सत्संग से जिंदगी की रक्षा

अश्विनी एवं राजेंद्र देव, जून 2015 English
मैं गुरूजी की शरण में जून 2009 में आई, जब हमें एक भक्त ने गुरूजी के बारे में बताया। उस समय हम जेद्दा में रह रहे थे।

हम 2010 में यू. एस. में चले गए। दो वर्ष पश्चात हमारी बेटी पाचन संबंधी रोग से पीड़ित हो गयी। तरह तरह की जाँच और दवाईओं से उसको कोई आराम नहीं मिला। 2013 में हम लोग भारत वापस आ गए। हम बेटी को दिल्ली में चिकित्सकों के पास ले गए। उसकी स्थिति में कुछ देर के लिए सुधार आया परन्तु वह किसी प्रकार का भी खाना नहीं पचा पाती थी। जो कुछ भी खाती थी या पीती थी, सब निकल जाता था।

पर बड़ी कृपा तब हुई जब हम बड़े मंदिर में गुरूजी के दर्शन करने के लिए गए।

उसी समय कुछ अनोखी घटनाएं हुईं। ज्योंही मैं खाना पकाती थी, कुछ खाने की वस्तुएं गायब हो जाती थीं। हम समझ नहीं पा रहे थे कि क्या हो रहा था। फिर हम ने यह निर्णय लिया कि गुरूजी संकेत दे रहे हैं कि यह वस्तुएं जो गायब हो रही हैं, बेटी के लिए ठीक नहीं हैं। उस दिन के पश्चात हम ने वह सामग्री अपने भोजन में से निकाल दी। इसी बीच हम कुछ सत्संग में भी भाग ले सके। मेरी बेटी की हालत में धीरे धीरे सुधार आने लगा।

फिर एक दिन बेटी ने बताया कि गुरूजी ने उससे बात की है। जब वह खाया हुआ हजम नहीं कर पा रही थी तो उसने एक आवाज़ अपने कानों में सुनी "तुम ठीक हो जाओ गी"। उस दिन के पश्चात उसकी स्थिति में और सुधार आया। आज वह घर का बना हुआ साधारण खाना खा सकती है। हालाँकि अभी भी कई प्रतिबंध हैं। हमें प्रसन्ता है कि वह कम से कम कुछ खाने की वस्तुएं पचा सकती है। स्पष्ट रूप से गुरूजी प्रत्येक आवश्यकता का ध्यान रखतें है और हमें किसी प्रकार की चिंता नहीं करनी चाहिए। हमें केवल गुरूजी के चरणों में पूर्ण रूप से आत्मसमर्पण करना चाहिए, गुरूजी हमें स्वस्थ और प्रसन्न रहने के लिए पथ प्रदर्शन करते हैं।

एक अविश्वसनीय आशीर्वादों का माह

भारत में आने के बाद हम ने पुणे में अपना निवास स्थान लिया। गुरूजी ने यहाँ भी मेरी जिंदगी की रक्षा की। जून 2015 में, मैं एक सत्संग में भाग लेने जा रही थी। मैंने सत्संग के स्थान पर जाने के लिए एक ऑटो लिया। सत्संग का स्थान लगभग 15 मिनट की दूरी पर रहा होगा, लेकिन जब हम स्थान के निकट पहुँच गए हमें वह स्थल नहीं मिला। डेढ़ घंटा घूमने के बाद भी जब वह स्थल नहीं मिला तो मैंने गुरूजी का जाप करना आरम्भ कर दिया और अपने मोबाइल पर भी जाप की रिकॉर्डिंग चला दी। अचानक ऑटो ड्राइवर ने एक गलत मोड़ ले लिया और वह ट्रैफिक की उलटी दिशा में चलने लगा। मैं बुरी तरह से डर गयी। इस से पहले कि मैं कुछ कहती, एक बड़े से ट्रक ने ऑटो को टक्कर मार दी। मेरे पास प्रतिक्रिया करने का समय नहीं था परन्तु मैं गुरूजी का जाप करती रही। किसी को कोई चोट नहीं आयी। ड्राइवर ने अपने ऑटो को देखा, पर वह भी ठीक हालत में था। हम लोगों को बचाने के लिए मैं गुरूजी का धन्यवाद किये बगैर नहीं रह सकी।

