गुरु कृपा

डा चंद्र कांत पांडव, जुलाई 2007 English
मत को भ्रम भूले संसार।
गुरु बिना नहीं कोई उतरस पार।

बुधवार, 12 अक्टूबर 2005 को सुबह सुबह ही मेरे सहकर्मी डा. खिलनानी, एम्स में औषधि विभाग के अध्यक्ष का फोन आया कि उस दिन शाम को 5:30 बजे उनके घर में सत्संग का आयोजन है जिसमें गुरूजी भी आ रहे हैं। उन्होंने मुझे पत्नी सहित आने का आग्रह किया।

"क्या आप महाध्यापक की पदोनात्ति का उत्सव मना रहे हो? यह गुरूजी कौन हैं? उनका नाम क्या है? वह कहाँ से आ रहे हैं?" मैंने उन पर प्रश्नों की झड़ी लगा दी। उन्होंने केवल इतना उत्तर दिया, "उनका नाम गुरूजी है। आप जब शाम को उनको मिलोगे तो स्वयं ही जान लेना। धैर्य रखो।"

सामान्यतः मेरी पत्नी स्मिता साधु संतों में कोई विश्वास नहीं रखती थी। इस बार जब मैंने यह बात उसको बतायी तो उसका उत्तर पहले से भिन्न था, "संभव है इस बार कुछ अंतर हो। चल कर देखेंगे।"

कुछ देर पश्चात् मैंने अपने मित्र रश्मि और पंकज सिंह को फोन किया। मैं रश्मिजी को पिछले 35 वर्ष से जानता हूँ और उनके विवाह के पश्चात् पंकजजी को। मैं उनसे पंकजजी के पिता, भूतपूर्व प्रधान मंत्री, श्री चन्द्र शेखर, जिनको मैं स्वयं पिताजी कह कर संबोधित करता था, के स्वास्थ्य के बारे में जानना चाह रहा था।

उन्होंने कहा कि वह एम्स के एक निजी कक्ष में परीक्षणों के लिए प्रविष्ट हैं। यह सुनते ही मैं सीधे उनके पास गया। वार्तालाप करते हुए उन्होंने गुरूजी से पहले दर्शन के संस्मरण सुनाये। उन्होंने यह भी बताया कि वह लगातार एम्पाएर एस्टेट में स्थित गुरूजी के छोटे मंदिर में जाते रहें हैं, कैसे गुरूजी ने उनके जीवन का दृष्टिकोण ही परिवर्तित कर दिया है और कैसे उनकी दया से पिताजी का स्वास्थ्य सुधर रहा है।

"क्या आप डा. खिलनानी को जानते हैं?" रश्मिजी ने पूछा। मैंने उनसे इस प्रश्न का कारण जानना चाहा क्योंकि उनका नाम अभी तक हुई अपनी बातचीत में नहीं उभरा था। रश्मिजी ने उत्तर दिया, "आज शाम को उनके यहाँ सत्संग है और हमें गुरूजी को उनके घर लाना है।" मैंने आतुर हो कर प्रश्न किया कि यह गुरूजी कौन हैं और उनका नाम क्या है। रश्मिजी ने मुझे धैर्य रख कर शाम को स्वयं ही सब जान लेने को कहा।

मैं यह प्रसंग इतने विस्तार में इसीलिए सुना रहा हूँ कि कार्य समय आने पर ही पूर्ण होते हैं। जब तक गुरूजी नियत न करें उनके दर्शन संभव नहीं हैं। इसी कारण दो मित्रों से गुरूजी के बारे में सुन कर यही सन्देश मिला कि आकर दर्शन और आशीर्वाद ग्रहण करो। यह सम्पूर्ण संगत गुरूजी के दर्शन, कृपा और दया से धन्य है। इस जीवन काल में यह सुअवसर देने के लिए हम गुरूजी के अत्यंत आभारी हैं।

मैंने घर आकर स्मिता को जब इस घटनाचक्र के बारे में बताया तो मेरी भांति उसकी भी उत्सुकता बढ़ गयी। हम अपने घर में रुक न सके और ठीक 5 बजे डा. खिलनानी के घर पहुँच गये। वहां पर हम पहले पहुँचने वालों में थे। थोड़ी देर में रश्मिजी और पंकजजी रंगीन वस्त्र धारण किये हुए एक अति सुन्दर युवक को लेकर आये। वह तेजी से चलते हुए अन्दर आये और उन्हें एक अति शोभनीय कुर्सी पर आसीन किया गया।

