गुरूजी को एक सैनिक का अभिवादन

ले जन (सेवानिवृत) चन्द्र कैलाश कपूर, जुलाई 2007 English
पैंतीस वर्ष से अधिक समय तक सेना में कार्यरत रहने के कारण मैं सदा इसमें विश्वास करता था कि "एक सच्चा सैनिक परिस्थितिवश जीवित रहता है, चयन से प्रेम करता है और व्यवसाय के कारण मारता है।"

अपने जीवन की संध्याकाल में ही मुझे यह आभास हुआ कि मानवीय बुद्धि और भौतिक ज्ञान से आगे दिव्यता का अपार संसार है। आध्यात्मिकता के इन नये किन्तु रोचक क्षेत्रों का अनुभव मेरे लिए एक सुदूर स्वप्न था। पर मार्च 1999 के द्वितीय अर्ध में मेरे जीवन का मार्ग बदल गया। गुरूजी के कमल चरणों में, मेरे घर से कुछ ही दूरी पर, हिमालय की गुफाओं में घोर तपस्या किये बिना ही, मुझे अकल्पनीय दिव्यता का स्वरुप प्राप्त हुआ।

मैंने गुरूजी के बारे में अपने एक घनिष्ट मित्र, ले जन (सेवानिवृत) काहलों से सुना था। गुरूजी की दया से उनकी पत्नी का गठिया रोग (आर्थराइटिस) समाप्त हो गया था। आश्चर्यजनक रूप से, आदि शक्ति, श्री गुरूजी का आशीर्वाद प्राप्त करने का सौभाग्य मुझे चार पांच वर्ष के उपरान्त ही प्राप्त हुआ। सेना के ही एक अधिकारी, मार्च 1999 के अंत में, मुझे गुरूजी के पास ले गये। तब से मेरे जीवन के अनेक क्षेत्रों में परिवर्तन आया है। गुरूजी के प्रथम दर्शन के पश्चात् मेरा परिवार तेजोमय गुरूजी के संरक्षण में भाग्यवान रहा है।

मैं दृढ़तापूर्वक कह सकता हूँ कि गुरूजी शिव के अवतार हैं, जिनके पास, विशेष रूप से इस कलयुग में, विधाता द्वारा सब नश्वरों के समस्त कष्टों का निवारण करने का उत्कृष्ट कोष है। यह समझ लेना चाहिए कि गुरूजी न केवल इस ग्रह के कठिन से कठिन, असाध्य रोगों को समाप्त करने की अद्वितीय क्षमता और अदभुत शक्ति रखते हैं अपितु शिव की भांति वह वैद्यनाथ हैं। रोग का नाम लेते ही वह उसका उपचार अपनी अनोखी पद्धति से करते हैं; उनके कमल चरणों में समर्पण करते ही यह कार्य स्वयं ही आरम्भ हो जाता है। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली, पूरे भारत और विश्व में उनके लाखों अनुयायी इसका प्रमाण दे सकते हैं।

मेरी सेवानिवृत्ति के बाद अनेक अवसरों पर मुझे उनके स्पर्श मात्र से ही आशीष प्राप्त हुआ है; उस समय भी जब जीवन की सर्वाधिक सच्चाई, मृत्यु, मुख खोले मेरे सम्मुख खड़ी थी।

मधुमेह रोग से ग्रस्त मेरी पत्नी, सुशीला को भी गुरुकृपा प्राप्त हुई है। गुरूजी ने उसके दर्शन के प्रथम दिन ही उसे हाथ भर कर लड्डू और मिठाई का प्रसाद दिया और उसके मधु की मात्रा घट कर केवल 107 रह गयी। प्रायः भोजन करने से पूर्व उसकी मधु की मात्रा 200 से अधिक रहती थी। इस बार जब परीक्षणों में उसमें मधु की घटती हुई मात्रा के परिणाम आये तो मुझे सहसा अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। गुरूजी के दिव्य आशीष का यह प्रत्यक्ष प्रमाण था।

