गुरूजी संग चमत्कारी वर्ष

स्वर्गीय कर्नल (सेवानिवृत) दीप्तेंदु शेखर चटर्जी, जुलाई 2007 English
नवम्बर 1984 में गुरूजी के संपर्क में आने के पश्चात् मैं अपने आप को अति सौभाग्यशाली मानता हूँ। इस अंतराल में अब तक अनेक बार मुझे और मेरे मित्रों व परिचितों को गुरूजी का आशीष मिला है। मैं उनमें से कुछ संस्मरणों का विवरण यहाँ पर कर रहा हूँ। गुरूजी को जब मैं पहली बार मिला तो एक स्कूटर दुर्घटना में मेरी पत्नी के बाएं कंधे का अस्थिबंध (लिगमेंट) टूट गया था। पता लगा कि चंडीगढ़ में एक महापुरुष रह रहें हैं जिनके पास पी जी आई जैसे विख्यात संस्थान के चिकित्सक अपने असाध्य रोगियों को भेजते हैं। हम भी उनके पास पहुंचे। उस समय से अब तक का 22 वर्ष का समय हमने उन महापुरुष के चरणों में बिताया हैं।

जब हम उनके पास प्रातः चार बजे पहुंचे तो उन्होंने मेरा हाथ अपने हाथों में ले लिया। मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि मेरे शरीर में अमृत प्रवाह हो रहा है। गुरूजी ने मुझे बताया कि मैंने एक-मुखी रुद्राक्ष धारण किया हुआ है। उन्होंने यह भी कहा कि उस पर एक शिवलिंग बना हुआ है, जिसका मैंने विरोध किया। उनके कहने पर मैंने उन्हें वह रुद्राक्ष दिखाया। उन्होंने वह रुद्राक्ष अपने हाथ में लेकर उसे गंभीरता से देखने की मुद्रा बनाई और फिर मुझे उस पर शिवलिंग देखने को कहा। वास्तव में वहां एक शिवलिंग था जो उस पर आज तक है।

मेरे लिए रुद्राक्ष उपचार...

दो वर्ष से मैं आंत्रशूल (एमओएबीएसीस) से पीड़ित था। इसमें बहुत दस्त होते हैं। गुरूजी ने मुझे पीने के लिए अमृत दिया और फिर घर जाने को कहा। उस दिन मैं अपने कार्यालय नहीं जा सका क्योंकि उस दिन मुझे 24 बार शौच जाना पड़ा। शाम को जब गुरूजी ने फोन करके मेरे स्वास्थ्य के बारे में पूछा तो मैंने उनको बताया कि मेरी स्थिति अत्यंत असहनीय है। उन्होंने उसका प्रतिकूल दृष्टिकोण लेते हुए कहा कि यह अच्छा लक्षण है, रोग शरीर से बाहर निकल रहा है।

अगले दिन प्रातः मुझे लगा कि मैं स्वस्थ हूँ और यह मैंने गुरूजी को बताया। उन्होंने कहा कि अभी रोग शेष है और अगले दिन ही ठीक होगा और अपने पास बुलाया। जब मैं उनके पास पहुंचा तो उन्होंने अपने रुद्राक्ष और एक चम्मच से मेरी नाभि को छुआ। छूते ही ऐसा प्रतीत हुआ कि मुझे बिजली का तीव्र झटका लगा है और मैं गिर गया। उन्होंने मुस्कुरा कर कहा कि अब रोग से मुक्ति हुई है। उस बिजली के झटके के बाद वह रोग मुझे आज तक नहीं हुआ है।

