मृत्युशय्या पर जीवन दान

अशोक ग्रोवर, जुलाई 2007 English
एक परिवार पिछले 45 वर्षों से राधा स्वामी को मानता आ रहा था। उनमें से एक, अशोक ग्रोवर, गुरूजी के भक्त थे। उन्हें जब अपने सम्बन्धी का फ़ोन आया कि उनके पिता मृत्युशय्या पर हैं तो वह तुरंत घर गए।

उनके पिता को लगातार हिचकियाँ आ रही थीं और डॉक्टरों ने कुछ कर पाने में अपनी असमर्थता प्रकट कर दी थी। अशोक गुरूजी को पूरे रास्ते याद करते हुए, उनको दिल्ली के अपोलो अस्पताल ले गए और उनका आई सी यू में दाखिला कराया गया। उनके पिता की शुगर 700 पहुँच गयी थी, किडनी ने काम करना बंद कर दिया था और उनकी हिचकियाँ तथा वे खुद कम हो रहे थे। डाक्टरों ने उम्मीद छोड़ कर उन्हें घर ले जाने का सुझाव दिया।

उसी समय अशोक को (गुरूजी द्वारा) आभास हुआ कि अब उनके पिता स्वस्थ हैं और चिंता करने कि कोई ज़रूरत नहीं है। अशोक को एक ज़रूरी काम से जाना था, इसीलिए वह गुरूजी की आज्ञानुसार, बिना किसी सेवक के, अपने पिता को अस्पताल में छोड़ कर चले गए।

अगले दो दिन अशोक बहुत व्यस्त रहे और उन्हें अस्पताल में बात करने की भी फुर्सत नहीं मिली। जब वह वापस आये तो उन्होंने अपने पिता को रोते हुए देखा। उनके मन में ख्याल आया कि उनके पिता उन्हें अकेला छोड़ने की वजह से दुखी थे। पर उन्हें आश्चर्य तब हुआ जब उनके पिता ने पूछा कि क्या वह गुरूजी के पास गए थे।

उनके पिता ने बताया कि कैसे अशोक के जाते ही उनके पिता को गुरूजी की सुगंध द्वारा उनकी मौजूदगी का एहसास हुआ था और गुरूजी ने कहा, "होर वाई राधासोवामिया, की हाल ने तेरे?" पिता ने कहा की उन्होंने बाबाजी (राधास्वामियों के प्रधान) से अपने को बचाने के लिए प्रार्थना की थी, पर गुरूजी ने आ कर उनकी रक्षा करी।

गुरूजी ने उन्हें दोबारा जांच करवाने की सलाह दी। यह कार्यवाही दो दिन तक चली। उस दौरान उनके पिता को गुरूजी की सुगंध आती रही। परिणाम आने पर डाक्टरों को विश्वास नहीं हुआ और वे अपने परीक्षणों पर ही संदेह करने लगे। उनके अनुसार उनके पिता को कोई रोग नहीं था। उन्होंने एक इंसुलिन इंजेकशन की सलाह दी पर अशोक के पिता ने मना करते हुए कहा कि अब उन्हें दवाइयों पर विश्वास नहीं रहा और अब सबसे बड़े डाक्टर (गुरूजी) की अनुमती से ही वे इलाज कराएँगे।

एक हफ्ते बाद अशोक के पिता गुरूजी के पास आये, तो गुरूजी ने वही शब्द कहे, "होर वाई राधासोवामिया, की हाल ने तेरे?" फिर गुरूजी ने उन्हें बताया कि उन्होंने उन्हें नयी ज़िन्दगी दी थी। यह देखकर कि गुरूजी ने कैसे परिवार के मुख्य की रक्षा करी थी, परिवार के सब सदस्यों ने गुरूजी के पास आना शुरू कर दिया और यह अनुभव किया कि वह साक्षात् भगवान की पनाह में हैं।

भक्त के उद्योग की रक्षा

गुरूजी ने एक बार अशोक को आदेश दिया कि वह अपना कारखाना बंद कर यन्त्र, औज़ार आदि सब कुछ बेच दें। अशोक को पता था कि गुरूजी के इस आदेश का पालन करना होगा।

अगले 15 दिन अशोक इस में ही व्यस्त रहे। मशीने ख़रीदे हुए दामों पर बिकीं और बाकी का सारा सामान भी बिना किसी नुकसान पर बिका। किसी को समझ में नहीं आया कि गुरूजी ने अपने भक्त को अपना व्यापार बंद करने का आदेश क्यों दिया। तीन हफ्ते बाद वह व्यापार पुराना घोषित कर दिया गया और कईं लोगों को भारी नुकसान उठाना पडा। पर अशोक बच गए थे...उन्हें खुद परमात्मा ने बचाया था।

गुरूजी के आदेश का पालन करने में सदा लाभ ही रहेगा क्योंकि वे कभी अपने भक्त के भले के अतिरिक्त कुछ नहीं करेंगे।

दस वर्षीया की इच्छापूर्ति

एक दिन अशोक की दस वर्षीया पुत्री गुरूजी के दर्शन करना चाह रही थी। अशोक खुद बड़े मंदिर के आयोजन में व्यस्त थे। उन्होंने एक भक्त से अपनी बेटी को 'बड़े मंदिर' लाने का निवेदन किया। वह बड़े मंदिर आई पर एम्पायर एसटेट जाने की भी ज़िद करती रही जहां गुरूजी विराजमान थे। उसे वहां ले जाने वाला कोई नहीं मिला। पूरी रात वह रो कर गुरूजी से उनके दर्शन के लिए प्रार्थना करती रही। अगले दिन सुबह, सब आश्चर्यचकित रह गए जब गुरूजी स्वयं बड़े मंदिर पहुँच गए। तब अशोक ने उनको बताया कि उनकी बेटी रात को उन्हें याद कर रही थी, गुरूजी मुस्कुरा कर बोले कि इसी कारण वे उससे मिलने वहाँ आये हैं।

गुरूजी की कृपा से उनकी बेटी अपनी कक्षा में प्रथम आई और तब से सदा एक प्रतिभाशाली बच्ची रही है।

अशोक ग्रोवर, भक्त

जुलाई 2007