उनमें शिव ज्योत का वास है

न्यायधीश अमरबीर सिंह गिल, जुलाई 2007 English
मैं गुरूजी के सम्पर्क में 1986 में आया। उनके भीतर शिव ज्योति का वास है। शिव की भाँति गुरूजी मानवता के लिए प्रेम एंव करुणा का प्रतीक हैं। गुरूजी के समक्ष आस्था से आए हुए प्रत्येक व्यक्ति का कल्याण होता है।

पूजनीय गुरूजी अपने अनुयायियों को परमात्मा का संदेश देते हैं। उनके अनुसार ईश्वर एक है, मनुष्य की जाति, रंग भेद, धर्म आदि का कोई महत्त्व नहीं है; सब एक सामान हैं, सब उसी एक देव परिवार के सदस्य हैं। वह मानवता से प्रेम और ज़रूरतमंद की सहायता करने का संदेश देते हैं। उनमें दिव्य शक्तियाँ हैं और वह सर्वज्ञाता हैं। उन्हें भूत, वर्तमान और भविष्य - सबका ज्ञान है। उन्होंने ईश्वर- से चमत्कार किये हैं और मरणासन्न रोगियों को असाध्य रोगों से मुक्त किया है।

सर्वत्र कृपा

मुझे अनेक बार गुरु कृपा का सौभाग्य मिला है। 1987 में मेरी पत्नी को अंदरूनी सूजन हो गई थी। असाध्यता रोकने के लिए चिकित्सकों ने तुरन्त सर्जरी का सुझाव दिया। हम सर्जरी की सफलता के लिए गुरूजी के पास पहुँचे और उन्हें रोग और चिकित्सकों के परामर्श के बारे में बताया। गुरूजी ने उसे अमृत देकर कहा कि सर्जरी की कोई आवश्यकता नहीं है। गुरूजी में निष्ठा होने के कारण हमने सर्जरी नहीं करवायी। दो वर्ष के उपरान्त एक दिन मेरी पत्नी को पेट में बहुत दर्द हुआ। चंडीगढ़ के सर्वोत्तम चिकित्साल्य द्वारा परीक्षण में सूजन का कोई प्रमाण नहीं था; वह साधारण पेट दर्द था।

गुरूजी - दो स्थानों पर एक साथ

1992 में मेरी माँ बहुत बीमार हो गईं थीं और चेतना खो बैठी थीं। 95 वर्ष की आयु में उनके जीवित रहने की संभावना बहुत कम थी। 28 फरवरी को जब मैं अपनी माँ के कष्टों को नहीं देख पा रहा था, मैंने मन ही मन गुरूजी से, जो उस समय जलन्धर में थे, आकर उनको शान्ति देने के लिए प्रार्थना की। उस समय साँझ के 6:30 बज रहे थे। मेरी प्रार्थना करने के कुछ ही क्षण बाद गुरूजी ने सामने के द्वार से, जो अंदर से बंद था, प्रवेश किया। हम गुरूजी को देखकर आश्चर्यचकित थे। गुरूजी ने मेरी पत्नी को एक गिलास में जल लाने को कहा जिसे उन्होंने अभिमंत्रित किया। उन्होंने वह जल माँ को दो चमच्च पिलाने को कहा और बताया कि वह अर्ध रात्रि में दो बजे तक जीवित रहेंगी। गुरूजी फिर दस मिनट तक बाहर न आने का निर्देश देकर चले गये। उस अंतराल के बाद हमने बाहर आकर पुलिस द्वारा नियुक्त पहरेदार से गुरूजी के बारे में पूछा तो उसने अनभिज्ञता व्यक्त करी; उसके अनुसार कोई भी अंदर नहीं गया था। मैंने तुरंत जलन्धर फ़ोन किया तो मुझे बताया गया कि गुरूजी तो उस समय जलन्धर में संगत में बैठे हुए थे। उसके बाद हमने माँ को जल पिलाया और गुरूजी के कहे अनुसार रात के दो बजे उन्हें मोक्ष प्राप्ति हुई। अतः गुरूजी एक ही समय दो स्थानों पर थे - जलन्धर में संगत में, और हमारे घर पर।

