अपने गुरु पर पूर्ण विश्वास रखो

अंकुर सिन्हा, अक्टूबर 2024 English
2020 में, मैं एक निजी क्षेत्र बैंक में कार्य स्थल प्रशिक्षण (ऑन-द-जॉब ट्रेनिंग) ले रहा था। उस समय मेरे एक सहकर्मी के पास एक रिंगटोन की धुन बजती थी जोकि, "शुक्र करां गुरुजी त्वडा शुक्र करां," वह मुझे पसंद आई। यह जानकर कि यह गुरु के प्रति कृतज्ञता का भजन है, मैंने सोचा कि क्या वह सहकर्मी मुझसे रिंगटोन साझा करेंगे? मैं गुरूजी के बारे में और अधिक जानना चाहता था। इसलिए मैंने इंटरनेट पर खोज आरंभ की, जहाँ एक वेबसाइट ने दावा किया था कि गुरुजी "मानव रूप में स्वयं भगवान शिव" हैं।

कुछ दिनों बाद ही मेरे सहकर्मी ने मुझे सत्संग में सम्मिलित होने के लिए आमंत्रित किया और कहा कि मुझे वहाँ उपस्थित भक्तों द्वारा किए जाने वाले कार्यों का अनुसरण करना होगा, और शांतिपूवर्क प्रसाद ग्रहण करना होगा। मेरे लिए सत्संग एक अद्वितीय अनुभव साबित हुआ, जिसने मुझे ऐसी शांति प्रदान की जो मैंने पहले कभी अनुभव नहीं की थी। इससे पहले मेरा सत्संग का अनुभव गायन और शोरगुल ही रहा था। इस सत्संग में सभी लोग आत्म-अनुशासित थे, शांत भाव से शबद सुन रहे थे, और जल, चाय और लंगर प्रसाद ग्रहण कर रहे थे। मैंने नियमित रूप से सत्संग में जाना शुरू कर दिया। एक बार मुझे सेवा के लिए भी कहा गया, किन्तु समय के अभाव के कारण मुझे मना करना पड़ा।

मार्च 2021 में, मैं एक नए नगर में आ गया—और ठीक तभी कोविड-19 की दूसरी लहर फैल गई। कुछ ही दिनों में मेरे पिता कोरोना ग्रस्त हो गए। इस कारणवश मेरी माता अकेली पड़ गईं। वह कैंसर को तो पराजित कर चुकि थीं किन्तु पार्किन्सन रोग से जूझ रही थीं; वह स्वयं चल, बोल या खा नहीं सकती थीं। मेरे पिता ही उनकी देखभाल करते थे। हमने उनकी देखभाल के लिए एक उपचारिका रखी थी, किन्तु एकमात्र संतान होने के कारण माता–पिता की देखभाल का उत्तरदायित्व मेरे ऊपर ही था, इसलिए मुझे नौकरी छोड़नी पड़ी। इस बात से मैं बहुत व्यथित था कि गुरुजी ने ऐसा क्यों होने दिया। मैंने सत्संग में जाना छोड़ दिया और घर में ही रहने लगा।

अगले दस महीनों तक जो कुछ भी मैंने करने का प्रयास किया, वह असफल रहा। मैं सांसारिक चिंताओं में उलझ गया—धन कमाना, गाड़ी लेना, घर लेना, शेयर बाज़ार में पैसा लगाना—यही सब सोचता रहता। परंतु 2022 के महाशिवरात्रि के दिन मैं पुनः बड़े मंदिर गया और सेवा के लिए भी नाम लिखवा दिया। आशा थी कि सब ठीक होगा। इसी बीच मेरे पिता घर पर ही स्वस्थ हो गए। उन्हें अस्पताल ले जाने की आवश्यकता नहीं पड़ी और माता भी कोविड से सुरक्षित रहीं। धन्यवाद-स्वरूप मई में हमने घर पर गुरूजी का सत्संग कराया। माता, यद्यपि व्हीलचेयर पर थीं, फिर भी उन्होंने आरती की। आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो समझ आता है कि गुरुजी ने आने वाले तूफान को पहले ही जान लिया था और मुझे माता–पिता के पास भेज दिया था। उनके स्वास्थ्य में स्थिरता भी गुरुजी की कृपा से ही आई थी।

