नम आकाश पर प्रज्ज्वलित सूर्य

एक भक्त, जुलाई 2007 English
अपने गुरु की महानता का वर्णन करने का मुझमें सामर्थ्य नहीं हैं, क्योंकि मात्र शब्द उनकी अद्वितीय दिव्यता के लिए अपर्याप्त हैं। तथापि उनकी आज्ञा से, आदर और प्रेम से भरे कुछ शब्दों में, उन्होंने अपनी कृपा से हमें कैसे धन्य करा है, यह अनुभव आपके साथ बाँट रही हूँ।

जीवन के अस्तित्व का मार्ग मोक्ष प्राप्ति की कामना के समान है। जो अपने जीवन की बागडोर अपने गुरु को समर्पित कर देते हैं उनके लिए यह सरल हो जाता है। वास्तव में हम मार्गदर्शक न होकर केवल अनुयायी हैं।

मेरा जन्म एक जट सिख परिवार में हुआ था। मेरे परिवार में आनंद, सुख, समृद्धि, शिक्षा और अनुशासन - किसी का अभाव नहीं था। अपने बचपन से मैं अपने दादा से बहुत प्रभावित रही हूँ, जो सदा धर्म और ईश्वर में विश्वास रखते आये हैं। शनैः शनैः एक गुरु की महिमा प्राप्त करने का विचार मेरे मन में घर कर गया।

मेरा विवाह भी एक जट सिख परिवार में हुआ। मेरे पति तीन कन्याओं के बाद परिवार में आये थे। इस कारण उन्हें अत्याधिक स्नेह प्राप्त हुआ और उनकी आदतें बिगड़ गईं। उनकी सब मांगें पूरी कर दी जाती थीं। मद्यपान उनकी सबसे बड़ी समस्या थी, जिसके कारण वह परिवार की उपेक्षा करते थे और स्वयं कोई उत्तरदायित्व उठाने को तैयार नहीं थे।

हर लड़की का स्वप्न सुखी दाम्पत्य जीवन होता है और मैं कोई अपवाद नहीं थी। पर जब परिवार का पालक ही नशे में डूबा रहे, किसी के वश में कुछ नहीं रहता; रोज़ की छोटी मोटी समस्याएँ भी अजेय लगती हैं। कन्धों पर परिवार का बोझ और मेरी दुखी अवस्था ने शीघ्र ही मेरा जीवन नर्क बना दिया।

उन्हीं दिनों मेरे दादा घर आये। मेरे अन्दर ठहरा हुआ दुखों का बाँध मानो टूट गया और उन्हें विश्वास हो गया कि मेरी सहायता होनी चाहिए। मैंने भीगी आँखों से उन्हें बताया कि मुझे पूर्ण गुरु की आवश्यकता है। हम अपने नश्वर शरीर और मन के लगातार प्रयत्नों से भी गुरु के पास नहीं पहुँच सकते जब तक हम उनके निर्देशित मार्ग पर चलने को तत्पर नहीं हैं। ऐसी अवस्था आने पर गुरु स्वयं हमें अपने समीप बुलाने का सहज मार्ग निकाल लेते हैं।

कुछ समय के बाद मेरी माँ मुझे गुरूजी के पास ले गईं। गुरूजी के यहाँ पहुँचते ही मुझे गुलाब पुष्पों की सुगंध आयी। उन्हें देख कर मेरी आँखों में पानी भर गया। अगले कुछ घंटों, जब तक मैं वहां पर बैठी रही, मेरी आँखों से निरंतर अश्रु प्रवाहित होते रहे। उस पहले दर्शन के बाद जब भी मेरी गुरूजी से भेंट होती थी मैं अपनी भावनाओं पर नियंत्रण नहीं रख पाती थी। हर दर्शन के समय मुझे शांति की प्राप्ति होती थी पर क्यों यह मेरी तुच्छ बुद्धि की समझ में कभी नहीं आया। संभवतः मेरे आँसू मेरी अंतरात्मा को स्वच्छ कर रहे थे।

इस बीच मेरे पति ने और अधिक मद्यपान करना शुरू कर दिया। वह अपने उत्तरदायित्व को बिलकुल भूल कर पैसे जल की भांति बहाने लगे। मैंने उनको गुरूजी के बारे में बता कर उनके पास चलने को कहा। पर उन्होंने मेरा परिहास करते हुए कहा कि ऐसे गुरु तो सैंकड़ों मिल जाते हैं और मुझे रुढ़िवादी की उपाधि से विभूषित कर दिया। साथ ही मेरा गुरूजी के दर्शन करने का भी अनुमोदन नहीं किया।

नवम्बर 1999 के आसपास उनका संयुक्त राष्ट्र की ओर से लेबनान स्थानान्तरण हो गया। वहां पर उनकी नशे की आदत बढ़ कर और गंभीर हो गयी और उसी समय उनको यकृत सूत्र रोग (लिवर सिरोसिस) से पीड़ित घोषित किया गया। मेरे ऊपर तो दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। चिकित्सक के अनुसार उनके यकृत ने काम करना बंद कर दिया था और बता दिया कि अगले दो वर्षों में उन्हें दूसरे यकृत की आवश्यकता पड़ेगी।