शिव दर्शन

मेरी पुत्री भी गुरूजी की भक्त है। 1998 में गुरूजी चंडीगढ़ के सेक्टर - 33 में रहते थे। जब मेरी बेटी गुरूजी से प्रार्थना करती थी तब वह शिव दर्शन की प्रार्थना करती थी। एक दिन प्रातः उठने पर अपने कमरे में गुरूजी के सब चित्र शिव रूप में परिवर्तित हुए देख कर वह चकित रह गई। अतिथि कक्ष में प्रवेश करने पर उसने कालीन पर शिव को गुरूजी के चित्र के निकट बैठे हुए देखा।

उस समय उसने हमें दर्शन होने के समाचार नहीं सुनाये। संध्या को हम गुरूजी के दर्शन के लिए गए। गुरूजी के निकट जाने पर उसे गुरूजी की मुखाकृति के चारों ओर अद्वितीय प्रकाश दिखाई दिया और वह उसकी प्रबलता सहन नहीं कर पायी। यह देखकर वह मंत्रमुग्ध हो गई और ज़ोर ज़ोर से रोने लगी। उसने गुरूजी में शिव का अनुभव किया था। हमने गुरूजी से उसकी इस अवस्था का कारण पूछा। उन्होंने उत्तर दिया कि वह शिव दर्शन के लिए प्रार्थना करती रही थी, अतः उन्होंने उसकी मनोकामना पूर्ण करी थी।

उपचारात्मक जल

28 अप्रैल 1998 को स्नानकक्ष में गिरने के कारण मेरी तीन पसलियाँ टूट गईं। मुझे चिकित्सालय में प्रविष्ट करवाया गया। 15 मई को मुझे लखनऊ के पी जी आई में भेजा गया। इको और ई सी जी परीक्षण के परिणामों से मेरे हृदय को क्षति होने का प्रमाण सामने आया - मेरे हृदय पर छाया बनी हुई थी। 29 मई को मैंने डॉ. महेश चन्द्र, किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज में हृदय रोग के विभागाध्यक्ष से परामर्श लिया तो पुनः वही परीक्षण कर उन्होंने भी वही निष्कर्ष सुनाया। 2 जून को मैं गुरूजी के दर्शन हेतु दिल्ली आया। मैंने उनको चिकित्सकों के निर्णय से अवगत कराया तो उन्होंने एक ग्लास जल मँगाकर मुझे अपनी कमीज़ के बटन खोलने को कहा। उन्होंने ग्लास के जल से मेरे वक्ष स्थल पर छींटे मारे और मुझे स्वस्थ घोषित कर दिया। साथ ही उन्होंने पुनः परीक्षण करवाने का निर्देश भी दिया

एक दिन के बाद डॉ. कर्लेपिया, दिल्ली में सेना रेफरेल और रिसर्च चिकित्सालय के विभागाध्यक्ष, ने मेरा परीक्षण किया। उन्होंने भी वही परीक्षण दोबारा किये और मुझे स्वस्थ घोषित कर दिया - मेरा हृदय ठीक से कार्य कर रहा था और उस पर कोई छाया नहीं थी। पिछले परिणाम देखकर वह अचंभित हो गए और कहने लगे कि 29 मई और 3 जून की मध्यावधि में केवल किसी चमत्कार से ही ऐसा हो सकता है, अन्यथा हृदय की अवस्था में ऐसा सुधार असंभव है। लखनऊ लौटने पर मैंने वह परिणाम चिकित्सकों को दिखाये तो उनका भी वही निर्णय था। उन्होंने कहा की चिकित्सा से यह परिवर्तन संभव नहीं है। उस समय से मैं बिल्कुल स्वस्थ हूँ। ऐसी है गुरूजी की दिव्य शक्ति!