...और मेरी पत्नी की चिकित्सा हुई

मेरी पत्नी, बबली, का उपचार करने के लिए गुरूजी एक शनिवार की संध्या को हमारे घर पहुंचे। उनके निर्देशानुसार साबुत उड़द की दाल की तीन रोटियां बनाई गयीं। एक रोटी के आधे हिस्से को शौचालय में डाल कर जल प्रवाहित कर दिया गया। शेष रोटियों को उन्होंने बबली के कंधे पर रख कर कुछ उच्चारण किया और मेरे हाथ में दे कर बोले कि यह एक काले कुत्ते को खिला दूं। मैं भौंचक्का था। रात्रि के नौ बजे, एक साफ़ स्वच्छ छावनी क्षेत्र में आवारा कुत्ता, वह भी काला, मिल पाना अति कठिन है। मैंने अपनी शंका गुरूजी को जतायी। गुरूजी ने अपने शांत स्वर में मुझे नीचे बाहर जाने को कहा। मैं अचंभित हुआ जब नीचे जाते ही मुझे एक काला कुत्ता मिल गया। उसी समय बबली का रोग समाप्त हो गया।

एक दिन जब गुरूजी हमारे घर आये तो घर पर अनेक अतिथि थे। मेरी पत्नी ने बीच में एक बादाम का कटोरा रखा हुआ था। गुरूजी ने अपनी मुठ्ठी भरकर बादाम उठाये और सब अतिथियों को लो अखरोट खाओ, पिस्ता खाओ, किशमिश खाओ... कहते हुए बाँट दिये। विस्मय की बात थी कि जिन फलों का वह नाम ले रहे थे बादाम उन्हीं में परिवर्तित हो गये थे!

अक्षमता का निदान

मेरे एक जवान, नायक आनंदन, को बाधा दौड़ में पीठ पर गहरी चोट लग गयी थी। जवान का उपचार तो हुआ था पर उस चोट के कारण वह सेना के सब कार्य करने में अक्षम्य हो गया था। उसे सैन्य सेवा से निवृत कर घर भेजा जा रहा था। मैं उसे प्रातः चार बजे गुरूजी के पास ले गया और उनसे उसे स्वस्थ करने के लिए प्रार्थना करी। गुरूजी ने मुझ से प्रश्न किया कि यदि उन्होंने उसे रोग मुक्त किया तो उसके कर्म कौन समाप्त करेगा और इस अवस्था में वह अगले जन्म में विकलांग होगा। मैं विस्मित अवश्य था पर मैंने गुरूजी से प्रार्थना करी कि वह अपने तप से उसके कर्म नष्ट कर दें। गुरूजी मुस्कुराये और उन्होंने आनंदन को लेटने को कहा। फिर उन्होंने उसे छू कर एक अति भयानक मुद्रा बना ली जैसे वह किसी को डांट फटकार लगा रहे हैं। नीचे लेटा हुआ आनंदन बच्चे की भांति धीरे धीरे सिसक कर रो रहा था और मैं आश्चर्यचकित था। फिर उन्होंने आनंदन को उठ कर अपने शरीर पर से सब पट्टियाँ उतारने को कहा। उन्होंने यह भी कहा कि उसे स्वस्थ होने में समय लगेगा और उसे तीसरे दिन पुनः लेकर आऊँ।

अगले दिन प्रातः जब मैं पी टी के लिए जा रहा था तो मैंने आनंदन को अपनी बैरक के बाहर दंड लगाते हुए देखा, जैसे वह अपना शक्ति प्रदर्शन कर रहा है। मैंने उसे रुकने के लिए कहा तो वह बोला कि अब उसे कोई दर्द नहीं है और लग रहा है कि वह रोग मुक्त हो गया है। मैंने उसे गुरूजी के अगले दर्शन तक यह बातें गोपनीय रखने के लिए कहा।

तीसरे दिन जब हम गुरूजी के पास गये तो उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया और आनंदन की ओर उंगली करते हुए कहा कि वह शनि के प्रकोप से बाहर आया है। आनंदन का रंग साफ़ हो गया था और उसका वजन 13 - 14 किलो घट गया था। गुरूजी ने फिर आनंदन से प्रश्न किया कि उनके छूने के बाद क्या हुआ। आनंदन ने बताया कि तब से वह सोया नहीं है। गुरूजी ने तुरन्त एक चाय के चम्मच से उसकी बाल्यग्रंथी (थाइमस ग्लैंड) को छुआ। उन्होंने फिर मुझे निर्देश दिया कि आनंदन को बैरक में पहुंचा कर उसे सोने दूं। गुरूजी के स्थान से बाहर निकलते ही उसका सिर मेरे कंधे पर टिका और वह सो गया। वाहन चालक की सहायता से हम उसे बैरक तक ले कर आये और उसे उसके बिस्तर पर लिटा दिया। आनंदन तीन दिन तक सोता रहा और पूर्णतया रोग मुक्त हो गया। तदुपरांत चिकित्सकों ने जब उसके परीक्षण किये तो उसे स्वस्थ देख कर वह आश्चर्यचकित रह गये। अब उनके पास उसे सब सैन्य सेवाओं के लिए योग्य घोषित करने के अन्यथा कोई और विकल्प नहीं था।

