गुरूजी के मार्ग पर

गायत्री सब्बरवाल, जुलाई 2007 English
कौन कह सकता है कि उसने इश्वर के दर्शन किये हैं? मैं कह सकती हूँ। गुरूजी मेरे परमेश्वर हैं। मुझे प्रतीत होने लगा है कि कोई देवता मेरे गुरु सदृश नहीं है। वह महान हैं, उनके जैसा न कोई कभी हुआ है और न ही कभी होगा। किसी को उन्हें अपने कष्ट बताने की आवश्यकता नहीं है। वह सब जानते हैं। एक बार उनके पथ पर अग्रसर होने के पश्चात् कर्म स्वयं होने लगते हैं। आपको उनमें मात्र विश्वास करना है, आस्था रखनी है और कभी कुछ मांगना नहीं है।

मेरे पुत्र उद्धव को डेढ़ वर्ष की आयु में अस्थमा रहा था। जब मैंने गुरूजी को बताना चाहा तो उन्होंने मुझे रोक दिया और कहा कि ऐसे मैं स्वयं अपना अहित करूंगी। यह कथन उनका आदेश था, मैं चुप हो गयी।

इसके ढाई वर्ष बाद गुरूजी हमारे घर एक विवाह के अवसर पर आये और उन्होंने उद्धव को एक ग्लास जल पीने के लिए दिया। मेरे पुत्र को गुरूजी का आशीष मिल गया था। उस जल को पीने के बाद उसे कभी अस्थमा नहीं हुआ। उसमें अभूतपूर्व सुधार हुआ। उसकी लम्बाई बढ़ गयी, उसका वजन भी बढ़ा और अब वह एक सक्रिय बालक है।

मेरे पति को भी दमा था। जब वह गुरूजी से पहली बार मिले तो गुरूजी ने कहा कि वह अत्यंत अन्धविश्वासी हैं। उनके इस कथन के साथ ही उनकी आधी समस्याएँ तो तुरन्त ही समाप्त हो गयीं। गुरूजी ने उनको ताम्बे के लोटे से जल पीने को कहा और शीघ्र ही उनके अस्थमा की भी इति हो गयी।

मुझे भी गुरु कृपा प्राप्त हुई। मेरी आँख में एक पुटक था और चिकित्सक ने उसे साधारण शल्य क्रिया से निकालने का सुझाव दिया था। मैं भयभीत थी। एक वृहस्पतिवार को गुरूजी मुझे बहुत ध्यान से देख रहे थे। मुझे पता था कि उनके इस प्रकार देखने का कारण होगा। अगले दिन प्रातः मेरी आँख बिलकुल सामान्य थी। गुरूजी अपनी दृष्टि से उसी प्रकार के चमत्कार कर देते हैं, जिस प्रकार शब्दों से।

पांच वर्ष पूर्व मेरे ससुर को ह्रदय का दौरा पड़ा था। उन्हें मलेर कोटला के ह्रदय रोग संस्थान ले जाया गया जहाँ उनकी एंजियोप्लास्टी होनी थी। गुरूजी ने कहा, "कल्याण हो गया" और उसके बाद सब ठीक हो गया। जब वह वहां से निवृत हो कर घर लौट रहे थे, तो ह्रदय रोग विशेषज्ञ ने बताया कि उनके ह्रदय का आगे का हिस्सा क्षतिग्रस्त है और उसमें कोई सुधार संभव नहीं है।

घर लौटते हुए जब हमने गुरूजी के दर्शन किये तो उन्होंने उन्हें शुद्ध देशी घी से बना हुआ हलुवा खाने को दिया। इसके उपरान्त मेरे ससुर अपना सामान्य कार्य करने लगे। औषधि के रूप में गुरूजी ने उन्हें प्रतिदिन दो पेग व्हिस्की पीते रहने को कहा।

तीन माह के उपरान्त जब उनका टी एम टी परीक्षण हुआ तो चिकित्सकों ने देखा कि उस मृत घोषित हिस्से रक्त प्रवाहित हो रहा था। यह अनुभव गुरूजी के क्रियात्मक रूप को साकार करते हैं। वह सब कुछ करने की क्षमता रखते हैं। उनके शब्दकोष में कुछ भी असंभव नहीं है - केवल श्रद्धा, निष्ठा और धैर्य की आवश्यकता है।

गायत्री सब्बरवाल, गुड़गाँव

जुलाई 2007