सितम्बर 2002 में मेरे वक्षस्थल में बहुत पीड़ा हुई और मुझे बायपास शल्य क्रिया करवाने का परामर्श दिया गया। दिल्ली स्थित रेफरेल और रिसर्च चिकित्सालय से मैं सीधा गुरूजी के पास गया। उन्होंने कहा कि यद्यपि मुझे स्टेंट की आवश्यकता नहीं है, दूरदर्शिता से मुझे शल्य क्रिया एस्कोर्ट में करवानी चाहिए। उन्होंने मुझे एक तांबे का लोटा लाने को कहा जिसे उन्होंने अपने हाथों से अभिमंत्रित किया। उन्होंने मुझे और मेरी पत्नी को उसमें से प्रतिदिन प्रातः खाली पेट जल पीने को कहा। उस दिन से हम दोनों उसमें से जल पीते आ रहे हैं। कठिन प्रतीत होने वाले ह्रदय रोग की चिंता से मैं मुक्त हो चुका हूँ।

भक्तों की सुनामी से रक्षा

मैं एक अन्य अविस्मरणीय सन्दर्भ की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ। 2004 के शीतकाल में गुरूजी ने जालंधर जाने से पूर्व सेवानिवृत सैनिकों को आशीर्वाद देने की आकांक्षा व्यक्त करी। मैंने गुरूजी को बताया कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में बहुत अधिक सेवानिवृत सैनिक नहीं होंगे तो क्या उस अवसर पर सेवारत सैनिकों, जो राष्ट्र के अमूल्य मानव संसाधन हैं, को भी बुला लिया जाये। सदा की भांति, उदार ह्रदय गुरूजी ने हामी भर कर कहा कि तिथि और स्थान के बारे में वह बाद में बताएँगे। कुछ दिनों के पश्चात् जब मैंने गुरूजी से पुनः इसका उल्लेख किया तो उन्होंने मुझे, श्री प्रेम सिंह, सिंगापुर में भारत के भूतपूर्व राजदूत, के साथ छतरपुर मंदिर के निकट एक स्थान का निरीक्षण करने को कहा। हम गुरूजी के एक अन्य अनुयायी, श्री क्लेर, के विस्तृत फार्म हाउस पर रात्रि में 11 बजे गये। वह अति उपयुक्त स्थान था - प्रेम सिंह और मैंने वापस आकर गुरूजी को समारोह के लिए पूर्ण योग्य स्थान बताया।

गुरूजी ने मुझे स्पष्ट कर दिया था कि मैं अपना ध्यान केवल सेवारत और सेवानिवृत सैनिकों पर केन्द्रित रखूँ। समारोह रविवार, 26 दिसंबर 2004, को होना था। कई भक्तों ने बाहर थाईलैंड, मलयेशिया, बैंकाक, कुआला लम्पपुर, अंडमान और निकोबार, गोवा अदि रमणीय समुद्र तटों पर छुट्टी के लिए जाने की योजना बनाई हुई थी। फलस्वरूप कई भक्तों ने गुरूजी से समारोह में न आने की आज्ञा मांगी परन्तु गुरूजी ने सबको बिना कोई बहाना किये आने का निर्देश दिया। क्योंकि गुरूजी के कथन सब के लिए निर्विवाद आज्ञा हैं, भक्तों ने अपनी योजनाएं रद्द या स्थगित कर दीं। इस प्रकार उस समारोह में सैनिकों के साथ अनेक अन्य असैनिक अनुयायी भी आये।

इस प्रकार गुरूजी ने अनेक जीवनों की रक्षा करी। सर्व विदित है कि उसी दिन एशिया महाद्वीप के दक्षिण तटों पर सुनामी की विनाश लीला हुई थी - अधिकतर यह वह स्थान थे जहाँ भक्तों ने बड़ा दिन और नव वर्ष की छुट्टियाँ मनाने की योजनाएं बनायीं थी। इन सब भक्तों को गुरूजी ने नव जीवन दान दिया था।

