कुर्बान जाँवी उस वेला सुहावी जित तुम्हरे द्वारे आया

भगवान दास जेथरा, अप्रैल 2008 English
हमारे विषय में यह कथन शत प्रतिशत सही है। मार्च 1998 में हमें गुरूजी के पहली बार दर्शन हुए। उसी दिन उन्होंने हमें अपनी शरण में ले लिया। उस दिन से, हमारी ज़िन्दगी पूरी तरह से बदल गयी। वाकई में वह हमारी ज़िन्दगी का सबसे भाग्यशाली और सुनहरा दिन था।

मैं गुरूजी के पास तब गया था जब मेरी ज़िन्दगी, बल्कि बोला जाये तो मेरा पूरा परिवार ध्वस्त हो गया था। मेरे सबसे बड़े बेटे सुमीत को एक लाइलाज कैंसर से डायग्नोज़ किया गया था। मेरी पत्नी की एक सहकर्मी डॉक्टर ने हमें गुरूजी के बारे में बताया। हम उनके पास गये क्योंकि हमारे पास और कोई उम्मीद या चारा नहीं था। परन्तु, एक बार उनकी शरण में आने के बाद, उन्होंने हमारी ज़िन्दगी के हर पहलू का ऐसा ध्यान रखा कि फिर कभी ना तो हमने मुड़कर देखा और ना ही कहीं और जाने के बारे में सोचा।

मैं यह बात स्वीकारता हूँ कि इसका एहसास मुझे उस समय नहीं हुआ। पर अब जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ कि हमें कितने अनगणित आशीर्वाद प्राप्त हुए और कितने चमत्कार हमने देखे, तो मेरे मन में कोई शंका नहीं है कि वह भगवान शिव के अवतार हैं, जिन्होंने सिर्फ अपने भक्तों को आशीर्वाद देने के लिए मनुष्य रूप धारण किया। सुमीत का कैंसर मेरे परिवार के लिए एक अप्रत्यक्ष कृपादान साबित हुआ जो हमें गुरूजी की ओर ले गया।

सुमीत ने अपने सत्संग का वर्णन अलग से विस्तारपूर्वक किया है। हमारे परिवार के हर सदस्य को गुरूजी के इतने आशीर्वाद प्राप्त हुए हैं कि उन सबका वर्णन कर पाना भी नामुमकिन है, उनका धन्यवाद करने के बारे में तो क्या ही कहें।

मुझे नव जीवन दान दिया

मैंने भारत सरकार द्वारा आयोजित कैलाश मानसरोवर यात्रा पर जाने की योजना बनायी थी। जब मैंने गुरुजी से आज्ञा माँगी तो उन्होंने कहा कि मैं वहाँ क्यों जाना चाहता हूँ जब शिव तो मेरे समक्ष यहीं पर उपस्थित हैं। स्वाभाविक है, मैं, यात्रा पर नहीं गया।

उस वर्ष यात्रा मार्ग पर अनेक भूस्खलन हुए जिनमें 20 श्रद्धालुओं के दो दल उनके नीचे आ गये और उनमें से अनेकों की मृत्यु हो गयी। गुरुजी को इस बात का पहले ही आभास था और उन्होंने मुझे जाने से रोक दिया था। बाद में वह बोले कि देखो मैंने तुम्हारी जीवन रक्षा की है।

उन्होंने एक बार फिर मेरी रक्षा की

मुझे गंभीर हृदय रोग था और एंजियोग्राफी की सलाह दी गयी थी। गुरुजी के निर्देश के अनुसार यह अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में हुई। इस पद्धति के बाद मुझे गहन सेवा केंद्र में ले जाया गया क्योंकि मुझे शांत दिल का दौरा पड़ चुका था। मेरी दो रक्त धमनियाँ करीब-करीब पूरी बंद थीं और तीसरी 90 प्रतिशत बंद थी।

उसी दिन दोपहर में मुझे फिर से दिल का दौरा पड़ा। गहन सेवा केंद्र में होने के कारण मेरा तुरन्त उपचार हो गया। यदि मैं घर पर होता तो मेरे पास चिकित्सालय तक पहुँचने का समय नहीं होता। रात्रि दस बजे हमें बताया गया कि मेरे हृदय की बायपास शल्य क्रिया उसी समय होनी आवश्यक है, पर दो कारणों से यह विपत्तिजनक है। प्रथम, मेरे हृदय के अवरोधों के कारण और दूसरा, मेरा रक्त पतला करने की औषधियों के लगातार सेवन के कारण। मेरे परिवार के सदस्यों ने जब गुरुजी से उनकी कृपा का अनुग्रह किया तो वह बोले कि चिकित्सकों को अपना कार्य करने दो, मेरे शरीर के अन्दर का वह संभाल लेंगे।

फिर उन्होंने ठीक वही किया। उसी रात को मेरे हृदय की शल्य चिकित्सा हुई। अन्दर अत्याधिक रक्त प्रवाह और अन्य बाधाएँ थीं, पर गुरुजी की कृपा से सब कुशलपूर्वक हो गया। अब वह समय बीत गया है और मैं बिल्कुल सामान्य हूँ। इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि उन्होंने मुझे नव जीवन प्रदान किया है।