मृत पत्नी से संपर्क

कर्नल डी आर पी चौधरी विधुर थे और चंडीमंदिर में हमारे घर के सामने रहते थे। एक दिन गुरूजी उनके घर गये और एक चित्र को देख कर उसके बारे में पूछा। कर्नल चौधरी ने कहा कि वह उनकी मृत पत्नी का है जिसे भाग्य ने उनसे सदा सदा के लिए दूर कर दिया है।

गुरूजी बोले कि वह तो यहीं पर है और क्या वह देखना चाहेंगे। हम असमंजस में थे। फिर उन्होंने अपना एक हाथ उठाया और हिलाया। अचानक वह चित्र हिलने लगा, फिर वह मेज जिस पर चित्र रखा हुआ था। उसके बाद एक एक करके उस कमरे की सब वस्तुएं, अलमारी, बिस्तर, सब कुछ, मात्र भूमि को छोड़ कर! फिर धीरे धीरे सब शांत हो गया। गुरूजी पुनः बोले कि वह उन्हें और अपने पुत्र को छोड़ कर कहीं नहीं जा सकती, वह तो इधर ही है।

"उसे मारने की आवश्यकता नहीं है"

एक शाम को गुरूजी हमारे घर पर आये थे। उस संगत में आस पास के कई सज्जन भी आये हुए थे। कर्नल चौधरी मेरे से अकेले में बात करना चाह रहे थे। दूसरे कमरे में जाने पर बोले कि उन्होंने अपने पुत्र टिलतू को जब गुरूजी के पास आकर आशीर्वाद लेने के लिए कहा तो उसने उत्तर दिया था कि संतों के पास जाने की आयु तो उनकी है, वह तो संगीत सुनना चाहता है। इस बात पर कर्नल चौधरी को क्रोध आ गया था और उन्होंने उसे चांटा मार दिया था। वह चाह रहे थे कि मैं जाकर उसे समझाऊँ। मैंने उत्तर दिया कि स्थिति को थोड़ा शांत होने देते हैं, उसके बाद मैं उसे समझाऊंगा। उसके बाद हम गुरूजी के चरणों में आकर बैठ गये जैसे कुछ हुआ ही न हो।

गुरूजी ने कर्नल चौधरी की ओर देखा और बोले कि अब पुत्र बड़ा हो गया है, उसे मारने की क्या आवश्यकता थी। उसी क्षण टिलतू ने कमरे में प्रवेश कर के गुरूजी के चरण स्पर्श किये।

बौद्धिक क्रीड़ाएं

पहले गुरूजी अमृत बांटा करते थे। प्रत्येक भक्त को एक ग्लास मिलता था और मैं अपने भाग का एक ग्लास पी चुका था। उस दिन मैं गुरूजी के निकट बैठा हुआ था। मेरे मन में विचार उत्पन्न हुआ कि यदि गुरूजी मुझे एक ग्लास और दें तो निश्चित हो जाएगा कि वह मेरे मन की बात पढ़ रहे हैं। उस समय गुरूजी किसी और को ग्लास दे रहे थे। वह रुके और उन्होंने वह ग्लास मुझे थमा दिया। पंद्रह मिनट उपरान्त मैंने संयोग सोच कर यह विचार मन से त्याग दिया। अब मेरे मन में आया कि यदि वह मुझे तीसरा ग्लास दें तो मुझे विश्वास हो जाएगा कि वह मेरे मन के भाव जान सकते हैं। वह उसी समय रुके और मेरी ओर देख कर बोले कि लो, यह ग्लास तुम स्वयं ही पियो।