गुरूजी अपने भक्तों को प्राकृतिक आपदाओं से बचाने और आशीष देने के लिए अनोखे मार्ग अपनाते हैं। गुरूजी अपने भक्तों का वह अभेद्य कवच हैं जो उनकी बड़ी से बड़ी विपदाओं से रक्षा करता है। उनके पास रक्षा प्रदान करने वाले की शक्ति और संवेदना है; वह परम आनंद के दाता हैं जो उस दयालु ईश्वर के अतिरिक्त और कोई नहीं हो सकता।

तीन गुरुमंत्र: धर्म का सार

एक दिन रात्रि को दो बजे के आस पास, जब कुछ अनुयायियों के समक्ष मैंने उनसे जाने की आज्ञा मांगी तो उन्होंने मुझसे प्रश्न किया कि मुझे ईश्वर और धर्म के बारे में क्या पता है। जब मैं अपने उत्तर से उनको संतुष्ट नहीं कर पाया तो वह जोर से हँसे और मुझे जनरल साहब संबोधित करते हुए बोले कि यदि मुझे धर्म के बारे में नहीं पता तो चिंता न करूं। यद्यपि गुरूजी कभी प्रवचन नहीं देते, फिर भी, उसी समय उन्होंने धाराप्रवाह भाषा में कुरान, बाइबल, भगवद गीता और गुरु ग्रन्थ से धार्मिक पद और श्लोक अति प्रमाणिकता और प्रेम से सुनाये। उनके मुख से शब्दों का उच्चारण ऐसी शुद्धता और पवित्रता से हो रहा था जैसे गंगा अपने स्त्रोत, शिव की जटाओं से प्रवाहित होती है। हम सब अति नम्रता और शांति से विस्मित खड़े थे। समाप्त करने के थोड़ी देर के पश्चात् गुरूजी ने प्रश्न किया कि अपने अध्यात्मिक ज्ञान के असीमित कोष से जो उन्होंने अभी बांटा था उससे हम सब क्या समझे। जब हमने अपने कंधे हिलाते हुए अपनी बेबसी प्रकट करी तो वह पुनः हँसे और धीरे - धीरे उन्होंने प्रभावपूर्ण ढंग से, बल देते हुए तीन स्वर्णिम, दिव्य मन्त्र दिए जो आनंदमय आध्यात्मिक जीवन व्यतीत करने के प्रयास में हमारे पथप्रदर्शक और आस्था के सूचक बन गये हैं। उनके प्रवचन का सार तीन नियमों पर केन्द्रित था जिन्हें मानव धर्म का आधार कहा जा सकता हैं। उन्होंने कहा:

1. सब धर्म एक हैं। सब भगवान एक हैं। सब धर्म प्रेम, दया और मनुष्यों के प्रति सेवा भाव का उपदेश देते हैं।

2. जाति, रंग, भेद, धर्म, निष्ठा आदि का ध्यान न रखते हुए हर समय, हर स्थान पर सबकी सहायता करो। यदि किसी कारणवश ऐसा नहीं कर पायें तो उसकी हानि भी नहीं करें।

3. इस भौतिक संसार की माया, बाह्य आमोद - प्रमोद, स्वप्न और इच्छाओं से अपने को मुक्त करो। प्रतिदिन अपने व्यस्त कार्यक्रमों में से थोड़ा सा समय निकल कर, समाधि में बैठ कर जीवन में निपुणता प्राप्त करने के लिए और आध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर होने के लिए ध्यान करो।


सारांश में उन्होंने सुझाव दिया कि "अपना कुछ ध्यान, ऊर्जा और समय उस दिव्य परमात्मा को प्राप्त करने के लिए उसकी ओर केन्द्रित करो"।

उस रात मुझे अपने जीवन का सबसे बड़ा पाठ मिला और "मानवता की सेवा ही प्रभु की सेवा है" उक्ति में मेरे विश्वास को और बल मिला।

"जनरल कपूर, न्यू लाइफ...गो”