हमने अनुमान लगाया कि यही गुरूजी होंगे। जैसे हम उनके निकट पहुंचे, रश्मिजी ने मेरा और स्मिता का परिचय करवाया। गुरूजी मुझे देख कर तुरन्त बोले, "डॉक्टर, तुस्सी बाहर जाओ।" मैंने स्मिता के कान में फुसफुसा कर कहा कि चलो चलते हैं, यह हमें इधर नहीं चाहते और हम कक्ष से बाहर जाने लगे। रश्मिजी ने तुरन्त हमको वापस बुलाकर गुरूजी के कथन का अर्थ बताया: वह हमें भारत से बाहर विदेश में देख रहे हैं। विदेश में हमारा भविष्य अति उज्जवल है। चिंता मुक्त, शांत भाव सहित हम गुरूजी के चरणों में बैठ गये।

वहां पर 250 - 300 सत्संगी आये होंगे। उनमें से अनेक पहली बार आये थे और अधिकतर मेरे सहकर्मी थे। गुरूजी के आदेश पर पुराने अनुयायी अपने अनुभव बता रहे थे। विषयों की कोई कमी नहीं थी - बच्चों की शिक्षा, विवाह, गर्भ धारण, अस्थमा, ह्रदय रोग, स्नायु और कर्कट रोग जैसे असाध्य रोगों से चमत्कारिक निवारण इत्यादि। साधारण रूप से कोई भी इन पर विश्वास नहीं करता परन्तु यह तो रोगियों और उनके परिवारों के निजी अनुभव थे। सबके स्वास्थ्य में सुधार आया था। बीच में कभी कभी गुरूजी बोलते थे कि इसका लौकिक रूप देखो, कष्ट कैसे घट रहें हैं।

उस दिन से गुरूजी के साथ हमारा संपर्क बन गया। अब हर दिन एक नये आविष्कार का दिन होता है - आत्मबोध और आत्मज्ञान का दिन। हम जब भी दिल्ली में होते हैं हम छोटे मंदिर में प्रति वृहस्पतिवार और रविवार को आते रहे हैं। मुझे अपने कार्य के सन्दर्भ में अक्सर यात्राएं करनी पड़ती हैं। पर दिल्ली में होने पर मानो कोई चुम्बकीय शक्ति हमें इस स्थान पर खींच लाती है। भीतर से उत्तेजना उठती है और इससे पहले कि हम कुछ सोचें हम उनके दर्शन हेतु जा रहे होते हैं।

चिकित्सक का उपचार

मैंने अप्रैल 2006 के अंत में बीती हुई शीत ऋतु में कुछ अंतर देखा। मैंने स्मिता को बताया कि इस बार मैंने किसी औषधि या श्वास यंत्र का प्रयोग नहीं किया। मेरे परिवार में दीर्घ काल से अस्थमा चला आ रहा है और मुझे सदा श्वास यंत्र की आवश्यकता रहती थी; एक या दो बार निश्चित रूप से मेरी छाती पक जाती थी और दस दिन तक मुझे प्रतिजैविक औषधियों का सेवन करना पड़ता था। लेकिन 2005 की शीत ऋतु में मैंने इनका प्रयोग ही नहीं किया।

जब मैंने गुरूजी को इस बारे में बताया तो उन्होंने उत्तर दिया कि मुझे उनकी कृपा प्राप्त हुई है और अब मुझे कभी दमा नहीं होगा। न तो मैंने गुरूजी को इस बारे में बताया था न ही उनसे इसके लिए मन ही मन प्रार्थना करी थी। मैं अति अचंभित हुआ। हमारे जीवन में इतना अंतर आया कि हम गुरूजी के दर्शन के लिए एम्पाएर एस्टेट प्रति वृहस्पतिवार और रविवार को आने लगे।

