सर्वोपरि गुरूजी

गीतन संघेड़ा, जुलाई 2007 English
निःसंदेह मैं कुछ चमत्कारिक और ईश्वरीय संस्मरणों का वर्णन करना चाहती हूँ। मैं उन कुछ भाग्यवानों में हूँ, जो प्रभु की उपस्थिति और कृपा पाकर धनी और कृतज्ञ हुए हैं। इस प्रभु को हम गुरूजी के नाम से जानते हैं। गुरूजी: उनके बारे में मैं क्या कहूं? वह तो सर्वोपरि हैं, वह सर्वोच्च हैं। उन्हें प्रतिदिन स्मरण करना चाहिए।

जन्म से ही मुझे गुरूजी का मार्गदर्शन प्राप्त हुआ है। सुख दुःख में वह सदा मुझे और मेरे परिवार को आधार देते रहें हैं। उन्होंने हमें बताये बिना ही, हमें हमारे कष्ट और कुकर्म, ज्ञात या अज्ञात, दोनों से मुक्त किया है। आज आपके सम्मुख उस दयावान के साथ अपनी आपबीती बाँट कर मुझे अत्यंत प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है।

पान के पत्तों से पुटक की चिकित्सा

मुझे अब तक वह दिन याद है जब मैंने अपने जीवन की सबसे अधिक पीड़ा का अनुभव किया था। मैं 15 वर्ष की थी और हम जालंधर में रहते थे। स्नान करते हुए अचानक मुझे अपने पेट के निचले हिस्से में अत्यधिक दर्द हुआ। वेदना इतनी अधिक थी कि मैं खड़ी भी नहीं हो पा रही थी। मैं वहीँ स्नानकक्ष में लेट गयी थी और अपनी माँ को पुकार रही थी। स्वाभाविक रूप से सबको तुरन्त गुरूजी की याद आयी जो उन दिनों पंचकूला में थे और वहीँ पर संगत करते थे। हम उसी दिन पंचकूला के लिए चल पड़े। परन्तु गुरूजी के पास जाने से पूर्व हमने पी जी आई और कुछ अन्य निजी केन्द्रों में परीक्षण करवाना उचित समझा।

परिणाम आने पर हम चकित रह गये। मेरे गर्भाशय में एक पुटक फूट गया था; उससे विषैला पदार्थ निकल कर शरीर में फ़ैल रहा था। यदि उसे निकाला नहीं जाता तो वह प्राणघातक सिद्ध होता। चिकित्सकों ने तुरन्त शल्य क्रिया कराने को कहा तो हमने मना कर दिया। उसी संध्या को हम गुरूजी के पास पहुंचे और उनको स्थिति से अवगत किया। उन्होंने अपनी सर्व प्रसिद्द मुस्कान देते हुए चिंता मुक्त होने को कहा। उन दिनों वह पान के पत्तों को अभिमंत्रित कर रोग के स्थान पर रख देते थे। यह गुरूजी की शल्य क्रिया थी। मुझे लिटा कर उन्होंने वैसा ही किया और 10 - 15 मिनट विश्राम करने को कहा। उसके पश्चात् उन्होंने मुझे अगले दिन पुनः परीक्षण करवाने को कहा।

उनमें विश्वास और आस्था बनाये रखते हुए मैंने वैसा ही किया। यद्यपि मुझे परिणामों का ज्ञान था, चिकित्सकों के विस्मित चेहरों को देख कर मुझे अपने ईश्वर, गुरूजी पर पूर्ण विश्वास हो गया। परीक्षणों में 20 घंटे पूर्व दिखे हुए पुटक या विषैले पदार्थ का कोई चिह्न नहीं था।

प्रसन्नता के साथ होने वाले अचम्भे को हम रोक नहीं पा रहे थे। चिकित्सक भी गुरूजी के बारे में जानने के लिए उतने ही उत्सुक थे जितना हम उनको बताने के लिए। उसके उपरान्त उन चिकित्सकों की आध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत हुई।

