मुझे मृत घोषित कर दिया था

अश्विनी शर्मा, जुलाई 2007 English
गुरूजी से मिलने के बाद मैंने नर्क से स्वर्ग तक की दिव्य यात्रा करी है। मेरी समस्याएँ मेरे विवाह के तुरन्त बाद ही प्रारम्भ हो गयीं थी। मेरी पत्नी, गीता, को कष्टदायक अस्थमा रहता था, वह रात भर सो नहीं पाती थी और घबरायी रहती थी। क्योंकि उसकी माँ भी अस्थमा से पीड़ित रहती थी, अतः उसे पता था कि इस रोग की पीड़ा कैसे रूप धारण कर सकती है।

जैसे यह कम नहीं था, मेरी बेटी तानिया को भी दमा हो गया। पूरा परिवार परेशान रहता था। उनकी औषधियों के लिए मैं बाज़ार के चक्कर काटता रहता था। उनका आहार बहुत ही संतुलित रहता था। वह अति क्षीण हो गये थे और उनके शरीर और मुख का रंग काला पड़ गया था।

फिर इस दास को गुरूजी के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। केवल गुरूजी को ही हमारी नारकीय जीवन का ज्ञान था। वह असंभव को संभव कर सकते थे। इस प्रकार गुरूजी के मात्र "कल्याण कर दित्ता" कहने से गीता और तानिया दोनों स्वस्थ हो गये। किसी ने मेरे से पूछा कि किसी के 'कल्याण कर दित्ता'’ कहने मात्र से कोई असाध्य रोग से कैसे मुक्ति प्राप्त कर सकता है। वास्तव में मनुष्य के लिए यह संभव नहीं है। पर गुरूजी तो स्वयं ईश्वर हैं और ईश्वर वह कर सकता है जो सामान्यतः सबके लिए संभव नहीं है। गुरूजी के आशीष सर्व फलदायी हैं। अपनी पत्नी और पुत्री के स्वस्थ होने के पश्चात् मुझे लगा कि मैं स्वर्ग में हूँ।

थोड़े दिनों बाद मुझे गुरूजी की सहायता की आवश्यकता पड़ी। 8 अगस्त 2004 की रात्रि को मेरी छाती में पीड़ा प्रारंभ हो गयी। चिकित्सक के पास जाने पर उसने प्राथमिक चिकित्सा देकर मुझे घर लौट कर पूर्ण विश्राम करने को कहा। प्रातःकाल उठने के आधा घंटे बाद वेदना पुनः आरम्भ हो गयी; उसके साथ ही बायीं भुजा में भी पीड़ा थी - सब लक्षण ह्रदय रोग के थे। चिकित्सक ने पुनः प्राथमिक उपचार कर के मुझे लुधियाना के हीरो हार्ट सेंटर में ई सी जी करवाने के लिए भेज दिया।

मैंने अपने एक मित्र से मुझे गुरूजी के पास ले जाने की विनती करी। अगले दिन, 6 अगस्त को, उन्होंने मुझे गुरूजी का चित्र दिया। मेरी वेदना तुरन्त समाप्त हो गयी। 7 अगस्त को चिकित्सकों ने परीक्षण करने पर देखा कि मेरे ह्रदय की दो धमनियां बंद थी और उन पर शल्य चिकित्सा करी। उसी दिन संध्या को मेरी ह्रदय गति रुक गयी। मुझे मृत घोषित कर दिया गया।

तथापि चिकित्सकों की इस घोषणा के बाद मुझे पुनः चेतना आ गयी! मुझे यह ज्ञान नहीं है कि कितना समय बीत गया था। चिकित्सकों को झटका तब लगा जब मैंने उनके मेरे नाम और पते से सम्बंधित प्रश्नों के उत्तर दिये। यह देख कर कि मैं उनके प्रश्नों के उत्तर दे रहा हूँ वह मुझे तुरन्त शल्य कक्ष में ले गये।

उन्होंने स्वीकार किया कि मैंने उन्हें अत्यंत भयभीत कर दिया था। मुझे पता है कि मैं आज गुरूजी के कारण जीवित हूँ। मृत होने के पश्चात् केवल ईश्वर नव जीवन प्रदान कर सकते हैं। अतः गुरूजी ईश्वर हैं।

शीघ्र ही चिकित्सकों ने पूछा कि मैं चिकित्सालय में क्या कर रहा हूँ, क्या मुझे घर नहीं जाना? निश्चित ही मुझे जाने की उत्सुकता थी। संगत के दो सदस्य और मित्र, श्री नरेन्द्र और उनकी पत्नी, मुझे दिल्ली से मिलने आये। उस समय तक मैं काफी स्वस्थ था और घर आ गया था। दो सप्ताह उपरान्त मैं गुरूजी के दर्शन और उनको धन्यवाद करने दिल्ली गया।

गुरूजी के यहाँ मैंने चिकित्सकों के खान पान के परामर्श की अवज्ञा कर लंगर ग्रहण किया। मैंने टिक्कियाँ और गोल गप्पे प्रसाद के रूप में खाये। अब मैं पूर्णतया संतुष्ट और स्वस्थ हूँ। मैं गुरूजी की कृपा के कारण ही लिख पा रहा हूँ।

