गुरु अनुकम्पा - सम्पूर्ण परिवार पर

अरविन्द सिंगला, जुलाई 2007 English
इस ग्रह पर सबसे कठिन कार्य गुरूजी के साथ अपने अनुभवों को शब्दों में पिरोना है। उनको देखने या मिलने का कोई पर्याय नहीं है। उसके पश्चात् ही आपको हल्का सा अनुभव होता है कि वह कौन हैं और उनमें कितनी अभूतपूर्व प्रतिभाएं हैं। परन्तु उनके दर्शन सरल नहीं हैं - वह तो उनके नियत करने पर ही संभव हैं। अनेक बार उनके दर्शन करने की बनी बनाई योजनायें सफल नहीं हो पातीं। दूसरी ओर, यदि वह चाहें तो, वह आपको कहीं से भी बुला लेते हैं। मुझे दोनों अनुभव हुए हैं।

गुरूजी का भक्त बनने के कुछ दिन उपरान्त ही मैंने अपनी अनुभूतियों को अपने उन मित्रों से बांटा जिनके साथ मैं प्रतिदिन 18 - 20 घंटे बिताया करता था। उन सबको यह सुन कर बहुत अचम्भा हुआ और उन्होंने गुरूजी से मिलने की आकांक्षा व्यक्त करी। उनकी इच्छा के अनुरूप और मेरी उनको गुरूजी के दर्शन कराने की चाहत किसी न किसी कारणवश छह माह तक टलती रही। वह दर्शन करने में असमर्थ रहे। अंततः जब यह संभव हुआ तो अपने जीवन के हर पहलु पर गुरूजी की दया पाकर वह अति कृतार्थ हुए।

अंततोगत्वा, गुरूजी ही अपने पास बुलाते हैं। इसे एक दिन गुरूजी ने परोक्ष में कर दिखाया। मैं बाहर जहाँ पर वाहन खड़े किये जाते थे वहां पर अपने एक मित्र की प्रतीक्षा कर रहा था। एक कार वहीं पर आकर धीमी हुई और, यह सोचकर कि मेरा मित्र इसी कार में है मैंने उसे एक खाली स्थान का मार्ग दिखाया। तब मैंने देखा कि उसमें मेरा मित्र न होकर एक नव दम्पति यात्रा कर रहे थे। उन्होंने शालीनता से प्रश्न किया कि क्या यही नशा रेस्तरां के लिए कारें खड़ी करने का स्थान है। मैंने क्षमायाचना करते हुए उन्हें बताया कि वह स्थान तो इसी मार्ग पर कुछ और दूरी पर है। यह स्थान संगत की कारें खड़ी करने के लिए है और मैं वास्तव में अपने एक मित्र की प्रतीक्षा कर रहा था। इस संवाद के पश्चात् वह नव दम्पति अपने मार्ग पर आगे चले गये।

थोड़ी देर में ही वह नव दम्पति वापस आये और उन्होंने जानना चाहा कि क्या वह गुरूजी के दर्शन कर सकते हैं। मैं भौंचक्का रह गया। यह नव दम्पति अपनी सुनियोजित संध्या, एक आमोद प्रमोद के स्थान पर न बिता कर, एक गुरु के मंदिर में व्यतीत करना चाहते हैं जिनके बारे में अभी कुछ मिनट पहले ही सुना था। उन्होंने गुरूजी के दर्शन का लाभ उठाया और बहुत संतुष्ट होकर गये। गुरूजी किस प्रकार से अपने भक्तों को अपने पास बुलाते हैं!

गुरूजी के संरक्षण में

जब से मैंने गुरूजी के पास आना प्रारंभ किया, हर दर्शन में एक विशेष आनंद होता है। उनके यहाँ पर बिताया हुआ समय उस दिन और जीवन का सबसे रोमांचक काल होता है। गुरूजी बहुत कुछ देते हैं; उस लम्बी सूची में उनका संरक्षण भी है। गुरूजी की छाया में प्राप्त सुरक्षा अनुपम है। यह मेरे कई अनुभवों से सिद्ध होता है।

हमें गुरूजी के पास आते हुए कुछ मास ही हुए थे जब मुझे एक दिन अत्याधिक ज्वर हो गया। यद्यपि मैं औषधियां कम ही लेता हूँ, उस दिन मुझे एक अति प्रबल औषधि लेनी पड़ी। परन्तु न उससे लाभ हुआ, न ही मस्तक पर गीला कपड़ा रखने से। मेरी माँ ने तब मुझे अपने पास रखने के लिए गुरूजी का एक चित्र दिया। उस चित्र को रखते ही मेरा ज्वर कम हो गया और तापमान सामान्य पर पहुंच गया। गुरूजी के चित्र ने मुझे तुरन्त लाभ पहुंचाया था।