पहले गुरूजी को कोई स्पर्श नहीं कर सकता था। भक्त दूर से ही प्रणाम करते थे। एक बार जब मैं उनके पास बैठा हुआ था मेरे मन में विचार आया कि मैं उनसे मिलकर अति भाग्यशाली हूँ पर कितना अच्छा हो यदि गुरूजी मुझे अपने चरण स्पर्श करने दें। उन्होंने उसी क्षण मेरी ओर देखा। अगले दिन दोपहर को वह हमारे घर आये और बिस्तरे पर लेटने की इच्छा प्रकट करी। प्रसन्नतापूर्वक मैं उनको कमरे में ले गया तो उन्होंने लेट कर प्रश्न किया कि क्या घर में घी होगा। मेरे हामी भरने पर उन्होंने मुझे उससे अपने पैर की मालिश करने को कहा। उस समय तक मैं पिछले दिन की मनोकामना को भूल गया था। आधा घंटे बाद उन्होंने पूछा कि क्या वह जा सकते हैं। तब मुझे आभास हुआ कि वह केवल मेरी इच्छा पूर्ति करने आये थे।

42 वर्ष में 20/20 की दृष्टि

उस समय मैं 42 वर्ष के आसपास होऊंगा जब मुझे निकट की वस्तुएं धुंधली दिखने लगीं। मैंने गुरूजी से अपनी दृष्टि ठीक करने का निवेदन किया तो वह बोले कि यह तो आयु के साथ होता ही है। पर मैंने पुनः उनसे अपनी दृष्टि ठीक कर देने का आग्रह किया।

संभाषण जो मेरे रिश्तेदार ने नहीं दिया

जब हम चंडीमंदिर में रहते थे, एक दिन मेरे साढू ने, जो समूह के सामने बोलने से कतराते थे, रांची से फोन किया कि हम गुरूजी से निवेदन कर के उनके द्वारा सैन्य अधिकारियों को दिये जाने वाले भाषण को रद्द करवा दें। हम उनका चित्र लेकर गुरूजी के पास प्रातः 4 बजे पहुंचे। गुरूजी के कमरे में प्रवेश करते ही उन्होंने मुस्कुरा कर कहा कि क्या मुझे अपने साढू का फोन आया है, वह कायर, उसे क्या चाहिए। जब हमने उन्हें समस्या बतायी तो उन्होंने हमें बैठने को कहा और अपने अन्य कार्य करने लगे।

समय बीत रहा था तो हमने उनसे पुनः कुछ करने की विनती करी पर उन्होंने हमें प्रतीक्षा करने को कहा। अचानक 8:05 पर उन्होंने उसका चित्र माँगा और उस पर अपनी ऊँगलियाँ फेरने के बाद कहा कि उन्होंने समस्या को अंतरित कर दिया है और अब वह भाषण एक ऐसा व्यक्ति देगा जो हिन्दू नहीं है। उस शाम को मेरे साढू ने फोन पर बताया कि वह संभाषण अब एक मुस्लिम अधिकारी देगा। जब हमने उनसे पूछा कि यह निर्णय कब लिया गया तो उसने कहा कि प्रातः 8:05 पर!

उपचार: नजले से असामान्य रोगों का

मेरा सेवादार छुट्टी गया था। मुझे एक अन्य सेवादार मिला जिसका यौन परिवर्तन आरम्भ हो चुका था। मेरे सूबेदार मेजर और मैं, दोनों चिंतित थे। अब वह कैसे सेना में कार्यरत रहेगा और जवानों की बैरक में कैसे रहेगा? एक दिन जब गुरूजी मेरे घर आये तो मैंने उस लड़के को ठीक करने के लिए विनती करी। गुरूजी ने प्रश्न किया कि मैं कहाँ से ऐसे रोगी लेकर आता हूँ। मैंने उत्तर दिया कि गुरूजी यह तो उसका भाग्य है और उसे ठीक होना है इसीलिए वह मेरे पास है। गुरूजी ने उसकी पीठ पर एक चम्मच रखा और वह ठीक हो गया।

