अपने सबसे प्रिय एवं आदरणीय गुरूजी के लिए

अनु मुंजाल, अप्रैल 2008 English
मैं उस दिन का धन्यवाद करती हूँ जिस दिन गुरूजी मेरे जीवन में पधारे। अब मेरा जीवन परिवर्तित हो चुका है और ऐसा प्रतीत होता है कि शनैः शनैः सब कठिनाईयाँ भी समाप्त हो चुकी हैं। इसका कारण मात्र गुरूजी हैं जो स्वयं सर्वशक्तिमान ईश्वर हैं।

एक मित्र से उनके बारे में सुनकर, नवम्बर 2005 में, मैं गुरूजी के पास आई थी। उस समय मुझपर अनेक समस्याओं का बोझ था - वित्तीय, पारिवारिक और कई छोटी - छोटी निरर्थक सी लगने वाली चिंताएँ जिनके कारण मानसिक तनाव और खिंचाव सदा बने रहते हैं। कुछ भी ठीक नहीं था। मानसिक संतोष का सरासर अभाव था।

मैंने गुरूजी के पास जाना प्रारम्भ कर दिया। जिस दिन उन्होंने पहली बार मुझसे बात की मेरा जीवन सार्थक हो गया। गुरूजी के प्रथम दर्शन के दो माह उपरान्त मेरे पिता को एक दिन अचानक चिकित्सालय में प्रविष्ट कराना पड़ा। उन्हें निमोनिया थी और उनका रोग इतना गंभीर था कि उन्हें जीवनरक्षक उपकरणों पर रखने की आवश्यकता थी। चिकित्सकों के अनुसार उनके जीवित रहने की आशा मात्र दस प्रतिशत ही थी। उस दिन गुरूजी के मंदिर में जाकर मैंने मन ही मन प्रार्थना की थी। प्रार्थना करते वक्त मुझे ऐसे लगा जैसे की गुरूजी मेरे साथ चिकित्सालय गये, मेरे पिता के सब उपकरण निकाल दिये और उन्हें स्वस्थ होने का आशीर्वाद दिया।

शीघ्र ही गुरूजी के प्रश्न करने पर मैंने उन्हें अपने पिता की पीड़ा से अवगत कराया। अगले दिन ही चिकित्सालय जाने पर अपने पिता को बिल्कुल ठीक अवस्था में देखकर मैं चकित रह गई। उनके सब जीवनरक्षक उपकरण निकाले जा चुके थे। गुरूजी ने मेरे पिता को स्वस्थ कर उन्हें नया जीवन दान दिया था।

इस घटना के बाद मुझे गुरूजी के चमत्कारों का और अधिक आभास होने लगा। मुझे शीघ्र ही ज्ञात हो गया कि वह सर्वविद्यमान हैं और मन के भीतर, गहरी से गहरी, छिपी हुई कामनाओं का ध्यान रखते हैं। मेरे पति का उदाहरण है। उनके वित्तीय सौदे अटके हुए थे और हमें अनेक आर्थिक समस्याएँ हो रहीं थीं। कुछ समय में ही सब सौदे स्वतः ही हल हो गए और आर्थिक चिंताएँ भी समाप्त हो गईं।

मेरी बेटी का स्वास्थ्य चिंता का विषय बना हुआ था। उसे मूत्राशय रोग की पुनरावृत्ति होती रहती थी। गुरूजी ने उसे अभिमंत्रित तांबे का लोटा दिया और उसका जल ग्रहण कर उसने रोगमुक्ति प्राप्त की।

मेरे घुटनों में इतनी अधिक पीड़ा रहती थी कि सीढ़ियाँ नहीं चढ़ी जाती थीं। गुरूजी के दैवीय प्रभाव से वह भी समाप्त हो गया।

मेरी एक घनिष्ट सम्बन्धी ने भी उनकी कृपा का अनुभव किया है। वह ब्रिटेन में अपने पति के साथ रहती थी। किन्तु ससुराल के कुछ सदस्यों के कारण उसकी अपने पति के साथ अनबन थी। अंत में वह अपना घर छोड़कर भारत वापिस आ गई। उसने अपने पति से सम्बन्ध - विच्छेद करने का मन बना लिया था। किन्तु गुरूजी की दया से यह अनहोनी घटना होते होते बच गई और उनका दाम्पत्य माधुर्य पुनर्स्थापित हो गया। वास्तव में, उसके पहले दर्शन के समय ही, गुरूजी ने उसको उसके नाम से सम्बोधित किया - यह इस बात का सूचक है कि गुरूजी का अलौकिक प्रेम किस हद तक है। किस प्रकार से गुरूजी हमारे मन की समस्त भावनाओं का ज्ञान रखते हैं।

हमारे जीवन में गुरूजी के प्रवेश के बाद सब कुछ सामान्य हो गया है। हमारे कुछ कर्मों के कारण ही गुरूजी हमारे जीवन में प्रविष्ट हुए हैं। अपने चारों तरफ हम सदा उनके रक्षा कवच को अनुभव कर सकते हैं। वह आकस्मिक विपदाओं और आपदाओं से सदा हमारी रक्षा करते हैं। उनके कारण ही अनेक समस्याएँ स्वतः ही हल हो जाती हैं। वाह्य स्त्रोतों द्वारा उत्पन्न विघ्न स्वयं समाप्त हो जाते हैं।

और तो और, मेरी छवि, दृष्टिकोण ऐंव प्रवृत्ति पूर्णतः परिवर्तित हो चुके हैं। मुझे जीवन में गुरूजी के आने के पश्चात पूर्ण शांति की प्राप्ति हुई है।

अपने आश्रय में रखने के लिए हम कृपालु गुरूजी का ह्रदय और आत्मा से धन्यवाद करते हैं। चूंकि यह जीवन बिना उनके असंभव है, हम अति आभारी हैं - हमारा अस्तित्व, यह लघु जीवन उनके बिना अर्थहीन है। उनकी कोई समानता संभव नहीं है।

गुरूजी मानव शरीर रूप में परमात्मा हैं। इस जगत में हमारे कल्याण और सर्वोच्च हित के लिए ही उन्होंने यह रूप धारण किया है।

अनु मुंजाल

अप्रैल 2008