गुरूजी ने जीवन की राह आसान बनाई

एक भक्त, अप्रैल 2012 English
एक प्रतिष्ठित विश्वविद्धयालय से उत्तीर्ण होने के बाद मुझे पूर्ण रूप से विश्वास था कि मुझे नौकरी आसानी से मिल जाएगी, किन्तु ऐसा नहीं हुआ और बार-बार असफल होने के बाद मेरा मनोबल टूटता चला गया। तब मेरी दादी और मेरी एक मित्र ने मुझे गुरूजी के सत्संग में चलने के लिए कहा, जो किसी संगत के घर में प्रत्येक सोमवार को होता था। मैं गुरुओं और पंडितों के पास जाने में सदैव हिचकिचाती थी। मेरा मानना था कि क्या यह पर्याप्त नहीं कि मैं अपने पूजा घर में वैष्णो देवी, कृष्ण जी, विष्णु जी, शिव जी, गणेश जी, राम जी, हनुमान जी और अन्य बहुत सारे देवी-देवताओं की पूजा करती हूँ?

नौकरी न होने के कारण मैं घर पर बैठे - बैठे ऊब गयी थी, इसलिए अपनी दादी के साथ सत्संग में जाने के लिए तैयार हो गई।

सत्संग में मैंने बहुत सुंदर शबद सुने और मुझे गुलाबों की सुगंध भी आई। मैं गुरूजी के आगे माथा टेककर बैठ गई और जल्द ही मुझे चाय प्रसाद मिला। गुरूजी के चरण कमलों में बैठना एक दिव्य अनुभव था और शबद सुन कर मैं बहुत भावुक हो रही थी।

जब मैं छोटी थी, तब से ही मुझे गुरुद्वारे जाना बहुत अच्छा लगता था क्योंकि मुझे (पंजाबी) शबद सुनने बहुत पसंद थे। मेरी माँ, वैष्णो देवी भक्त थीं, किन्तु जब मैं मंदिर जाती और भजन सुनती तो न जाने क्यों कोई जुड़ाव नहीं अनुभव करती। मुझे सिखों से ईर्ष्या होती और मेरे मन में इच्छा होती कि काश मुझे अगला जन्म सिख परिवार में मिले ताकि मैं गुरुद्वारे जाकर शबद सुन सकूँ क्योंकि वहीं मुझे सच्ची शान्ति मिलती थी। सत्संग में बैठे हुए यह सब विचार मेरे मन में चल रहे थे। मैंने गुरूजी का दिल से धन्यवाद किया कि मुझे शबद सुनने के लिए जीवन भर इंतज़ार नहीं करना पड़ा और मैंने ईश्वर के आगे माथा टेका।

उस दिन से मुझे गुरूजी की कृपा की अनुभूति प्रारंभ हुई। मुझे याद है कि कैसे मैं नौकरी ना मिलने के कारण परेशान हो जाती थी। मैंने हर जगह अपना बायोडाटा भेजा और साक्षात्कार (इंटरव्यू) के लिए बुलाये जाने के लिए प्रतीक्षा करने लगी। उस दिन सोमवार था और मुझे संगत की एक आंटी की बात याद आई। उन्होंने कहा था, "हमें गुरूजी से कुछ नहीं माँगना चाहिए। किन्तु हम उनसे कुछ नहीं माँगेंगे तो फिर किसके पास जाएँगे। गुरूजी हमारे माता-पिता हैं और हम उनके बच्चे। बच्चे अपने माता-पिता से तो माँग ही सकते हैं।"

जैसे ही मुझे उनकी यह बात याद आई, उसके कुछ ही मिनटों में फोन की घंटी बजी। एक जानी-मानी संस्था ने कुछ ही घंटों में मुझे साक्षात्कार के लिए आने के लिए कहा। अपनी खुशी में मैं यह भूल गई कि जिस समय फोन आया था उस समय मैं गुरूजी के बारे में सोच रही थी। साक्षात्कार बहुत अच्छा हुआ और उन्होंने मुझे कहा कि कुछ दिनों में वह मुझे परिणाम बता देंगे। अब मैं निश्चिंत थी। लेकिन जब एक हफ्ता बीतने पर भी उनकी ओर से कोई जवाब नहीं आया तो मेरी उम्मीद टूटने लगी। एक बार फिर मैंने गुरूजी से प्रार्थना की, "गुरूजी बस मुझे इतना पता चल जाए कि उनका जवाब हाँ है या नहीं। अगर नहीं है, तो मैं कहीं और नौकरी ढूँढ़ना शुरू करूँ। इंतज़ार करते रहना मुझे पसंद नहीं था।" एक घंटे के अंदर मुझे फोन आ गया कि मुझे नौकरी मिल गई थी। मैं बहुत खुश हुई और जानती थी कि यह चमत्कार गुरूजी ने किया था और मैंने उनका बहुत शुक्रिया अदा किया। थोड़े ही समय में गुरूजी ने मेरी समस्या हल कर दी थी। कहने की आवश्यकता नहीं, गुरूजी के साथ मेरा जुड़ाव दृढ़ होता जा रहा था।