एक सप्ताह पश्चात एक और सत्संग सोपान बैग, पुणे में था और गुरूजी ने एक बार फिर हमें बचाया। मैंने सोचा था कि सत्संग में मैं अकेले ही बगैर अपनी बेटी के भाग लूंगी। इस लिए मैंने अपने पति को जो कि अपने व्यवसाय से सम्बंधित जेद्दा में थे, कहा कि वह मेरी अनुपस्थिति में बेटी से फोन पर बात करते रहें। मैं ज्योंही सत्संग के लिए जाने को तैयार हुई तभी बेटी बाथरूम में फिसल गयी और उसके घुटने में और कमर में चोट आयी। एक क्षण के लिए मैंने सोचा कि मैं सत्संग में जाने की योजना रद्द कर दूँ पर मेरी बेटी ने कहा कि वह ठीक हो जायेगी।

मैं जाने में हिचकिचा रही थी परन्तु अंदर से सत्संग में जाने के लिए प्रेरित हो रही थी। मैं दो और भक्तों के साथ सत्संग में गयी। उन भक्तों ने मुझे कहा कि मुझे सब कुछ गुरूजी पर छोड़ देना चाहिए। गुरूजी स्वयं सब कुछ संभाल लेंगे। हम लोग थोड़ा पहले पहुँच गए और मुझे ज्योत और आरती की थाली की व्यवस्था करने की सेवा मिली। मुझे बेटी की चिंता सता रही थी। सत्संग आरम्भ होने से पहले मैंने बेटी से बात की थी। ज्योंही सत्संग में पहला शबद बजाया गया, मेरी सब समस्याएं समाप्त हो गयीं। मैं शबदों के साथ ध्यान करते करते खो गयी। जब सत्संग समाप्त हुआ तो मैंने फिर बेटी से बात की। उसने कहा कि वह ठीक थी।

परन्तु मेरे मन में सत्संग में भाग लेने की इतनी तीव्र इच्छा क्यों हुई?

यह तीव्र इच्छा मेरे पति के कारण थी। मेरे पति को अपनी नौकरी में अक्सर यात्रा करनी पड़ती है। जेद्दा में रविवार सप्ताह का पहला काम करने वाला दिन होता है। मेरे पति के लिए आज सप्ताह का पहला दिन (रविवार) बहुत व्यस्त रहा था। वह अपनी व्यवसायिक फोन कॉल्स समाप्त करने के बाद स्थानीय समय के अनुसार 11 बजे अपने ऑफिस के लिए निकले। सड़कों पर ट्रैफिक पूरी तरह से भरा हुआ था और वहां पर किसी भी खाली टैक्सी का मिलना मुश्किल था, क्योंकि ऑफिस क्षेत्र एक बहुत ही भारी ट्रैफिक क्षेत्र था। 20 मिनट का सफर भी एक घंटा ले सकता था। अंत में पति को एक टैक्सी मिल गयी जो जाने को तैयार थी।

पति टैक्सी में एक व्यस्त एक्सप्रेसवे पर जा रहे थे, तभी एक वाहन उन की गाड़ी के सामने अचानक आकर खड़ा हो गया। इस के फलस्वरूप एक ट्रक ने टैक्सी को पीछे से मारा। इस झटके का प्रभाव इतना अधिक था कि टैक्सी का पिछला हिस्सा पिचक कर पिछली सीट्स से जा मिला। टैक्सी की हालत इतनी खराब थी कि उसमें से सकुशल निकल पाना असम्भव था। परन्तु मेरे पति और ड्राइवर ने टैक्सी के दरवाजे खोले और और बाहर आ गए। उन दोनों को कोई घाव या चोट नहीं लगी थी।