2005 में, एक दिन जब मैं डी एल एफ, गुडगाँव में अपनी पत्नी के साथ प्रातः भ्रमण के लिए निकला था तो एक मदहोश सांड ने मेरे वक्षस्थल पर अपने सींग मार दिए। मैं कुछ घंटे बेहोश रहा। जब मेरी चेतना लौटी तो मैं रेफेरल और रिसर्च चिकित्सालय के गहन चिकित्सा केंद्र में लेटा हुआ था। मेरी पत्नी और कुछ सम्बन्धी मेरी शय्या के किनारे थे। मुझे लगा कि मेरा अंतिम समय आ गया है। शाम को मेरी पत्नी और बेटी गुरूजी के पास गये। पूरा सन्दर्भ सुन कर और कुछ समय तक चुप रहने के बाद उन्होंने मेरी पत्नी को प्रसाद दिया जो मैंने अगले दिन चिकित्सालय में खाया। फिर मेरी पत्नी ने मुझे गुरूजी का चित्र देकर उसे तकिये के नीचे रख दिया। अर्ध चेतनावस्था में रहते हुए, बीच बीच में, जब भी मुझे होश आता तो मैं गुरूजी को याद करता था। उन्हीं की कृपा से मुझे, शीघ्र ही, घर जाकर दो सप्ताह तक पूर्ण विश्राम करने की आज्ञा मिल गयी। परन्तु उसी दिन शाम को मैं गुरूजी के पास चला गया। उन्होंने मुझे आशीर्वाद दिया और बोले, "जनरल कपूर, न्यू लाइफ…गो"। घर लौटते हुए मैंने अपनी पत्नी को कहा कि गुरुकृपा से मुझे कुछ नहीं होगा।

इस घटना का वर्णन करते हुए मुझे एक अन्य घटना याद आ रही है जब मार्च 1999 में मैंने पहली बार उनके दर्शन किये थे। बैठने के कुछ ही देर के बाद उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया और प्रश्न किया कि मैं उनके बारे में कब से जानता हूँ। मैंने उत्तर दिया कि 1995 से। उन्होंने शरारती मुस्कान देते हुए पूछा कि मैं उस समय क्यों नहीं आया। मैं निरुत्तर था और मुझे कुछ कहना सूझ नहीं रहा था। गुरूजी ने जब चमकती आँखों से मेरी ओर देखा तो मैं बोला कि यही मेरी नियति रही होगी। गुरूजी फिर बोले कि यदि मैं उस समय आया होता तो संभवतः मुझे अधिक लाभ अवश्य मिलता किन्तु जीवन की उस अवस्था में वह समय उचित नहीं था।

मुझे पाठ मिला कि गुरु कृपा उचित समय आने पर ही मिल सकती है, जो हमारे पूर्व और वर्तमान जन्म के कर्मों पर निर्भर करता है। उनके पास आकर देवत्व के द्वार खुल जाते हैं!

एक दिन, दिसम्बर 2005 में, संगत के पश्चात् मैं गंभीर रूप से बीमार हो गया और श्वस्नक ज्वर होने की अवस्था में मुझे आर आर चिकित्सालय ले जाया गया। मेरे सिर और पूरे शरीर में अति तीव्र वेदना हो रही था। ज्वर 104° तक पहुँच गया था और किसी भी प्रकार की औषधियों से उतरने का नाम नहीं ले रहा था। यद्यपि चिकित्सालय के उप कमांडेंट मेरे मित्र थे और मेरा वहां के गहन चिकित्सा केंद्र में बहुत ध्यान रखा जा रहा था, यह ज्वर अजेय शत्रु सिद्ध हो रहा था।

एक बार पुनः मैंने गुरूजी से, जो सदा मुझे विपत्तियों और वेदना से मुक्त करते आये हैं, विनती करी। मुझे याद है कि चिकित्सालय में, जब मैं इस ज्वर से लाभान्वित हो रहा था, रक्षा विभाग के कुछ अधिकारियों और अन्य अनुयायियों ने, गुरूजी के कहने पर, उनको गुड़गांव में सम्मानित करने के लिए, दिसंबर 2005 के एक रविवार को समारोह का आयोजन किया था।