हमारा तांत्रिक के चंगुल से निकालना

जब मेरी नौकरी नहीं लगी थी मैं निराश हो गया। मुझे लगने लगा कि गुरुजी मेरे लिए नहीं हैं। मैं गुरुजी पर पूर्ण विश्वास नहीं कर पा रहा था। तभी हमारा परिचय एक तांत्रिक-ज्योतिषी से हुआ। उसने मुझे एक अंगूठी पहनने को दी। यद्यपि मैं जानता था कि गुरुजी ऐसे उपायों के लिए मना करते हैं, फिर भी मेरी श्रद्धा डगमगा गई थी। मैं मांसाहार, धूम्रपान और मद्यपान भी करने लगा। मैंने अपना विश्वास किसी दूसरे व्यक्ति में रखा और मेरा जीवन बिगड़ता चला गया। धन पानी की तरह बहने लगा; और घर की सुख शांति समाप्त हो गई।

मैं उस तांत्रिक के प्रभाव में आया ही था कि पिताजी को दौरा पड़ा। उन्हें तीसरे चरण का डेंगू हुआ और श्वसन-विफलता के कारण गहन चिक्तिसा केंद्र (ICU) में भर्ती करना पड़ा। चिकित्सक ने हमें परमात्मा से प्रार्थना करने को कहा। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा था।

पिता अस्पताल में थे, तभी मैं एक सत्संग में गया। वहाँ मुझे वही व्यक्ति मिले जो मुझे पहली बार सत्संग में लेकर गए थे। उन्होंने पूछा, कि मैं पिता को अस्पताल में अकेला छोड़कर कैसे आया। मैंने कहा—गुरुजी ने बुलाया था। सत्संग में मैंने एक भक्त का अनुभव सुना जो मेरे पिता जैसा ही था। सत्संग समाप्त होते ही अस्पताल से फोन आया कि पिताजी की स्थिति में सुधार है। यह प्रमाण था कि सत्संग में अपार शक्ति होती है—जो सुनने वाले और सुनाने वाले, दोनों के लिए दिव्य कृपा का मार्ग है।

कुछ ही समय बाद, 22 अक्तूबर, दीपावली के दिन, गुरुजी की कृपा से पिताजी सकुशल घर आ गए। उसी क्षण से मैंने गुरुजी पर विश्वास करना प्रारंभ कर दिया। पर एक दिन जब माँ की हालत बहुत खराब थी, तांत्रिक फिर घर आ गया। अगले ही दिन, 15 नवंबर को माँ का देहांत हो गया। मैं स्तब्ध रह गया। उनके अंतिम समय में मेरे सहकर्मी ने फोन पर उन्हें बड़े मंदिर का दर्शन करवाया—यह हमारे लिए बहुत बड़ी सांत्वना थी। माँ के देहांत के कुछ दिन बाद मुझे श्री जेथरा जी का सत्संग सुनने का अवसर मिला। उसमें मुझे गुरुजी का स्पष्ट संदेश मिला: "चिंता मत करो, तुम्हारी माँ मेरे साथ हैं।"

सदैव मेरे परिवार और मुझ पर कृपा

जुलाई 2023 में गुरुजी ने पुनः हमारे प्राण बचाए। मैं, मेरी बहन, जीजा जी और पिताजी—अपनी नई गाड़ी लेकर बड़े मंदिर जा रहे थे। आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे पर गाड़ी का पेट्रोल समाप्त हो गया और पिछला टायर फट गया—उसी ओर जहाँ मेरे पिता बैठे थे। सौभाग्य से हम एक संकेत-चिन्ह के पास रुक गए, जिस पर आपातकालीन दूरभाष संख्या लिखी थी। कुछ ही मिनटों में पुलिस आई और टायर बदल दिया। लखनऊ पहुँचकर मिस्त्री ने बताया कि पहिए का एक नट ढीला था और हम लगभग 200 किलोमीटर ऐसे ही चल कर आए थे। गुरुजी ने हमें बचा लिया! मैं केवल धन्यवाद ही कर सकता था।