तीनों लेन्स में ट्रैफिक रुक गया। क्योंकि एक्सप्रेसवे पर खाली टैक्सी जिस में सवारी न हो, नहीं चलती, इस लिए मेरे पति सर्विसलेन में दूसरी टैक्सी की तलाश में जाने लगे।

तभी एक टैक्सी ड्राइवर ने आकर पूछा "सब ठीक है?" मेरे पति ने हाँ में जवाब दिया तब ड्राइवर ने पूछा "आइए सकूरा प्लाजा चलना है न?" मेरे पति को आश्चर्य हुआ कि ड्राइवर को कार्य स्थान का कैसे पता था। उसने जब ड्राइवर से इस के बारे में पूछा तो ड्राइवर मुस्कराया और उसने कहा "बैठिए"। मेरे पति ने सोचा कि हो सकता है कि पिछले कुछ माह में उन्होंने इस टैक्सी का कई बार उपयोग किया होगा। 10 मिनट बाद वह प्लाजा पहुँच गये। जब मेरे पति टैक्सी से उतर रहे थे तो ड्राइवर ने कहा "तो, मंगलवार को इंडिया जा रहे हो!" मेरे पति हैरान हो गए। उन्होंने अपने बॉस और प्रशासनिक टीम के सिवाय किसी को अपनी यात्रा की योजना के बारे में नहीं बताया था। प्रशासनिक टीम को इस लिए पता था क्योंकि वह लोग यात्रा की सभी व्यवस्था करते हैं।

तब टैक्सी ड्राइवर मेरे पति को अपने कार्य के बारे में सोचते हुए छोड़ कर चला गया और टैक्सी भी गायब हो गयी। जी हाँ टैक्सी गायब हो गयी! मेरे पति के कार्य स्थल के पास 100 मीटर चौड़ी सड़क है जिस में कोई मोड़ नहीं है, वहां से टैक्सी गायब हो गयी।

मेरे पति ने कहा कि वह चकरा गए और मन ही मन इन सब कि व्याख्या ढूंढने लगे : मेरे पति अपने चेहरे पर यह प्रश्नचिन्ह लिए हुए अपने ऑफिस पहुंचे। ऑफिस में सब लोगों ने मेरे पति के चेहरे पर यह अजीब सी अभिव्यक्ति देखी। लोगों ने सोचा कि शायद यह अभिव्यक्ति रास्ते में हुई दुर्घटना के सदमे के कारण है।

मैंने भी उसी दिन पुणे में सत्संग में भाग लिया। गुरूजी ने मेरे पति की जान बचायी। गुरूजी ने पति के लिए सब कुछ किया और उन्हें कार्य स्थल तक भी छोड़ा। गुरूजी ने, जो हम सब को आशीर्वाद दिया और हम तीनों का ध्यान रखा, उस सब के लिए गुरूजी का धन्यवाद काफी नहीं है। हम इस संसार में केवल गुरूजी के कारण ही हैं। हम अपनी जिंदगी का एक क्षण भी गुरूजी के बगैर नहीं सोच सकते। हम बहुत भाग्यशाली हैं कि गुरूजी ने हमें अपनी शरण में लिया है। हम सदैव प्रसन्न हैं: जीवन में यदि समस्याएं भी हैं तो हमें विश्वास है कि गुरूजी सब का ध्यान रखेगें और हमारी रक्षा करेंगें।

गुरूजी ने हमारे परिवार को बहुत बार आशीर्वाद दिया है। हमारे पास गुरूजी का धन्यवाद करने के लिए शब्द नहीं है। हम केवल इतना कह सकते हैं कि गुरूजी के आशीर्वाद के बगैर हमारी जिंदगी आसान नहीं होती।

अश्विनी एवं राजेंद्र देव

जून 2015