दोबारा नव जीवन दिया

एक तीसरा अवसर, 31 दिसंबर 2006 को आया। हर वर्ष की भाँति बड़े मंदिर में आयोजन था। देर रात में, जैसे संगत ने जाने के लिए गुरुजी से आज्ञा लेनी आरम्भ की, उन्होंने मेरे परिवार के सदस्यों को तो जाने की अनुमति दे दी पर मुझे रुकने को कहा। एक घंटे के उपरान्त उन्होंने कहा कि उन्होंने मुझे नव जीवन दिया है और अब मैं जा सकता हूँ। उस समय मैं उनके शब्दों का तात्पर्य नहीं समझ पाया पर जब मैं घर पहुँचा तो पता लगा कि मार्ग में, जिस कार में मेरा परिवार जा रहा था, घने कोहरे के कारण दुर्घटना ग्रस्त हो गयी थी - ठीक उसी समय जब गुरुजी ने मुझे नया जीवन देने की बात की थी। एक गति अवरोध पर सामने वाली कार ने अचानक ब्रेक लगा दिया और मेरे पुत्र के कार रोकने के सब प्रयास असफल रहे थे। वह अगली कार से ज़ोर से टकरा गई। सामने का बम्पर और जाली क्षतिग्रस्त हो गये, मेरी पत्नी का सिर सामने शीशे से टकराया जो टूट गया। पर किसी भी यात्री को कोई चोट नहीं आई। गुरुजी के पास अगले दर्शन पर वह बोले कि उन्होंने पूरे परिवार की रक्षा की थी। आज भी हमारा परिवार उनकी इस कृपा के लिए कृतज्ञ है।

स्पष्टतया, गुरुजी सबका भविष्य जानते हैं और विनती किये बिना जो हित में होता है, वह करते हैं। अनेक बार तो पता भी नहीं चलता कि उन्होंने क्या किया है। वह सब भक्तों की सहायता करते हैं। हमें केवल इतना ज्ञान है कि वह सदा हमारी समस्याओं, चिंताओं और कष्टों को दूर कर देंगे; हम अपने सब मानसिक तनाव उन पर छोड़ कर शांति पूर्वक रह सकते हैं।

गुरुजी को मिले बिना उपचार

मेरे ससुर की आयु नब्बे वर्ष से ऊपर रही होगी। वह मनोभ्रंश (डिमेंशिया) रोग से ग्रस्त थे जो बड़े लोगों को अक्सर हो जाता है। कभी-कभी मेरे ससुर परिवार में किसी को पहचानते नहीं थे, आक्रामक हो जाते थे और मतिभ्रम होकर कल्पना करने लगते थे। उन्हें गुरुजी में विश्वास नहीं था और कभी उनसे मिले भी नहीं थे। गुरुजी ने मेरी पत्नी की प्रार्थना का उत्तर दिया और इस रोग से, जिसका आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में कोई उपचार नहीं है, उनको 90 प्रतिशत तक राहत मिल गई।

छोटे पुत्र और मुझे नौकरी मिली

मेरा छोटा पुत्र एक इंजीनियर है और वह पूंजी बाज़ार में लगा हुआ था। एक बार गुरुजी ने उससे प्रश्न कर उसे नया कार्य करने की सलाह दी। मेरा पुत्र कई दिनों तक नौकरी ढूँढता रहा पर उसे सफलता नहीं मिली। एक दिन गुरुजी ने पुनः उससे प्रश्न किया और नकारात्मक उत्तर मिलने पर कहा कि उसे 15 दिन में नया कार्य मिल जाएगा। एक सप्ताह में उसको साक्षात्कार के लिए आमंत्रण आ गया और तेरहवें दिन उसे नया कार्य मिल गया।

छः वर्ष पूर्व मैं योजना आयोग से सेवा निवृत हुआ था। उसके बाद मैं कुछ कार्य करना चाहता था पर मुझे कोई अच्छा कार्य नहीं मिल रहा था। गुरुजी ने कुछ अवसरों पर सुझाव दिया था कि मैं किसी अच्छी संस्था में सलाहकार का काम कर लूँ। मैं अच्छे कार्य की खोज में लगा रहा। एक दिन अचानक एक पुराने मित्र मिले जिन्होंने एकदम मुझे मेरी पसंद का कार्य दे दिया। संयोग से यह गुरुजी की महासमाधि के कुछ समय उपरान्त हुआ। इससे यही सिद्ध होता है कि गुरुजी अभी भी हमारे साथ हैं और हमारी सहायता कर रहे हैं।