दिसंबर 2023 में मेरी बहन का व्यवहार विचित्र होने लगा—किसी ने उस पर काला जादू कर दिया था। मैं एक बार फिर से तांत्रिक के पास मदद के लिए गया। उसने हमें छलपूर्वक अपने जाल में फँसा लिया। गुरुजी ने ही मेरी बहन को उस काले जादू से बचाया और उसे नया जीवन दिया। गुरुजी ने एक दिव्य स्वप्न में दिखाया कि तांत्रिक हमारे घर को किस तरह से नष्ट करने का प्रयास कर रहा था और गुरुजी हमें कैसे बचा रहे थे। इसके बाद मैं पिताजी के साथ बड़े मंदिर गुरूजी का आशीर्वाद लेने गया।

गुरुजी ने मुझे एक नए शहर में नौकरी भी दिलाई। वहाँ से हम 27 जून को बड़े मंदिर जाने वाले थे, किन्तु नहीं जा पाए। अगले दिन पता चला कि जिस हवाई-अड्डे से हमें उड़ान भरनी थी, उसकी छत ढह गयी थी। गुरुजी ने हमें फिर बचा लिया था, किन्तु परीक्षा अभी भी शेष थी। मेरे पिताजी को गुर्दे और स्वास विफलता के कारण ICU में भर्ती करना पड़ा। मैं अनजाने नगर में पूर्णतः अकेला था—केवल गुरुजी ही मेरे साथ थे। उन्होंने मुझे याद दिलाया कि अक्टूबर 2022 से, जब पहली बार पिताजी अस्पताल गए थे, तबसे ही वह मेरे साथ हैं।

मैं मार्ग से भटक गया था, और गुरुजी मुझे वापस ले आए। तांत्रिक के प्रभाव से मैंने जो बुरे संस्कार (धूम्रपान, मद्यपान) अपनाए थे, गुरुजी ने मुझे उनसे मुक्त किया। एक दिन मैंने भाँग-मिश्रित ठंडाई पी, जिसका स्वाद कड़वा था, तो मैंने आधा गिलास शर्करा-घोल मिला दिया—खतरनाक मिश्रण। उसके बाद मैंने मांसाहार और मद्यपान छोड़ दिया। 2022 से मैंने सिगरेट को छुआ भी नहीं और अब भाँग की ओर देखता भी नहीं हूँ।

कभी मत सोचिए कि भगवान शिव के भक्त होने का अर्थ नशा करना है।

मैंने यह शिक्षाएँ पाईं है :
• ज्योतिषी, तांत्रिक या कुछ पाखंडी पुजारियों पर कभी विश्वास न करें—वे घर उजाड़ देते हैं और परिवार की शांति छीन लेते हैं। यदि परिवार में आनंद चाहिए, तो ऐसे लोगों से दूर रहें और गुरुजी के निकट रहें।
• कोई भी रत्न न पहनें। यदि पहनें तो बाद में गुरुजी को दोष न दें।
• सदा गुरुजी के वचनों का पालन करें।

गुरुजी से कभी कुछ न माँगें। केवल गुरुजी का दिव्य आशिर्वाद ही माँगें। उनके समय पर कभी संदेह न करें। उदाहरण के लिए, मैं कानून की पढ़ाई कर रहा था और नौकरी भी ढूँढ रहा था। गुरुजी की कृपा से परीक्षा-परिणाम आने के अगले ही दिन नियुक्ति-पत्र मिला। अब समझ आता है कि यदि नौकरी पहले मिल जाती, तो मैं अपनी डिग्री पूरी नहीं कर पाता।

कठिनाइयाँ अवश्य आईं, पर मेरे पिता—मेरे गुरुजी—की कृपा से सब हल होती गईं। गुरुजी ने मुझे सेवा भी दी, और अपने चरणों में स्थान भी दिया है। गुरुजी महाराज को अनंत धन्यवाद। सात जन्म भी बीत जाएँ, मैं धन्यवाद देता रहूँगा। मुझे आपसे कुछ नहीं चाहिए, गुरुजी—मैं केवल आपको चाहता हूँ। ऐसे ही अपने चरणों से मुझे जोडे़ रखना, गुरुजी।

अंकुर सिन्हा, एक भक्त

अक्टूबर 2024