लंगर अमृत है

नवरात्रि के दिनों में सत्संग में सामान्य लंगर के अतिरिक्त व्रत रखने वालों के लिए सिंघाड़े के आटे का लंगर भी होता था, जिससे मुझे प्रत्यूर्जता (एलर्जी) है।

जब उस सोमवार को मुझे लंगर मिला तो मुझे पूरा विश्वास था कि उसमें कुछ ना कुछ प्रसाद सिंघाड़े के आटे का आवश्य बना होगा। गुरूजी की तस्वीर की ओर देखकर मैंने उनसे प्रार्थना की, "गुरूजी, इसे खाकर मेरे शरीर पर बहुत बुरी प्रतिक्रिया होगी, इसलिए इसे खाकर मैं तुरंत घर चली जाऊँगी। बस आप इस बात का ध्यान रखना कि घर पहुँचने तक कोई परेशानी या नाटक ना हो।" यह प्रार्थना करके मैंने लंगर करना आरंभ किया पर मुझे कुछ नहीं हुआ। मैंने हलवा प्रसाद अन्त में खाया क्योंकि मुझे पूरा विश्वास था कि वह सिंघाड़े के आटे से ही बना होगा। मैंने जल्दी से हलवा प्रसाद खाया, हाथ धोये और गुरूजी से आज्ञा लेकर घर चली गई ताकि कोई भी प्रतिक्रिया होने से पहले मैं घर के लिए निकल जाऊँ।

आश्चर्य कि बात थी कि मैं बिलकुल ठीक थी। तब मुझे लगा कि शायद लंगर में शायद सिंघाड़े का आटा था ही नहीं। जब हम गाड़ी तक पहुँचे तो माँ ने मुझसे मेरा स्वस्थ्य पूछा और क्या मैंने हलवा प्रसाद खाया था? जब मैंने हाँ में जवाब दिया और यह भी कहा कि वह बहुत स्वादिष्ट बना था, तब उन्होंने पुष्टि करी कि हलवा प्रसाद सिंघाड़े के आटे का बना था और वह आश्चर्यचकित थी कि मुझ पर उससे कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई थी।

मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि मैंने इतनी अधिक मात्रा में हलवा खाया और मुझ पर कोई हानिकर प्रतिक्रिया नहीं हुई थी। इससे पहले अगर मैं सिंघाड़े के आटे से बना हुआ का एक निवाला भी खा लेती तो मुझे घंटों तक कष्ट होता था। परन्तु गुरूजी के यहाँ हमें जो लंगर मिलता है, वह खाना नहीं अमृत है और उसके प्रभाव चमत्कारिक हैं। जय गुरूजी!

गुरूजी की कृपा से मेरे प्रेम को परिवार की सहमति

इसी समय में मुझे किसी से प्रेम हो गया और मेरे माता-पिता को भी यह बात बताने का समय आ गया था क्योंकि उन्होंने मेरे लिए रिश्ता ढूँढ़ना आरंभ कर दिया था। मुझे डर था कि शायद वह मेरी पसंद नहीं स्वीकारेंगे। यद्यपि मेरा प्रेम सच्चा था और गुरूजी में मेरी श्रद्धा भी अटूट थी, किन्तु मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि इस परेशानी को मैं कैसे सुलझाऊँ। मैं रातों में बहुत रोती थी। एक रात सोने से पहले मैंने मंत्र जाप किया और गुरूजी से कहा कि वह मुझे कोई संकेत दें कि मैंने अपने लिए जो लड़का चुना था उससे मेरे माता-पिता खुश होंगे या नहीं।

फिर मुझे नींद आ गई और मैंने सपना देखा की मैं अपनी माँ के साथ गाड़ी में बैठी हुई थी और उन्हें उस लड़के के बारे में बता रही थी। मेरी माँ यह जानकर बहुत खुश हुईं और उन्होंने कहा कि मेरी पसंद बहुत अच्छी है। फिर माँ ने मुझे बहुत प्यार किया और मैं चिंता-मुक्त हो गई। जब मैं उठी तो मैंने तय कर लिया कि मैं अब अपने माता-पिता से इस विषय पर बात करूँगी। गुरूजी से इतना शुभ संकेत मिलने के बाद अब मैं पीछे नहीं हटना चाहती थी।