एक दिन मुझे ज्वर हो रहा था और मैं धूप में लेटा हुआ था। दोपहर को 3 बजे गुरूजी हमारे घर आये और उन्होंने मेरे स्वास्थ्य के बारे में प्रश्न किया। मुझे सिरदर्द, ज्वर और मुंह में गन्दा स्वाद था; साथ में नाक भी बह रहा था। उन्होंने मेरी पत्नी को एक डॉक्टर को बुलाने को कहा। तुरन्त कर्नल चौधरी ताप नापने का यंत्र (थर्मामीटर) लेकर आये। उन्होंने मेरा ताप 103 डिग्री नापा। गुरूजी के प्रश्न करने पर उन्हें बताया कि औषधियों से 48 घंटे में मैं ठीक हो सकता हूँ अन्यथा तीन दिन लगेंगे।

गुरूजी ने फिर मेरी पत्नी को एक चम्मच, थोड़ा सा नमक और जल लाने को कहा। उन्होंने उस चम्मच में थोड़ा सा नमक और जल मिलाया और कुछ मंत्रोचारण कर के मेरी नाक में डाल दिया... मुझे लगा कि मेरे अन्दर का सब कुछ बाहर निकल आयेगा। मैं बाथरूम भागा और मेरी नाक से बहुत सा तरल निकला; मैं अपना मुंह धो कर आधा मिनट के बाद बाहर आया। गुरूजी ने डॉक्टर को पुनः मेरा ताप नापने को कहा - वह 97.5 डिग्री था। गुरूजी ने पूछा कि अब मुझे कोई बहती नाक, सिरदर्द या मुंह में गंदा स्वाद है? अब मेरा उपचार हो गया था, अतः मैंने नकारात्मक उत्तर दिया।

गुलाब से स्पर्शित

जनवरी 1985 के मध्य में गुरूजी ने कहा कि वह मेरी पत्नी, बबली के जन्म दिवस 25 जनवरी की शाम को हमारे घर आयेंगे। उस दिन हमारे घर पर अनेक अतिथि आये। कुछ महिलाएं अपने शाल गुरूजी को सुगन्धित करने के लिए दे रही थीं। गुरूजी उन की शाल को एक बार पहन कर कह रहे थे कि यह एक सप्ताह तक सुगन्धित रहेगा, यह 15 दिन, यह एक मास आदि आदि। मैंने उनको एक फ़ौजी कम्बल देकर पूछा कि वह कितने दिन सुगन्धित रहेगा। गुरूजी ने मुस्कुरा कर उत्तर दिया, एक वर्ष और वैसा ही हुआ।

देहरादून में गुरुकृपा

मैं देहरादून में था और पिछले तीन वर्ष से गुरूजी से कोई संपर्क नहीं था। एक रात को मेरे कान में अत्यधिक दर्द हुआ और मेरे कान के परदे फट गये। अगले दिन प्रातः जब मैं कर्ण, नासिका और कंठ विशेषज्ञ के पास गया तो परीक्षण कर के उन्होंने कहा कि मेरे दोनों कान क्षतिग्रस्त हो चुके हैं। क्योंकि मैं सुन नहीं सकता था उन्होंने यह मुझे लिख कर बताया। उन्होंने कहा कि सेना के चिकित्सक कान के नये परदे लगाने के लिए शल्य चिकित्सा कर सकते हैं पर इनकी सफलता केवल 5% ही होती है। अतः मुझे मानसिक रूप से सेना से निवृत होकर घर जाने के लिए तत्पर रहना चाहिए।

उसी शाम एक सिख सज्जन हमारे घर आये और उन्होंने कहा कि गुरूजी ने जालंधर से मेरे लिए अमृत भेजा है। उन्होंने यह भी बताया कि उनको पता है कि मुझे अब सुनाई नहीं देता है। तीन चार दिन अमृत पीने के बाद मेरे कान के परदे पुनः ठीक हो गये और मेरी श्रवण शक्ति लौट आयी। डॉक्टर अचम्भे में थे कि यह कैसे संभव हुआ।