गुरूजी से मिलने के पश्चात् मुझे प्रतीत होता है कि मुझे इस संसार में सब कुछ प्राप्त हो गया है। मैं अति प्रसन्न और चिंता मुक्त हूँ। गुरूजी ने मुझे अपने अनेक अन्य रूपों के दर्शन भी दिये हैं। अनेकों बार उन्होंने ऐसे असंभव दृश्यों के दर्शन कराये हैं जो सामान्यतः नहीं दिखते। एक दिन जब मैं गुरूजी के पास बैठा था तो गुरूजी मेरे सिर से मेरे शरीर में प्रवेश कर गये। मैंने सोचा कि थोड़ी देर में वह बाहर आ जायेंगे पर ऐसा नहीं हुआ। जैसे यह विचार मेरे मन में आया, मैंने देखा कि वह बाहर आये और उन्होंने शिव रूप धारण कर लिया। माँ गंगा ने उनके केशों से निकल कर मेरे शरीर में प्रवेश किया। उसके पश्चात् उनके शरीर से शेषनाग ने निकल कर इस दास के कपाल से प्रवेश किया। शेषनाग ने ॐ और ॐ नमः शिवाय मेरे पूरे शरीर पर लिख दिया। शेषनाग ने मेरे शरीर से स्टेंट भी निकाल कर बाहर फेंक दिए। अब वह मेरे शरीर और ह्रदय की देखभाल करते हैं।

गुरूजी ने मुझे बताया कि शेषनाग सदा मेरे शरीर में रहेंगे। फिर उन्होंने एक चाकू निकाल कर मेरा त्रिनेत्र बनाया और वहां पर बैठ गये । मेरे पैर काट कर नए पैर लगाये, जिन पर ॐ नमः शिवाय अंकित था और कहा कि यह वहीँ जायेंगे जहाँ पर सब ठीक होगा। फिर उन्होंने मेरे चक्षु निकाल कर वहां पर मयूर पंख से ॐ लिखा और कहा कि यह केवल अच्छा देखेंगे, बुरा नहीं।

गुरूजी सदा मेरे साथ रहते हैं। हम अपने परिवार के सदस्यों और मित्रों को छोड़ सकते हैं पर गुरूजी हमारे साथ रहते हैं। वह हमारी समस्त चिंताएं दूर कर हमें आनंद प्रदान करते हैं। गुरूजी इस जीवन में मेरे सब कुछ हैं: मेरे पिता, माता और मित्र। मैं उनके बिना नहीं रह सकता। मैं स्वयं अपने आप को, अपने बच्चों को उनके चरणों के सुपुर्द करता हूँ। मैंने जब भी चाहा है गुरूजी ने मुझे शिवरूप में दर्शन दिए हैं और उनसे माँ गंगा ने मेरे सिर में प्रवेश किया है।

एक बार गुरूजी ने शिव रूप में मेरे ऊपर त्रिशूल फेंका जिसने मेरे शरीर को भेद कर उसके सब ओर एक त्रिकोण बना दिया। गुरूजी ने कहा कि वह सदा मेरे साथ रहेगा। कुछ अंतराल बाद गुरूजी ने मेरा ह्रदय निकाल कर एक नया ह्रदय दिया और कहा कि अब कभी कोई समस्या नहीं होगी।

पिछले वर्ष, 17 मई 2006 को, मुझे स्वप्न आया कि दो यमदूत श्वेत वस्त्रों में मेरे पास आये। वह कह रहे थे कि मेरा समय समाप्त हो गया है और साथ चलने के लिए कहा। तुरन्त गुरूजी प्रकट हुए और उन्होंने यमदूतों को कहा कि मैं उनके साथ नहीं जा रहा हूँ। यमदूतों ने गुरूजी को कहा कि वह मुझे ले जाने आये हैं। गुरूजी ने उनको कहा कि यद्यपि मेरा समय समाप्त हो चुका है, मैं अभी पृथ्वीलोक पर और रहूंगा। उन्होंने उन्हें जाने को कहा और वह चले गये - मेरे बिना!

मैं उठा और समय देखा तो रात्रि के 1:45 हो रहे थे। मेरा ह्रदय पेंच की भांति कसा हुआ था। गुरूजी ने पुनः मेरी जीवन रक्षा करी थी और मैंने उनका धन्यवाद किया। उन्होंने मुझे बार बार जीवन प्रदान किया है। मेरी उनसे विनती है कि वह सौ जन्मों तक मुझे अपने कमल चरणों में स्थान दें और मैं उनकी अभिलाषा के अनुसार कार्यरत रहूँ। मैं अपने आपको उन्हें सुपुर्द करता हूँ।

मुझे उनके साथ अपनी अनुभूतियों का अधिक ज्ञान नहीं है। जब भी मैं उनकी ओर देखता हूँ मुझे आकाश से उनके दिव्यरूप पर गुलाब की पंखुड़ियां गिरती हुई दिखाई देती हैं। मैं उनकी कृपा से नर्क से स्वर्ग तक गया हूँ और प्रार्थना करता हूँ कि मैं उनकी आशा के अनुरूप कार्य करता रहूँ और, किसी भी कारण से, कभी भी विचलित नहीं होऊं।

अश्विनी शर्मा, चंडीगढ़

जुलाई 2007