कठिन समझौते

चंडीगढ़ के सेक्टर 35 में अपने साले के साथ एक साझा प्लाट था। 1998 में उसकी आधारशिला रखने के लिए मैंने गुरूजी को आमन्त्रित किया। उस स्थल पर आने के बाद गुरूजी आधारशिला नहीं रखना चाह रहे थे पर मेरे आग्रह पर उन्होंने ऐसा कर दिया। गुरूजी ने फिर अचानक एक स्वर्ण मुद्रा प्रकट कर मुझे दी और कहा कि यद्यपि मुझे इससे लाभ होगा, साले के साथ आपसी सम्बन्ध कटु हो जाएंगे।

भवन निर्माण प्रारम्भ होने के कुछ ही दिन बाद उसका काम रुक गया और एक वर्ष बीतने पर ही पुनः आरम्भ हो पाया। भवन निर्माण पूर्ण होने पर हमारे सम्बन्ध बिगड़ गए और हमने आपस में बातचीत बंद कर दी। भवन के किराये से मुझे अपने हिस्से के पचास हज़ार रुपये मिले परन्तु हमारे आपसी सम्बंधों में दरार होने के कारण उसे फिर किराये पर नहीं चढ़ा सके। गुरूजी के उस कथन की सत्यता चार वर्ष बाद सिद्ध हुई। अत्यंत कठिनाई से मैं अपना भाग बेच पाया पर मुझे लाभ अवश्य मिला।

ईंधन बिना यात्राएँ

1989 में मैं पटियाला में जनपद न्यायधीश था। गुरूजी जलन्धर से हमारे पास रहने के लिए आये। उनकी वापसी यात्रा के लिए मैंने अपनी निजी कार के साथ अपने वाहन चालक को भेज दिया। कार में पेट्रोल भरवाने के बाद मैंने उसे आकस्मिक स्थिति में पेट्रोल खरीदने के लिए 300 रुपये और दिए।

वापिस आने पर वह मार्ग में हुए चमत्कार को बताने के लिए उत्सुक था। उसने बताया की उसने उन पैसों से पेट्रोल खरीद कर कार में डाल दिया था। एक दिन जब गाड़ी में पेट्रोल नहीं था, तो गुरूजी ने उसे कार चलाने को कहा। जब उसने बताया की पेट्रोल नहीं है, और उसके पास पैसे भी नहीं हैं तो भी गुरूजी ने उसे गाड़ी चलाने को कहा। उसने आज्ञा का पालन किया और गाड़ी चलायी तो उसकी सुई पेट्रोल भरा हुआ दिखा रही थी। वह विश्वास नहीं कर पाया कि गाड़ी बिना पेट्रोल के चल रही थी। अगले पाँच दिन जब तक वह गुरूजी के साथ रहा और जब भी गुरूजी गाड़ी में बैठते, गाड़ी वैसे ही चलती रही। आखरी दिन गुरूजी ने सौ के तीन नोट प्रकट करके उसे दिये और कहा कि यह पेट्रोल खरीदने के लिये दिये गए थे। वाहन चालक, करम सिंह, यह लिखने के समय, पटियाला में जनपद न्यायधीश के कार्यालय में सेवारत था।

कामनापूर्ति

1987 में मैं रोपड़ में सेवारत था। एक दिन समाचार पत्र में मैंने श्रीमती इंदिरा गाँधी का चित्र देखा जिसमें उन्होंने रुद्राक्ष की माला पहनी हुई थी। मैं सोचने लगा - क्या गुरूजी मुझे प्रसाद में एक रुद्राक्ष दे सकते हैं?