इतने कम समय में किसी दाता को ढूँढना असंभव सा था। ऐसा दानी मिलने पर भी उसका व्यय अत्याधिक होता और शल्य चिकित्सा के परिणाम सफल होने की संभावना भी अति कम थी। चिकित्सक ने उन्हें कह दिया था कि मद्य की एक बूँद भी उनके लिए घातक सिद्ध हो सकती है। इस बीच मेरे अभिभावक गुरूजी के पास जाकर उनके स्वास्थ्य लाभ की कामना करते रहे।

चिकित्सालय से अवकाश प्राप्त कर हम दिल्ली वापस आ गये। मेरे आग्रह पर वह गुरूजी के पास आये पर एक कोने में बैठ कर यही शिकायत करते रहे कि कितनी थकान है और मैंने ही आने की ज़िद करी थी। उस दिन जब मैं गुरूजी के पास पहुँची तो मैं आवेश में कुछ बोल नहीं पायी। मेरी माँ और मैंने गुरूजी से उनको बचाने की विनती करी। गुरूजी ने उत्तर दिया कि वह तो नास्तिक है, वे उसकी सहायता कैसे कर सकते हैं।

उसके बाद मैं गुरूजी के पास अकेली ही जाती रही क्योंकि मेरे पति साथ आने को तत्पर नहीं थे।

एक रात गुरूजी के यहाँ से वापस आने पर मैं गहरी नींद में सो रही थी जब अचानक जोर से मेरे कमरे में वायु का झोंका आया। भय के कारण मैं बिस्तरे पर उठ कर बैठ गयी और आँखें बंद कर अपनी प्रार्थना करने लगी। मुझे अँधेरे को चीरते श्वेत प्रकाश का आभास हुआ जो मेरे मस्तक तक आ रहा था। उस श्वेत प्रकाश के मध्य में गुरूजी की आकृति थी। उन्होंने कहा कि वह अब मेरे पति को ठीक करेंगे। अगले 15 - 20 मिनट तक शल्य कक्षों के समान गंध आती रही। उसके बाद जब सब साफ़ हो गया तो गुरूजी ने कहा कि उन्होंने मेरे पति को स्वस्थ कर दिया है। उसके बाद मैं सो गयी।

उस दिन को बीते हुए छह वर्ष हो गये हैं परन्तु मेरे पति ने अपने नशे की आदत बनाये रखी है। मेरे परिवार गण और मैं विस्मित हैं कि चिकित्सकों के कथन के विपरीत उनका स्वास्थ्य बना हुआ है, और गुरूजी कैसे उनकी दिन रात देखभाल कर रहे हैं। मेरे पति भी गुरूजी द्वारा दिये गये जीवनदान के लिए उनके आभारी हैं।

इस संसार के समस्त ग्रंथों के अनुसार मनुष्य के जन्म से पूर्व ही उसकी मृत्यु की तिथि का निर्धारण हो जाता है और कोई भी उसे एक श्वास अधिक या एक कम नहीं कर सकता है। किन्तु उसके कर्मों को समाप्त करने का सामर्थ्य केवल सर्वोच्च सृजनकर्ता के पास है। गुरूजी ही इस ब्रह्माण्ड के संचालक हैं, वह सर्व श्रेष्ठ शक्ति हैं, जिन्होंने मेरे जीवन की कथा को पुनः लिखा है।

मैं और मेरे परिवारवालों ने अनगिनत बार गुरूजी से सहायता की पुकार लगायी है और यह अनुभव किया है कि अचानक ही सब कुछ ठीक हो गया है - जैसे किसी ने कोई जादुई छड़ी घुमा दी हो।

एक बार मुझे गुरूजी के पास अपनी आधा दर्ज़न से अधिक सहेलियों को ले जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उनसे मैं गुरूजी के गुणों का वर्णन करती आयी थी। अपनी संकीर्ण विचारधारा के अनुसार मैंने उनसे गुरूजी से कुछ नहीं मांगने का निवेदन किया था - यद्यपि यह मेरे आचरण के प्रतिकूल था। गुरूजी के चरण स्पर्श करते समय उन्होंने मेरे मन के भाव पढ़ते हुए बताया कि उन सबने उनसे कुछ न कुछ विनती करी थी। उन्होंने सबकी मनोकामना पूर्ण कर दी थी।

उनके पास से कोई भी खाली हाथ नहीं लौटता है - व्यापारी को समृद्धि, रोगी को स्वास्थ्य लाभ, विद्यार्थी को विद्या आदि। कुछ को उनके आशीष का आभास हो जाता है, शेष अनभिज्ञ रहते हैं। उनके स्नेह की कोई सीमा नहीं है। आस्तिक या नास्तिक सबको उनकी दया प्राप्त होती है। उनकी कोई मांग नहीं है, वह कोई आश्वासन नहीं लेते पर उनकी दिव्य अभिभूति धीरे धीरे आपको परिवर्तित कर देती है।

प्रतिदिन याचक अपने दुःख लेकर उनके दर्शन के लिए आते हैं और उनकी कृपा उन पर मेघों से ढके हुए नम आकाश को चीर कर चमकते हुए सूर्य की भांति बरसती है।

एक भक्त

जुलाई 2007