सैनिक चिकित्सालय में एक निमोनिया के लाभान्वित होते हुए रोगी को, जिसका जीवन यंत्रों के माध्यम से उपचार हो रहा हो, बाहर निकलना अत्यंत कठिन है। क्योंकि मैं गुरूजी के दर्शन करने को उत्सुक था, मैंने चिकित्सकों से, जिद्दी बच्चे की भांति, समारोह में कुछ घंटों के लिए बाहर जाने के लिए, विनती करी और समारोह के उपरान्त वापस आने का वचन दिया।

मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब मुझे, सम्पूर्ण संगत की ओर से, गुरूजी को पुष्पमाला पहनाने को कहा गया। उसके बाद मैं उनके प्रेम में डूब गया जब गुरूजी ने मुझे अपने ग्लास से पीने के लिए नारियल का जल दिया। मैं अपने को संभाल नहीं पाया और मेरी आँखों से अश्रुधारा बह निकली। मैंने उस ग्लास को अपने मस्तक से स्पर्श किया और उसका पूरा जल, जो गुरूजी पी रहे थे, मैं पी गया। मैंने अपनी प्यासी आत्मा की अनंत प्यास बुझा दी। इससे पहले मैंने, कभी भी, उस जल से स्वादिष्ट कुछ नहीं चखा था; मेरे लिए वह उनके अपार स्नेह का अमृत था। सम्मान स्वरुप मैं उनको केवल अपने भावविह्वल मनोभावों का हार भेंट कर सकता था। कहने की आवश्यकता नहीं है कि मैं आशा से कहीं अधिक शीघ्रता से स्वस्थ हुआ और अपने सब कार्य सामान्य रूप से करने लगा। इन सब चमत्कारों ने सिद्ध कर दिया है कि गुरूजी एकमात्र परम सत्य हैं। वह अपने अनुयायियों से केवल सम्पूर्ण समर्पण की आशा करते हैं। सम्पूर्ण समर्पण का अर्थ है सम्पूर्ण निवारण और असम्पूर्ण का अर्थ है असम्पूर्ण निवारण।

गुरूजी ने मेरी पुत्रियों पूजा और आरती को भी आशीर्वाद दिया है। उन्होंने मेरी बड़ी बेटी पूजा के लिए एक सुयोग्य वर भी बताया था जिससे विवाह कर वह सुखपूर्वक जीवन व्यतीत कर रही है। उन्होंने मेरी पत्नी को अमरीका घूम कर आने को कहा यद्यपि वह उस समय मात्र स्वप्न था। हमने कहा कि आरती तो घाना में है। किन्तु उन्होंने जोर डाला कि हम यात्रा पर जाएँ। कुछ ही दिनों में आरती ने फोन पर बताया कि वह गर्भावस्था में है और वह सब शीघ्र ही न्यू यॉर्क जा रहे हैं, जहाँ उसके पति को एक नया काम मिल गया है। बिना किसी हिचकिचाहट के मैंने उनको वहां जाने को कहा और यह भी बताया कि उसकी माँ समय पर वहां आ जायेगी। गुरूजी के आशीर्वाद से हम तीन बार अमरीका गये और वहां पर अत्यंत मनोरम समय व्यतीत किया।

अकस्मात् मेरी पत्नी को, अपनी पहली अमरीका यात्रा पर, मधुमेह के कारण चिकित्सालय में प्रविष्ट करना पड़ा था। मैं अपनी पत्नी को शीघ्र स्वस्थ करने के लिए गुरूजी से विनती करने गया। प्रसंग सुनकर उन्होंने मुस्कुरा कर मुझे चिंतामुक्त रहने को कहा और यह भी बताया कि वह शीघ्र ही घर आ जायेगी। उनकी दया से दो दिन के पश्चात् ही वह घर आ गयी।