दो मास के बाद मैं गुरूजी के दर्शन के लिए जलन्धर गया। वह संगत में थे। उन्होंने प्रश्न किया की मुझे उनसे क्या चाहिये। मैंने उत्तर दिया की मुझे केवल उनका आशिर्वाद पर्याप्त है। उन्होंने मुझे हाथ बढ़ाने को कहा और मेरे ऐसा करने पर उसमें एक रुद्राक्ष रख दिया। उन्होंने फिर प्रश्न किया कि क्या मुझे यही चाहिए था। उन्होंने दो माह पहले की मनोकामना पूर्ण कर दी थी। तबसे वह रुद्राक्ष मेरे पास ही है। गुरूजी से अकथित कामना भी पूर्ण हो जाती है।

पुत्र रक्षा

1999 में मेरे पुत्र को एक मोटरसाइकिल दुर्घटना में बहुत गहन चोटें आयीं थीं। उसे चंडीगढ़ स्थित मेरे मकान के पहरेदार उठाकर घर तक लाये थे। मैं उस समय लखनऊ में था। वह चिकित्सालय नहीं गया। उसने केवल गुरूजी का चित्र अपने पास रखा और दूध में हल्दी और घी डालकर पी लिया।

अगले दिन प्रातः उठने पर उसे पता चला कि उसकी चोटें गंभीर थीं: उसके कान से रक्त प्रवाह हुआ था, उसकी गर्दन और मुँह इतने सूज गये थे कि उसे पहचान पाना भी कठिन था। दुर्घटना रात को 11 बजे के आसपास हुई थी और उसे अगले दिन दोपहर के आसपास चिकित्सालय ले जाया गया। चिकित्सक चकित थे कि इतनी देर तक, बिना उपचार के, वह जीवित कैसे रहा है। उसे तुरंत आकस्मिक कक्ष में ले गए और परीक्षण करने पर पता लगा कि उसके मस्तिष्क में हेमरिज हुआ था और सिर पर दरार आ गई थी। सौभाग्यवश अंदर की चोट का रक्त प्रवाह कान से हो गया था।

चिकित्सक तुरंत सर्जरी करवाने को कह रहे थे पर उसने अगले दिन दोपहर तक हमारे लखनऊ से लौटने की प्रतीक्षा की। रास्ते में मैंने गुरूजी से सम्पर्क स्थापित कर उनको दुर्घटना के बारे में बताया तो उन्होंने अपने आशीर्वाद का आश्वासन दिया। इस अवधि में मेरे पुत्र की निकटता से देख-रेख होती रही। गुरूजी की कृपा से उसे सर्जरी की आवश्यकता नहीं हुई किन्तु उसका मुख पैरलाइज़ हो गया। गुरूजी ने एक अभिमंत्रित लोटा भेजा और उसका जल देने को कहा। उसको जल देते ही उसमें सुधार होने लगा। चिकित्सकों को विस्मित करने के लिए उसका लकवा दो दिन में ही ठीक हो गया। मेरे बेटेको चिकित्सालय से घर भेज दिया गया और कुछ ही दिनों में वह पूर्ण स्वस्थ हो गया। बाद में किये गए परीक्षणों में उसके सिर पर कोई दरार या मस्तिष्क की चोट दिखाई नहीं दी। मेरा बेटा उस समय से बिल्कुल स्वस्थ है। गुरूजी की उपचार शक्ति अद्वितीय है।

उन्होंने मेरे बेटे को शिव रूप में दर्शन देकर भी उसे आशीर्वाद दिया है।

गुरूजी ने इस प्रकार के अनेक चमत्कार किये हैं और ज़रूरतमंदों के लिए करते रहते हैं। वह सबसे एक समान प्रेम करते हैं। उनकी करुणा अपार है। जिसको उनमें आस्था है वह अपना जीवन पवित्र कर सकता है। यदि हमें उनमें निष्ठा है तो वह हमें चिन्तामुक्त कर देते हैं। गुरूजी को कोई लौकिक आवश्यकता नहीं है। नैवेध को वह अस्वीकार कर देते हैं। उन्हें कोई चाहत भी नहीं है। वह इस पृथ्वी पर हमारे दुःख दूर करने आये हैं। आइये, गुरूजी में विश्वास कर उनके आशीर्वाद ग्रहण करें।

न्यायधीश अमरबीर सिंह गिल, चंडीगढ़

जुलाई 2007