मैं देहरादून में ही था जब मुझे 1988 में सरकार से कार ऋण प्राप्त हुआ। मैं असमंजस में था कि कार कहाँ से लूं - देहरादून, दिल्ली या कलकत्ता? एक दिन मुझे दिल्ली से कर्नल (अब ब्रिगेडियर) चौधरी का फोन आया कि गुरूजी तूफ़ान की भांति उनके कार्यालय में आये थे और उन्होंने कहा कि चटर्जी देहरादून में है और कार लेने के बारे में चिंतित है। उसको बोलो कि कार उसके लिए चंडीगढ़ में प्रतीक्षा कर रही है। इतना कह कर वह बाहर निकल गये। ब्रिगेडियर चौधरी उनके पीछे भागे पर बाहर लम्बे बरामदे में गुरूजी कहीं नहीं थे। यह सोचकर कि गुरूजी संभवतः दिल्ली आये होंगे और वह उनके दर्शन कर सकें, उन्होंने जालंधर में गुरूजी के निवास पर फोन किया। उत्तर देने वाले सज्जन ने बताया कि गुरूजी कहीं नहीं गये और वह उनके सामने बैठ कर मुस्कुरा रहे हैं।

मैंने चंडीगढ़ से ही कार ली और 2006 में बिकने तक बहुत अच्छी तरह चली।

13 वर्ष उपरान्त मैं गुरूजी के पास आया

सेना से सेवा निवृत होकर 1998 में मैं अहमदाबाद में था। पिछले तेरह वर्षों से गुरूजी के साथ कोई संपर्क नहीं रहा था। जून 1998 में मुझे अनिद्रा रोग ने घेर लिया। मेरी पत्नी ने परामर्श दिया कि गुरूजी को ढूंढ कर मैं उनकी शरण में जाऊं। काफी पूछताछ के बाद पता लगा कि गुरूजी चंडीगढ़ से जालंधर, जालंधर से पंचकूला और वहां से दिल्ली चले गये थे। मुझे उनका दिल्ली का पता मिल गया।

हमारे पड़ोसी, श्री कृत भाई भी गुरूजी से मिलने के लिए उत्सुक थे। अतः हम दोनों ने 10 जुलाई की राजधानी एक्सप्रेस में दो बर्थ आरक्षित करा लीं। 9 जुलाई को मैंने दिल्ली में गुरूजी के निवास पर हमारे आने का समाचार देने के लिए फोन किया। फोन का उत्तर देने वाले सज्जन ने पूछा कि क्या मैं अहमदाबाद से कर्नल चटर्जी बोल रहा हूँ? मेरे सहमत होने पर उन्होंने बताया कि आज गुरु पूर्णिमा के कारण गुरूजी पाठ में हैं पर उन्होंने बताया था कि शाम को सात बजे मैं अहमदाबाद से फोन करूँगा। गुरूजी को मेरे आने के बारे में ज्ञान था और उन्होंने मुझे 11 जुलाई को शाम 6 बजे आने को कहा है। स्वाभाविक है कि कृत भाई अचम्भे में थे।

दिल्ली जाते हुए यह जान कर कि मैं सो नहीं पाऊंगा मैंने अपने साथ इतिहास की एक मोटी पुस्तक रख ली थी। यह सोच कर गुरूजी तो अपने ही हैं, मैंने उनसे तीन बजे मिलने का निर्णय ले लिया। जब हम चार बजे सुल्तानपुर पहुंचे तो एक अनोखी घटना घटी। हमें एम्पाएर एस्टेट नहीं मिल पाया। कुछ देर घूमने के पश्चात् मुझे समस्या समझ में आ गयी। गुरूजी ने हमें छह बजे आने को कहा था और हम वहां चार बजे ही पहुँच गये थे। मैंने कृत भाई को बताया कि मुझे समस्या पता लग गयी है और अब उसका समाधान मिल जाएगा। मैं कार से उतरा और मैंने गुरूजी से प्रार्थना करी - जो हो गया सो घट गया, अब वह हमें अपने पास बुला लें। एकदम एक बालक दौड़ता हुआ आया और उसने पूछा कि हमारी कार कहीं जा नहीं रही है, हमें कहाँ जाना है। फिर उसने हमें एम्पाएर एस्टेट का मुख्य द्वार दिखाया - एकदम मुख्य मार्ग पर, कैसे दिखायी नहीं दिया था?