एक बार महाविद्यालय में मुझे अचानक ही तीव्र पेट दर्द आरम्भ हो गया। उसके साथ ही मुझे उल्टी भी हुई और जी मितलाना भी आरम्भ हो गया। जब तक मेरे मित्र मुझे लेकर घर पहुंचे, मेरे माता पिता गुरूजी के यहाँ जा चुके थे। मेरे दो मित्रों ने मेरे पिता के वापस आने तक रुकने का निर्णय लिया और मेरी बिगड़ती स्थिति देख कर उन्होंने मेरे पिता को फोन किया। चूंकि एक घंटे तक उनके लिए प्रतीक्षा करना उपयुक्त नहीं लगा, वह मुझे पास के एक चिकित्सालय में ले गये। मेरा परीक्षण करने के बाद चिकित्सक ने मुझे दो इंजेक्शन और कुछ औषधियां देकर घर जाकर विश्राम करने को कहा। किन्तु उससे मुझे कोई लाभ नहीं हुआ। उधर मेरे पिता ने गुरूजी को मेरी स्थिति से अवगत किया और शीघ्र जाने की आज्ञा ली। गुरूजी ने उन्हें मुझे एक ग्लास जल में निम्बू का रस डाल कर पीने को कहा। मैंने वैसा ही किया। मेरे माता पिता के घर पहुँचने तक मैं ठीक हो चुका था।

कुछ वर्ष के उपरान्त मुझे पुनः ज्वर ने घेर लिया। जब दो दिन तक शाम को तापमान 104℉ तक चढ़ने लगा, मुझे चिकित्सक को दिखाना आवश्यक हो गया। तब चिकित्सक ने कुछ औषधियां दीं; उनसे लाभ न होने पर कुछ परीक्षण भी करवाए पर उनका परिणाम अनिर्णीत रहा। एक अन्य चिकित्सक ने औषधियों में परिवर्तन किया पर उससे भी कोई सुधार नहीं हुआ। अंततः एक सप्ताह बाद मेरे पिता ने गुरूजी को बताया तो उन्होंने कुछ अभिमंत्रित हरी मिर्चें दीं। उनका सेवन करते ही कुछ घंटों में ज्वर, जो औषधियों से नहीं उतर रहा था, मिट गया। गुरूजी की कृपा के अतिरिक्त और किसी से यह संभव नहीं था।

वाहन में रक्षा

गुरूजी को सबके भूत और वर्तमान का ज्ञान है। हमारी दृष्टि तो परिसीमित है और आगे क्या होने वाला है उसका हमें ज्ञान नहीं है। पर एक बार गुरूजी की शरण में आने के पश्चात् और अपना जीवन उनको सुपुर्द करने के पश्चात् वह भविष्य का भी ध्यान रखते हैं।

एक बार गुरूजी ने मेरे पिता को बताया कि मेरी माँ और मेरे ऊपर संकट आने की संभावना है। गुरूजी को कुछ आभास हुआ होगा और वह उससे बचाव के लिए उपाय कर रहे होंगे।

अगले दिन दोपहर को मैं अपनी कार में बाज़ार जा रहा था जो घर से कोई दो किलोमीटर दूर था। मार्ग में एक ही बड़ा चौराहा था। उसे पार करते हुए, मेरी बायीं ओर से आती हुई एक मोटर साईकल ने जोर से कार को मारा। कार को ऐसा झटका लगा कि वह फिसल कर मार्ग के बीच में बने हुए विभाजक पर जा टकराई। मेरे ऊपर कांच के छोटे छोटे टुकड़े टूट कर बिखरे हुए थे। मैंने जब सामने के कांच को देखा तो वह साबुत था; फिर मुझे आभास हुआ कि वह टुकड़े खिड़की के टूटने से बिखरे थे। मैं उतर कर मोटर साईकल के पास गया तो उपस्थित भीड़ मेरे साथ सांत्वना कर रही थी - यद्यपि मैं बड़ी गाड़ी चला रहा था!