उनकी कृपा हमारे ऊपर बनी रही है। हमारी बेटी ऋजुता अमरीका में पढ़ रही थी। ह्यूस्टन स्थित राईस विश्वविद्यालय से संज्ञानात्मक स्नायुविज्ञान और संज्ञानात्मक मनोविज्ञान में उसका स्नातक का पाठ्यक्रम पूरा होने वाला था। यद्यपि उसे वहीँ पर शोध करने की अनुमति मिल गयी थी वह वहां पर और अध्ययन नहीं करना चाहती थी। वह अपना शोध एम आई टी या स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय जैसी विख्यात संस्थाओं से करना चाह रही थी। अभिभावक होने के नाते हमें लगता था कि उसकी यह अभिलाषा अव्यवहारिक है। न केवल उसके वीसा की समस्या थी, उसके पास इन संस्थाओं में प्रवेश के लिए समय भी कम था। स्मिता, उसकी माँ चिंतित थी।

एक बार जब गुरूजी ने ऋजुता के बारे में पूछा तो मैंने स्मिता की चिंता के बारे में बतलाया। गुरूजी ने तुरन्त चिंता छोड़ने को कहा और आश्वासन दिया कि सब कुछ ठीक हो जाएगा। उन्होंने पूछा कि मैं अगली बार अमरीका कब जा रहा हूँ। उसके स्नातक अधिवेशन में उपस्थित होने के लिए मैंने मई 2006 में जाने की योजना बनाई हुई थी। उस समय हमें यह देखने का अवसर मिला कि गुरूजी का आशीर्वाद प्राप्त होने के पश्चात् कैसे एक के बाद एक घटनाएं अनावृत होती जाती हैं और अंततः सब ठीक होता जाता है। ऋजुता अब बोस्टन स्थित एम आई टी के मस्तिष्क और संज्ञानात्मक विज्ञान विभाग से शोध कर रही है।

गुरूजी के पास आने के पश्चात् हम श्रद्धालुओं द्वारा कथित वृत्तान्त और अपने अनुभव समझने का प्रयास कर रहे हैं। हम गुरूजी के साथ क्या अनुभव करते हैं? संगत को सुनाये गये प्रसंगों की ऊर्जा, अपने को उसी पात्र में ढालने की प्रक्रिया, प्रतिदिन ग्रहण किया हुआ लंगर रुपी प्रसाद, गुरूजी द्वारा सबको दिया हुआ आशीष... सब अनुभवों में अपने अन्दर एक नवीन शक्ति, क्षमता आदि: संगत में पहुँचने पर चाहे कोई कितना भी थका हुआ हो वह यहाँ से चलने पर अपने भीतर एक नवीन ऊर्जा प्रसारित होते हुए अनुभव करता है और भले ही कितनी भी देर हो जाये वह रात्रि के उस काल में भी सुबह की भांति तरोताजा अनुभव करता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि गुरूजी के यहाँ सब समान हैं - धनवान या निर्धन, प्रधानमन्त्री या चपरासी, पुरुष या नारी, शहरी या ग्रामीण, भारतीय या विदेशी। यहाँ पर कोई रीति रिवाज नहीं हैं। किसी भी सत्संगी से पूर्ण आत्मसमर्पण के अतिरिक्त कोई आशा नहीं की जाती। गुरूजी में आस्था - और फल की आशा किये बिना विश्वास को ही तो आस्था कहते हैं।

गुरूजी हमें सर्वश्रेष्ठ मनुष्य बनाने का प्रयत्न कर रहे हैं। यहाँ आने के उपरान्त हमारा मिथ्या रूपी अभिमान समाप्त हो रहा है। हमारी प्रवृत्ति में भी परिवर्तन हो रहा है। हम उन्हीं घटनाओं को एक नये दृष्टिकोण से देखते हैं और मन को शांति प्राप्त होती है - अपनी आवश्यकताओं और लोभ का भेद समझते हैं। गुरूजी ने सुकर्म करने के विवेक का विकास किया है। हम गुरूजी के अनुयायी होने से धन्य हैं। हमने यह भी जाना है, "हमारे जीवन की मान्यताओं को बांटने से उनका मूल्य अधिक हो जाता है।" विनीत होकर हम अपने अनुभव अपने मित्रों और सहकर्मियों से बांटे हैं। हमारी जीवन यात्रा चल रही है। और इसके लिए हमारे ऊपर गुरु कृपा है - उसके लिए हम उनके अति आभारी हैं।

डा चंद्र कांत पांडव, नोएडा

जुलाई 2007