन कर रही थीं तो उन्होंने कहा कि वह उनकी अत्यंत पुरानी भक्त है। मैं सोच रहा था कि यह कैसे संभव है। उसी समय मुझे आभास हुआ कि वह बचपन से शिव को पूजती रही है और प्रत्येक सोमवार को व्रत रखती आई है। यह एक अति महत्वपूर्ण क्षण था: गुरूजी ने अपनी वास्तविकता बतायी थी।

गुरूजी की शरण में यह जीवन पूर्ण रूप से परिवर्तित हो चुका है। गुरूजी ने सब भविष्यवाणियों को असत्य सिद्ध कर दिया है और मेरी पत्नी को नव जीवन प्रदान किया है। मुझे प्रतीत होता है कि हम कबीर से भी अधिक भाग्यशाली हैं - वह तो गुरु और गोविन्द, दोनों में से एक के चरण स्पर्श करने की दुविधा में थे। हमारे लिए तो गुरु ही गोविन्द हैं।

यह संगत स्वयं प्रभु के चरणों में बैठ कर अत्यंत गौरवान्वित है। यह हमारा सौभाग्य है कि वह हमें अपने दर्शन, कृपा, स्नेह, निर्देशन और लंगर करने का अवसर प्रदान कर रहे हैं। विनती है कि सबको उनके क्लेशों और कष्टों से मुक्ति मिले। आइये हम सब मिल कर प्रार्थना करें:

मेहरां वाले सैयां राखीं चरना दे कोल,
राखीं चरना दे कोल सानु चरना दे कोल।

गोपाल सेठी, दिल्ली

जुलाई 2007