मैंने चालक के नंबर लिए। उसके कुछ मित्र आकर उसे ले गये। मैंने भी आगे जाने का निर्णय लिया। मुझे लग रहा था कि कार शुरू नहीं होगी पर पहली बार ही चाबी घुमाने से वह चालू हो गयी। मैंने बाज़ार जाकर अपना कार्य पूरा किया। मैंने जब घर पहुँच कर स्नान किया तो देखा कि मुझे एक खरोंच तक नहीं आयी थी। गुरूजी की दया से कांच के टुकड़ों से मुझे कहीं कोई चोट नहीं आई थी।

उस संध्या को जब हम एक संबंधी की कार में गुरूजी के पास पहुंचे तो गुरूजी ने मेरे पिता को कहा कि वह चिंता न करें, केवल कार ही क्षतिग्रस्त हुई है और यह ध्यान देने योग्य है कि बेटे को कोई खरोंच तक नहीं लगी है। कार को देख कर कोई यह विश्वास नहीं कर सकता था कि उसके चालक को कोई चोट नहीं लगी है। कार को बहुत अधिक नुक्सान हुआ था - उसका पूरा बांया हिस्सा बदलना पड़ा और उसको ठीक होने में एक सप्ताह का समय लग गया। केवल गुरूजी ही मुझे यह शत प्रतिशत सुरक्षा दे सकते थे।

शीत ऋतु में एक संध्या को गुरूजी के यहाँ जाते हुए, जब मैं कार चला रहा था, अचानक ब्रेक ने काम करना बंद कर दिया। यदि यह नोएडा से दिल्ली आते हुए गहन यातायात में हुआ होता तो निश्चित ही घातक होता। पर यह घटना एक लाल बत्ती पर हुई जब कार बहुत धीमे थी। आधे मार्ग तक आ जाने के बाद हम न तो वापस जाकर कोई और व्यवस्था करने की स्थिति में थे, न ही आगे बढ़ सकते थे। उस समय शाम के 7:30 बज रहे होंगे, अंधेरा हो गया था और ठंडा मौसम होने के कारण किसी मेकेनिक के मिलने की आशा भी बहुत कम थी।

परन्तु हमें एक मिस्त्री मिल गया जो घर जाने वाला था और उसने सहायता भी करी। कार की बैटरी से बत्ती लगा कर वह कोई आधा घंटे तक दोष ढूँढने का विफल प्रयास करता रहा। अंत में मेरी बहन आरती ने गुरूजी से विनती करी जिससे हमें उनके दर्शन में और देर नहीं हो। ठीक उसी समय कार के दोष का पता लग गया। शीघ्र ही कार ठीक हो गई और हम गुरूजी के दर्शन की राह पर चल पड़े।

जब हम गुरूजी के दर्शन के लिए जाने लगे थे तो मैं कार चलाना सीख रहा था, पर कभी भी नोएडा की सीमा को पार नहीं किया था। अतः मेरे पिता दोनों दिशाओं में कार चलाते थे। यह नोएडा और दिल्ली के यातायात में एक दिशा में 20 किलोमीटर से अधिक का मार्ग था। उनको एक बार कार्यवश चंडीगढ़ जाना पड़ा और हमारे पास उनके वापस आने तक गुरूजी के पास जाने का कोई विकल्प नहीं था। मैं हिचक रहा था, पर माँ और बहन के प्रोत्साहन पर जब मैंने पिता से अगले दिन गुरूजी के पास कार में जाने की आज्ञा माँगी तो उन्होंने तुरन्त हामी भर दी। अगले दिन जब मैं माँ और बहन के साथ कार निकाल रहा था तो हमें, जहाँ बहन बैठी हुई थी, अचानक गुरूजी की उपस्थिति की सुगंध आयी।

उस दिन जब तक मैं कार चलाता रहा गुरूजी की उपस्थिति बनी रही; लौटते हुए भी यही रहा। जैसे ही कार को घर पर खड़ा किया उनकी सुगंध लुप्त हो गई। गुरूजी अपने भक्तों का इतना ध्यान रखते हैं। उनके पास जाते हुए उनकी उपस्थिति न केवल उनकी दया और स्नेह के सूचक थे, उन्होंने हमारी रक्षा भी करी और मेरा उत्साहवर्धन भी किया।

