गुरूजी के रास्ते में पड़े पत्थर भी मेरे लिए गुरूजी का आशीर्वाद बन गए

अंजलि शर्मा, दिसंबर 2015 English
अक्टूबर 2014 में मेरा भाई गुरूजी के दर्शन कर, गुरूजी की छाप मन में लिये बड़े मंदिर से वापिस आया। उसने मुझे बताया कि गुरूजी स्वयं शिव हैं। मैंने उस पर विश्वास नहीं किया। एक माहं पश्चात् उसने गुरूजी की एक फोटो मुझे दिखायी। उस समय मैं एक बड़ी कठिनाई में थी। मैंने गुरूजी की फोटो को एक लम्बे समय तक एकटक देखा और इसी बीच मुझे नींद आ गयी।

और नींद में मुझे पहली बार गुरूजी के दर्शन हुए।

मैं एक घर के अंदर दौड़ रही थी और गुरूजी मेरा पीछा कर रहे थे। कुछ समय बाद गुरूजी ड्राइंग रूम में पड़े सोफे पर बैठ गये। मैं कमरे के बाहर खड़ी हो गयी और दरवाजे के एक कोने से गुरूजी को देखती रही। गुरूजी अचानक बोले "मैं तैनू अपने कोल बुला के रहना है"। मैं उस समय भयभीत हो कर उठ गयी। स्वप्न का क्रम असंभव था। मैंने अपने माता-पिता को इस स्वप्न के बारे में बताया तो उन्होंने आग्रह किया कि मैं बड़े मंदिर जाकर गुरूजी के दर्शन करूँ। मैंने मूर्खतापूर्वक अपने माता-पिता की सलाह की उपेक्षा कर दी परन्तु अपनी माता के बार बार आग्रह करने पर उनके सामने झुक गयी। मैं फरवरी - जून 2015 के बीच दो बार बड़े मंदिर गयी। मुझे वहां जा कर अच्छा लगा।

एक माहं पश्चात गुरूजी का जन्म दिवस मेरी जिंदगी का सबसे भाग्यशाली दिन निकला। 7 जुलाई 2015 मेरे लिए पूरा दिन आशीर्वाद से पूर्ण था। मेरी उस दिन की सारी अपॉइंटमेंट्स अपने आप रद्द हो गयीं और मैं सीधा अपने परमप्रिय गुरूजी के चरण कमलों की ओर चली गयी। मैं मंदिर के अंदर नंगे पांव चल रही थी और मुझे पत्थर चुभ रहे थे।

मुझे चलने में कठिनाई हो रही थी। मैं पिछले एक साल से फटे हुए टखनों से पीड़ित थी। मैं जब भी चलने के लिए उठती तो यह पीड़ा और बढ़ जाती थी। चिकित्सकों ने मुझे इंजेक्शन लेने को कहा था परन्तु मैं आयुर्वेदिक दवाई से ठीक करने का प्रयास करती रही। इससे कोई असर नहीं हुआ। मगर जब मैं उस पवित्र दिन ऐसे चली तो गुरूजी ने, जो सदैव मेरे हृदय में रहते है, विश्वास दिलाया कि वह मुझे ठीक कर देंगें। मैंने दिव्य चाय और लंगर प्रसाद लिया और घर आ गयी।

एक सप्ताह बाद मुझे एहसास हुआ कि मेरी पीड़ा समाप्त हो चुकी है। अब मुझे यह भी याद नहीं है कि मुझे टखनों की पीड़ा पिछली बार कब हुई थी। गुरूजी ने, जो भगवान शिव है, मेरा उपचार कर दिया।

गुरूजी ने मेरी फरियाद का भी ध्यान रखा, जो मैंने गुरूजी से की थी।

मैं अपने परिवार के साथ 2007 के बैसाखी समारोह का वीडिओ देख रही थी। क्योंकि मैं गुरूजी को 2014 में मिली थी, मैंने अपनी फरियाद फिर दोहराई कि गुरूजी ने मुझे इतनी देर से अपनी शरण में क्यों लिया। मैं गुरूजी के चरण कमलों में बैठना चाहती थी।

अगला दिन सोमवार था। मैं गुरूजी के दर्शन के लिए बड़े मंदिर गयी। मंदिर के पिछली तरफ गुरूजी के झूले के पास मैं माथा टेकने के लिए झुकी। उसी समय मेरे बायें घुटने में ऐंठन आ गयी। मैंने खड़े होने का प्रयास किया परन्तु मस्कुलर ऐंठन मेरे दाएं घुटने में भी आ गयी। मैं गुरूजी के चरणों में ज़मीन पर बैठ गयी। यह ऐंठन मुझे अक्सर हो जाती थी।

मैंने गुरूजी की आवाज अपने कान के अंदर सुनी "हुन वी कोई शिकायत है तैनु"? मैं वहां दो मिनट बैठी और बगैर किसी मुश्किल के उठ गयी। उसके बाद मुझे कभी भी ऐंठन नहीं हुई। गुरूजी के चरणों में बैठने की मेरी फरियाद गुरूजी ने पूरी कर दी और मुझे ऐंठन की समस्या से मुक्त भी कर दिया।

मैं गुरूजी के प्रति कृतज्ञ हूं क्योंकि गुरूजी ही परम परमात्मा हैं। गुरूजी मेरे रक्षक हैं और उन्होंने मुझे बेशुमार बार अनगिनत समस्याओं से बचाया है।

जय गुरूजी

अंजलि शर्मा, एक भक्त

दिसंबर 2015