संसाधन के अभाव में गृह निर्माण

सेवारत होते हुए मैं चाणक्य पुरी में सरकारी निवास में रहता था। सेवा निवृत होने के बाद मैंने द्वारका में एक छोटे घर में रहने का निर्णय ले लिया था। पर गुरुजी ने मुझे गुड़गाँव में एक 500 गज़ का प्लाट लेकर घर बनाने को कहा। उनसे बार-बार निवदेन करने पर उन्होंने 360 गज़ का छोटा प्लाट लेने को कहा। आर्थिक अथवा शारीरिक रूप से मेरी इतनी सामर्थ्य नहीं थी कि मैं ऐसा कर सकूँ। पर जब निर्माण आरम्भ हुआ तो मुझे अपनी भूल का एहसास हुआ। गुरुजी की दया निर्माण कार्य में विदित थी। जब भी धन की आवश्यकता पड़ती थी, वह मिल जाता था।

इस सन्दर्भ में दो दृष्टांत पर्याप्त होंगे। सामान्यतः बैंक, सेवा निवृत लोगों को ऋण देना नहीं चाहते पर मुझे बैंक के अधिकारी ने स्वयं ऋण देने की बात कही और वह बिना किसी कठिनाई के मिल भी गया। यद्यपि हमारी पैतृक संपत्ति थी, मेरे भाई-बहनों में मतभेद थे और ऐसा प्रतीत नहीं होता था कि यह कभी मिट पाएँगे। एक दिन जब मैं बड़े मंदिर में था, मेरी बहन ने फोन किया और कहा कि सब मतभेद समाप्त हो गये हैं, एक खरीदार मिल गया है और मुझे पहली किश्त अगले दिन मिल जायेगी। इस प्रकार गुरुजी की कृपा से कभी भी धन की कमी नहीं हुई।

रोग से पहले उसका निदान

गुरुजी ने मेरी पत्नी को ताम्र लोटा लोने को कहा। हम चकित रह गये क्योंकि मेरी पत्नी को बढ़ती आयु की समस्याओं, कोलेस्ट्रोल और यूरिक अम्ल के अन्यथा और कुछ नहीं था। पर हमने गुरुजी के निर्देशों का पालन किया। गुरुजी द्वारा अभिमंत्रित ताम्र लोटे से मेरी पत्नी ने प्रतिदिन जल पीना आरम्भ किया। कुछ दिन बाद ही वह रोग ग्रस्त हो गयी। परीक्षणों से ज्ञात हुआ कि यद्यपि उसके हिमोग्लोबिन में सुधार हुआ था पर कोलेस्ट्रोल और यूरिक अम्ल में गिरावट आ गयी थी। इतने अच्छे परिणाम तो पिछले 40 वर्ष में कभी नहीं आये थे। तत्पश्चात् वह शीघ्र स्वस्थ भी हो गयी। स्पष्ट था कि गुरुजी को उसके रोग का पूर्वाभास था और उन्होंने उसे पहले ही रोक दिया था।

मधुमेह का मीठा उपचार

मेरी माँ, जो सत्तर वर्ष से ऊपर थीं, मधुमेह रोग से पीड़ित थीं। उन्हें रोज़ इंसुलिन इंजेक्शन लेना पड़ता था। इसके अलावा हृदय और यकृत की समस्याएँ थीं, गठिया और अपचन भी थे।

वास्तव में वह गुरुजी ने पास आने की अभिलाषा रखते हुए भी आने का साहस नहीं जुटा पाती थीं क्योंकि संगत में ज़मीन पर बैठना पड़ता था। परिवार के बार-बार कहने पर उन्होंने आना आरम्भ किया।

पहले दिन ही गुरुजी ने उनकी मुठ्ठी भर कर बर्फी प्रसाद दिया। मधुमेह का विचार कर, उन्होंने थोड़ा सा खाकर शेष बच्चों के लिए रख लिया। इतनी बड़ी सभा में किसी साधारण व्यक्ति के लिए यह देख पाना संभव नहीं था। पर गुरुजी तो अन्तर्यामी हैं और सब देख सुन सकते हैं। उन्होंने उन्हें बुला कर, पहले से भी अधिक बर्फी प्रसाद देकर संगत में ही समाप्त करने का निर्देश दिया। उन्होंने वैसा ही किया और कुछ दिनों के उपरान्त चिकित्सकों ने उनके मधुमेह में आश्चर्यजनक सुधार देखा। उनके इंसुलिन इंजेक्शन बंद कर दिए - चिकित्सा विज्ञान में ऐसा संभवतः कभी न हुआ हो। पर जैसा कहते हैं कि गुरुजी की दया वहाँ पर आरम्भ होती है जहाँ चिकित्सा विज्ञान असफल हो जाता है। उनके गठिये में भी सुधार आया और ऐसा ही हृदय रोग में हुआ। वह अब घंटों अपने पैर मोड़ कर बैठ सकती थीं। उनके हृदय की औषधियाँ भी कम कर दी गयीं।

यह सब गुरुजी को उनकी स्थिति बिना बताये हुआ। इसमें कोई संशय नहीं है कि गुरुजी हर स्थान पर हैं, उन्हें बताये बिना उन्हें सबका ज्ञान है और वह सब करने में सक्षम हैं। वह अपने अनुयायियों के हित में जो भी है, वह स्वयं कर देते हैं।

भगवान दास जेथरा, गुडगाँव

अप्रैल 2008