महाविद्यालय में प्रवेश

जब हमने गुरूजी के पास आना आरम्भ किया, मैं दसवीं कक्षा में था। मैंने बारहंवी कक्षा विज्ञान विषयों के साथ करी थी। विचार यह था कि एक वर्ष मैं यांत्रिकी (इंजीनीयरिंग) विद्यालयों की प्रवेश परीक्षाओं के लिए अध्ययन करूंगा। साथ ही मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय में विज्ञान स्नातक पाठ्यक्रम में भी प्रवेश पा लिया। उसी समय मैने कुछ परीक्षाओं में, अनुभव हेतु, बिना पढ़े प्रयत्न भी किया। परिणाम इस स्तर के नहीं थे कि मुझे नोएडा या आसपास के विद्यालयों में प्रवेश मिल सके। मैं घर से दूर रह कर नहीं पढ़ना चाहता था। कुछ विद्यालयों में संपर्क स्थापित करने पर उन्होंने प्रवासी भारतीय छात्रों वाले स्थान लेने का सुझाव दिया जिनके लिए अत्याधिक व्यय आता। अतः मैंने एक साल अध्ययन कर तैयारी करने का निश्चय करा।

कुछ माह व्यतीत हो गये। चूंकि कुछ स्थान अभी भी रिक्त थे, उत्तर प्रदेश के छात्रों के लिए विशेष प्रवेश परीक्षाएं हुईं परन्तु इसमें भी वही प्रवासी भारतीय छात्रों वाली कथा दोहराई जा रही थी।

एक दिन गुरूजी ने मेरे पिता को बुलाया और कहा कि तुम्हारे पुत्र को प्रवेश मिल गया है, प्रसन्न रहो। मेरे पिता को इस कथन का अर्थ समझ में न आने पर भी उन्होंने गुरूजी का धन्यवाद किया और घर आ गये। अगले दिन मेरे पिता ने मेरे विद्यालय से घर लौटने पर मेरे से पूछा कि क्या मैं ग्रेटर नोएडा में एक यांत्रिकी महाविद्यालय में पढ़ना चाहूंगा। उस दिन तिथि 14 नवम्बर थी और प्रवेश 10 नवम्बर को बंद हो चुके थे। भावविभोर होकर मैंने तुरन्त हामी भर दी।

मैं अपने पिता के साथ उस महाविद्यालय के कार्यालय में गया और समस्त कागज़-पत्र दिए। मुझे अगले दिन से कक्षाओं में आने के लिए कहा गया। वापस घर आते हुए मेरे पिता ने पूरा वृत्तांत सुनाया। कैसे प्रातः उनके एक मित्र ने उन्हें फोन करके तुरन्त महाविद्यालय के कार्यालय में बुलाया। जब मेरे पिता वहां गये तो उनसे एक प्रपत्र भरवा कर गुजरी हुई तिथि का चेक देने को कहा गया। कुल राशि मात्र चौबीस हज़ार रुपये थी जिसमें से 19000 फीस के थे और शेष लौटायी जाने वाली सुरक्षा राशि के लिए थे। उस स्थान पर सबसे कम व्यय था और हमें घर से बुलाकर प्रवेश दिया गया था। तब मेरे पिता को गुरूजी के कथन का अर्थ समझ आया। ऐसी है गुरूजी की माया!

मित्रों पर गुरु अनुकम्पा

प्रत्येक व्यक्ति जो गुरूजी के पास आता है, उसे गुरूजी की अनुकम्पा किसी रूप में अवश्य प्राप्त होती है और यह विशेष वर्णन योग्य है। आशीष, योगेश और मुकेश मेरे अच्छे मित्र हो गये थे। कुछ प्रारम्भिक बाधाओं के पश्चात् उनको गुरूजी के दर्शन हुए, उनके कमल चरणों में स्थान मिला और कुछ अनुभूतियाँ हुईं।

हमारे महाविश्वविद्यालय में छमाही सत्र होते थे। अनुतीर्ण होने पर एक वर्ष के अंतराल पर पुनः उस सत्र की परीक्षा दे सकते थे। परन्तु यदि उत्तीर्ण होने के लिए 10 अंकों तक की आवश्यकता होती थी, वह दे दिये जाते थे। योगेश के 11 नंबर कम थे, अतः नियमानुसार उसे एक वर्ष की हानि होती। एक माह उसे बहुत परेशान रहना पड़ा क्योंकि उसे अगली कक्षा में आने की अनुमति नहीं मिली। एक दिन उसने गुरूजी से सहायता के लिए प्रार्थना करी और ऐसा करते करते सो गया। जब वह सो कर उठा तो वह अपने स्वप्न को लेकर प्रसन्नचित्त, पर असमंजस में था। उस समय उसने हमें कुछ नहीं बताया।

अगले दिन समाचार पत्रों में विश्वविद्यालय परिषद् की बैठक में हुए निर्णय का वर्णन छपा हुआ था जिसमें उन्होंने सब छात्रों को चार वर्ष में एक बार 15 नंबर देने का निश्चय लिया था। इस प्रकार योगेश का वह एक वर्ष बच गया और तब उसने उस स्वप्न की चर्चा करी।