उस दिन शाम को मैं फिर उनके पास गयी। जैसा सर्व विदित है उनको कुछ भी बताने की आवश्यकता नहीं थी; उन्हें इसका ज्ञान पहले से ही था। उन्हें अपनी कृतज्ञता प्रकट करने के लिए हमारे पास शब्द नहीं थे, पर वह यह नहीं चाहते। उन्हें केवल हमारा प्रेम और निस्वार्थ आस्था चाहिए, जिसके साथ हम परम आनंद की कठिन यात्रा पर अग्रसर होते रहें।

मेरी दादी का ह्रदय रोग

1989 में जब मैं छोटी ही थी मेरी दादी को ह्रदय का दौरा पड़ा था। वह सी एम सी, लुधियाना के चिकित्सालय में प्रविष्ट थीं। कई चिकित्सकों से सलाह करने के बाद उन सबका एक ही निर्णय था - उनकी स्थिति दिन प्रतिदिन बिगड़ रही थी और कोई उपचार संभव नहीं था। उनकी नाड़ी 160 - 190 के बीच में रहती थी, उनके फेफड़ों में पानी भरा हुआ था और उनकी छाती फूल गयी थी। वह अर्ध चेतन अवस्था में थीं।

गुरूजी उन दिनों जालंधर में संगत किया करते थे। चिकित्सकों के प्रतिकूल निर्णय सुन कर मेरे पिता ने मुक्तिदाता से बात करने का निर्णय लिया। जैसे मेरे पिता चिकित्सालय से बाहर जा रहे थे, गुरूजी ने प्रवेश किया। ऐसा लगा जैसे वह अचानक ही आ गये हों। उनके आते ही हमें आश्वासन हो गया कि सब ठीक हो जाएगा। दादी के पास जाकर उन्होंने उनकी नाड़ी को अपने हाथ में लिया। उन्होंने क्या किया, इसका ज्ञान तो उन्हीं को है पर उसकी गति घट कर 90 हो गयी। वहीँ पर गुरूजी ने कुछ देर तक पाठ किया और फिर वह चले गये। शनैः शनैः हमारे सामने ही दादी की चेतना लौट आई और वह सामान्य हो गयीं। 18 वर्ष पूर्व के उस दिन से दादी की नाड़ी की गति अब तक 90 ही है।

एक बार फिर चिकित्सक विश्वास नहीं कर पा रहे थे। यह जान कर कि गुरूजी सदा हमारे साथ हैं हम भावविभोर थे। गुरुकृपा से आज भी मेरी दादी स्वस्थ और प्रसन्नचित हैं।

अपने अनुभवों का वर्णन कर मैं अत्यंत भाग्यशाली हूँ। हमारी जीवन यात्रा बहुत छोटी है और इस में ही हम बड़े बड़े दुष्कर्म करने को तत्पर हो जाते हैं। प्रत्येक मनुष्य को अपने कर्मों का फल तो भुगतना ही पड़ेगा।

अपनी आध्यात्मिक यात्रा कभी भी प्रारंभ करी जा सकती है। हम उसे अभी, इसी क्षण शुरू कर सकते हैं और अपने जीवन में परिवर्तन ला सकते हैं। गुरूजी सच्चे भक्त की सहायता करने को सदैव तत्पर हैं। हम उस शाश्वत आनंद का मीठा अमृत कभी भी ग्रहण कर सकते हैं, क्योंकि हमारे परमात्मा, हमारे गुरु सदा हमारे साथ हैं। उन्होंने मुझे उस अनंत सत्य अवस्था को ग्रहण करने के लिए जागृत किया है और स्वयं उस मार्ग पर ले जा रहे हैं। उनसे प्रेम करने का अर्थ परमात्मा से प्रेम करने सदृश है और उनका आशीष ग्रहण करने की भांति है।

गीतन संघेड़ा, जालंधर

जुलाई 2007