कमल चरणों में

गुरूजी की पवित्र अनुकम्पा से अंधे देख सकते हैं, लंगड़े नृत्य कर सकते हैं, जनन शक्तिहीन के संतान हो सकती है, मानसिक और शारीरिक रोगियों की मुस्कान लौट आती है और वह पुनः जीवन का आनंद उठाना आरम्भ कर देते हैं। उन्होंने अपने अनुयायियों को एड्स, केंसर और ह्रदय के रोगों से मुक्त किया है। चिकित्सालयों में जीवन रक्षा उपकरणों पर रह रहे रोगियों को नव जीवन प्राप्त हुआ है। इस कलयुग में शिव अवतार के अन्यथा कोई और शक्ति सादी सी चाय और लंगर के रूप में प्रसाद से अपने भक्तों का भला नहीं कर सकती। उनके भक्त अत्यंत विश्वास से अपनी समस्त समस्याओं से मुक्त होने के लिए यह प्रसाद संगत में ग्रहण करते हैं और सत्संग सुनते हैं।

मेरे जैसे सैनिक के लिए पीड़ित, विकलांग, जरूरतमंद, वंचित और योग्य, परन्तु अक्षम, विलक्षण पर भयभीत की सहायता का ब्रह्मास्त्र उनको गुरूजी के मंदिर का द्वार दिखाना है। निवारण की निर्मल, स्वच्छ और दिव्य आशीर्वाद की तरंगें गुरूजी के कमल चरणों से परम शांति के अथाह सागर, धीरता, आनंद और ज्ञान के दीपक की नदी का रूप ले कर प्रवाहित होती है।

हमारे सुकर्म और अनदेखे भविष्य के कारण हम आदरणीय गुरूजी की पवित्र अनुकम्पा प्राप्त कर सकते हैं। या तो आप अपने आप को प्रेम के आनंदमय सागर में डुबो सकते है अथवा अपने पिछले और इस जन्म के कर्मों के आधार पर गुरुकृपा से मोक्ष प्राप्ति कर सकते हैं। केवल पूर्ण आत्मसमर्पण करने मात्र से इस विशाल सागर में डुबकी लगाकर प्रत्येक जन्म में गुरूजी की छत्रछाया का अनुभव कर सकते हैं। आज मेरा पूरा संसार गुरूजी के इर्द - गिर्द ही घूमता है, जो न केवल परमात्मा हैं, अपितु मोक्ष प्राप्ति के मार्ग में समस्त बाधाओं को दूर करने वाले अभिभावक हैं। मेरे जैसे नश्वर के लिए उनकी स्फूर्तिदायक सुगंध और उनकी उपस्थिति प्रेरणा के स्त्रोत हैं। पूजनीय गुरूजी सर्वशक्तिशाली, सर्वज्ञाता और सर्वत्र विद्यमान हैं। उन्हें अपने सब भक्तों के भूत, वर्तमान और भविष्य का ज्ञान है। वह परमात्मा की भांति अपने समस्त अनुयायियों की धार्मिक उन्नति और दिव्य आनंद की प्राप्ति में सहायता करते हैं। उनके चमत्कार उन्हीं के लिए होते हैं जो उसमें विश्वास रखते हैं।

भवसागर पार करने के लिए अच्छे कर्मों से स्फुटित होती सकारात्मक किरणें और सादर गुरूजी में अविचल आस्था बनाये रखने की आवश्यकता है। सबसे अधिक महत्वपूर्ण है मेरे जैसे सैनिक और योद्धा बनने का अविरल प्रयास, जो निर्वाण के अनजान क्षेत्रों से होकर जाते हुए कठिन मार्ग पर आ रही समस्त बाधाओं का सामना करने का साहस दे।

अत्यंत नम्रता से मैं परम पूजनीय आदरणीय गुरूजी के कमल चरणों में नमन और उनका अभिवादन करता हूँ।

ले जन (सेवानिवृत) चन्द्र कैलाश कपूर, पी वी एस एम, ऐ वी एस एम, गुड़गांव

जुलाई 2007