स्वप्न में उसकी माँ उसे गुरूजी के पास ले गयीं और योगेश की अशांति से अवगत किया। गुरूजी ने उनको निश्चिन्त रहने को कहा। यह स्वप्न परिषद् की बैठक से कुछ देर पहले आया था। उसके पश्चात् बैठक में निर्णय निश्चित ही गुरूजी के हस्तक्षेप से लिया गया होगा।

प्रति सत्र में परीक्षाओं से पूर्व हम गुरूजी के दर्शन की अभिलाषा रखते थे। मैं अपने परिवार के कारण उनके दर्शन सरलता से कर लेता था परन्तु मेरे मित्रों को उनके दर्शन के लिए विशेष प्रयास करना पड़ता था। आशीष पर गुरूजी के दर्शन से विशेष प्रभाव होता था। दर्शन के उपरान्त वह अपने सब विषय पार कर जाता था; यदि दर्शन नहीं हो पाते थे तो वह एक या उससे अधिक विषयों में रह जाता था और उनमें पुनः परीक्षा देनी पड़ती थी।

गुरूजी की कृपा से विद्यालय से निकलते ही मुकेश हनीवेल नामक एक अति प्रसिद्ध कंपनी में कार्यरत हो गया। वहां पर उसका प्रशिक्षण काल एक वर्ष का था। उस अंतराल के बाद वह अति उत्सुकता से अपने स्थायीकरण की प्रतीक्षा कर रहा था। परन्तु जब दो माह उपरान्त भी यह नहीं हुआ तो वह गुरूजी के पास 14 अप्रैल 2005 को आया। उसने गुरूजी के दर्शन कर प्रसाद लिया और चला गया। अगले कार्य दिवस 16 अप्रैल को उसे अपने स्थायी होने की सूचना प्राप्त हो गयी। वास्तव में गुरूजी अपने आशीर्वाद से सब संभव कर देते हैं!

मेरे अंकों का पुनरावलोकन

मुझे तीसरे अर्धवार्षिक सत्र में एक विषय में 30 अंकों के स्थान पर केवल 19 अंक मिले थे। यह चौंकाने वाली घटना थी क्योंकि परीक्षा के उपरान्त जब मैंने अपने अंक जोड़े थे तो मुझे सरलता से उत्तीर्ण हो जाना चाहिए था। यह मैंने अपने अभिभावकों को बताया और साथ में यह भी कहा कि यदि इस समय मेरे केवल 19 अंक आये हैं तो संभवतः मैं इस विषय में कभी भी उत्तीर्ण न हो पाऊं।

मेरे पिता ने जब यह बात गुरूजी को बतायी तो उन्होंने पुनः निरीक्षण का आवेदन करने की सलाह दी। अगले दिन मैंने वही किया। उसके अगले दिन विद्यालय में किसी विद्यार्थी के अंकों को बदले जाने की सूचना थी। मैं तुरन्त उस महाध्यापिका के पास गया तो मेरा नाम सुन कर उन्होंने कहा कि अब मेरे अंक बदल कर 53 हो गये थे। अति प्रसन्न होकर मैंने पुनः निरीक्षण का आवेदन वापस ले लिया और गुरूजी का हार्दिक धन्यवाद किया। बाद में हमें पता लगा कि सम्पूर्ण राज्य में, जहाँ 120 के आसपास महाविद्यालय हैं और प्रत्येक में कई सौ विद्यार्थी हैं, केवल पांच विद्यार्थियों के अंक परिवर्तित हुए थे और सबके ऊपर की ओर संशोधित नहीं हुए थे। गुरुकृपा से मैं अत्यंत भाग्यशाली था!

मेरे इन थोड़े से अनुभवों से गुरूजी की असीम क्षमता और निस्वार्थ भाव से अपने अनुयायियों को सदा आश्रय देने की परम्परा दृष्टिगोचर होती है। जब भी कोई भक्त अपनी व्यथा में गुरूजी से प्रार्थना करता है, गुरूजी सदा उसकी सहायता करते हैं। मूल सार यही है कि यह जीवन गुरूजी को समर्पित कर दें। वह तो प्रेम और स्नेह के अंतहीन स्त्रोत हैं। प्रार्थना करता हूँ कि उनकी हितकारी दृष्टि सदा हम पर बनी रहे और वह हमें सदा अपने चरणों में स्थान देते रहें।

ॐ नमः शिवाय, शिवजी सदा सहाय।

अरविन्द सिंगला, गुड़गाँव

जुलाई 2007