घर पहुँचने पर गुरूजी ने मेरा आलिंगन किया और बोले कि मैं इतने वर्षों के उपरान्त उनके पास आया हूँ, पिछले 21 दिन से सोया नहीं हूँ - आज सोऊंगा और लंगर ग्रहण करके जाऊं। लंगर के बाद हम अपने होटल में वापस आ गये और मैं वह इतिहास की पुस्तक पढ़ने लगा। शीघ्र ही मुझे लगा कि साथ वाले कमरे में कोई अगरबत्ती जला रहा है। थोड़ी ही देर में पूरे कमरे में एक अद्भुत सुगंध फ़ैल गयी और मुझे निद्रा आ गयी। अगले दिन मैं फिर गुरूजी के पास आया और उनके पैर दबाते हुए मैंने कहा, "गुरूजी, पहले आपके चारों ओर तीव्र सुगंध रहती थी, अब वह बहुत ही हल्की है।" गुरूजी बोले कि पिछले दिन जब वह मुझे सुलाने आये थे क्या मैंने उसका आनंद नहीं लिया था। मेरा अनिद्रा रोग समाप्त हो गया था!

उसी समय, नवम्बर 1999 में जब मैं अहमदाबाद से उनसे मिलने दिल्ली आया था तो उन्होंने कहा था कि मैं उनके पास आ जाऊँगा। सीमेंस में अपने साक्षात्कार से एक दिन पहले मैं गुरूजी से मिला और उनको इसका समाचार दिया। वह बोले कि मेरा चयन हो चुका है और उन्होंने मेरी आय भी बता दी। मुझे उतना ही प्राप्त हुआ।

लंगर और प्रसाद से चिकित्सा

2006 में कुछ मास से मेरी दाहिने हाथ की अंगूठी वाली अँगुली मुड़ नहीं रही थी। चिकित्सकों के अनुसार अस्थिरज्जू सूख गया था और उसका कोई सम्भव उपचार नहीं था। उन्होंने मुझे दर्द नाशक औषधियां लेने का परामर्श दिया। जब मैंने इस बारे में गुरूजी को बताया तो उन्होंने मुझे अपनी सब अंगूठियाँ उतारने को कहा। अगले दिन से उसमें वेदना समाप्त हो गयी पर बाएँ हाथ की वही अँगुली दर्द करने लगी। कुछ दिनों के पश्चात् जब मैंने गुरूजी को बताया तो उन्होंने मुझे गरम जल में अँगुली डालने को कहा। यह सोचकर कि इससे उपचार नहीं हो पायेगा मैंने उनसे पुनः निवेदन किया। उन्होंने मुझे लंगर खाने को कहा। तीन दिन लंगर खाने के बाद उस अँगुली में कोई कष्ट नहीं बचा।

2000 में एक प्रातः उठने पर मुझे आभास हुआ कि मेरे बाएँ हाथ में कोई अनुभूति नहीं है और मैं उसे हिला नहीं सकता था। मुझे पक्षाघात (पैरालिसिस) हो गया था। उस शाम को संगत में जब गुरूजी प्रसाद बाँट रहे थे मैंने उनसे इस बात की चर्चा करी। उन्होंने मुझे प्रसाद दिया और थोड़ा जोर से बोले कि मैं उसे बाहर जाकर खा लूँ। प्रसाद ग्रहण करते ही मेरे हाथ में सिहरन (तिंगलिंग) हुई। उन्होंने मुझे पुनः प्रसाद दिया - मैंने वह भी खाया। अब मैं अपने हाथ की अँगुलियां हिला सकता था। गुरूजी ने फिर से मुझे तीसरी बार प्रसाद दिया और उसे लेने के पंद्रह मिनट उपरान्त मेरा हाथ बिलकुल पहले की भांति हिलने डुलने लगा।

स्वर्गीय कर्नल (सेवानिवृत) दीप्तेंदु शेखर चटर्जी, गुडगाँव

जुलाई 2007