मैंने अपनी माँ से बात की जो पहले तो थोड़ी चिंतित हुईं कि मेरे पिता क्या सोचेंगे। मैंने कहा कि गुरूजी मेरे साथ हैं इसलिए मुझमें हिम्मत है कि मैं अपने पिता से भी स्वयं ही बात करूँ। एक महीने बाद मैंने अपने पिता से बात की और वो बहुत खुश हो गए। तब से मेरे माता-पिता और मेरा परिवार इस रिश्ते के बारे में जानते हैं। मैं अपने घर में आराम से रहती हूँ, मेरे माता-पिता मुझसे और उस लड़के से बहुत प्यार करते हैं। मैं गुरूजी का दिन-रात धन्यवाद करती हूँ कि उन्होंने अपने आशीर्वाद से मेरे रास्ते की हर कठिनाई को आसान कर दिया।

बिना विलम्ब के आशीर्वाद

प्रतिदिन किसी ना किसी माध्यम से मुझे गुरूजी का आशीर्वाद प्राप्त होता है और मुझे अनुभूति होती है कि वह मेरे दैनिक जीवन को आसान बना रहे हैं। ऐसा प्रायः होता है कि मैं गुरूजी के बारे में बस सोचती हूँ और मेरे जीवन में कोई चमत्कार हो जाता है। मुझे ऐसा लगता है, जैसे उनका कोई निजी सहायक है जिसकी दृष्टि मेरे जीवन की छोटी से छोटी बात और समस्या पर रहती है, और उसका हल और उत्तर मुझे तत्क्षण मिल जाता है।

कुछ समय पूर्व मैं गुरूजी के दर्शन के लिए बड़े मंदिर गई। मैं और मेरी चचेरी बहन शाम को 5 बजे मंदिर पहुँचे, हमें पता था कि मंदिर अभी बंद होगा। हमने दो बार मंदिर के निकट सैर की परन्तु मेरा घर वापस जाने का कदापि मन नहीं था। उस समय नये साल की तैयारियों के चलते सेवा हो रही थी। कुछ संगत पोछा लगा रही थी और मेरे मन में यह विचार आया कि कितना अच्छा होता अगर मुझे भी सेवा मिल जाती। तभी एक सेवादार बड़े मंदिर के रसोईघर से बाहर निकलीं और उन्होंने मुझे और मेरी बहन को बुलाया और हमसे पूछा कि क्या हम रसोईघर में सेवा करना चाहेंगे। मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि गुरूजी कितनी जल्दी अपनी संगत की बात सुन लेते हैं।

कुछ दिनों पश्चात, पहली जनवरी को मैं पुनः बड़े मंदिर में थी। उस दिन हमें गाड़ी की कुछ समस्या थी, इसलिए हम लंगर के लिए रुक नहीं पाए। हमने सोचा कि केवल चाय प्रसाद लेकर हम वापस चले जाएँगे। हमारे जाने का समय हो गया और हमें अभी भी चाय प्रसाद नहीं मिला था। अत्यंत दुःखी होकर हमने गुरूजी से आज्ञा ली और बाहर जाने लगे। तभी हमें एक सेवादार चाय प्रसाद की ट्रे के साथ दिखाई दिये और मैंने उनसे हम दोनों के लिए चाय प्रसाद माँगा। वह बोले किअभी केवल हॉल में बैठी संगत को चाय प्रसाद मिलेगा और हमें बैठ जाना चाहिए। मैं उनको सारी बात समझाना नहीं चाहती थी। इसलिए निराश होकर हम वहाँ से जाने लगे। मैं बहुत दुःखी थी और सोच रही थी कि मैंने ऐसा क्या पाप किया कि मंदिर में मुझे चाय प्रसाद भी नहीं मिला। यह सोचते हुए और गुरूजी से क्षमा माँगते हुए मैं बाहर आई, तो मैंने देखा कि वही सेवादार मेरी ओर चाय प्रसाद के दो गिलास लेकर चले आ रहे थे, और उन्होंने कहा कि हम चाय प्रसाद ले सकते थे। मेरी आँखें भर आयीं परन्तु मैं मुस्कुरा रही थी कि : गुरूजी मेरे मन की छोटी से छोटी इच्छा भी सुन लेते हैं।

सदा के लिए जुड़ाव

गुरूजी के साथ जो मेरा जुड़ाव है उसका मैं शब्दों में वर्णन नहीं कर सकती हूँ। वो मेरे पिता हैं और मैं उनकी बेटी और हमारा कई जन्मों का सम्बन्ध है। गुरूजी मेरे सब कुछ हैं और मुझे उस दिन की प्रतीक्षा है जब मैं उनके साथ एकाकार हो जाऊँगी।

एक भक्त, एक भक्त

अप्रैल 2012