ह्रदय समीप - माँ सदृश प्रेम

स्वर्गीय अमिता सिंह, जुलाई 2007 English
मेरे परिवार में गुरूजी के प्रथम दर्शन से अब तक बहुत कुछ हो चुका है। उससे पहले मेरे जीवन में अभूतपूर्व अशांति थी। मेरे पिता अचेतनावस्था में डेढ़ मास से चिकित्सालय में थे। स्वयं चिकित्सक होने के कारण मुझे, जो समस्याएं उत्पन्न हो सकती थीं, उनका आभास था। अतः मैं कभी उनके पास से उठने का साहस नहीं जुटा पाती थी।

एक दिन मैं इतनी निराश और निरुत्साहित हो गयी कि जीवन से और जूझने की शक्ति मानो गँवा बैठी: सब कुछ उलट पुलट लग रहा था, आर्थिक स्थिति डांवाडोल थी, और पिता को प्रति मिनट जीवित रखने की चेष्टा अति कठिन लग रही थी। मेरी बहन और भाई भी सब प्रयास कर रहे थे। कोई भी प्रयत्न सफल नहीं हो रहा था। मैं पूरी तरह से निरुत्साहित हो गयी थी। आँसूं रोके हुए मैं सोच रही थी कि प्रभु क्यों नहीं आकर मेरे परिवार और हम सबकी सहायता करते? मैंने उनमें सदा ह्रदय से विश्वास और प्रेम किया था। फिर क्यों वह हमारी पुकार नहीं सुनते?

मेरे लिए किसी ऐसे व्यक्ति से मिलना नितांत आवश्यक था जिसे बिना कुछ कहे मैं अपने समस्त दुःख कह सकूँ; जो हमें अपने आश्रय में ले सके; जो मुझे इतनी शक्ति दे सके कि मैं वास्तविकता का सामना कर सकूँ और जब भी मैं कठिनाई में हूँ मुझे वहां से निकाल सके।

एक रात मैं सो नहीं पा रही थी। प्रातः तीन बजे के आसपास मेरे भाई शिव ने अचानक कमरे में प्रवेश किया और हमें कुछ प्रसाद दिया। शिव ने कहा कि वह गुरूजी के यहाँ गया था और वहां पर कुछ सुने हुए चमत्कारों का वर्णन किया। उसके बाद मुझे गहरी नींद आ गयी।

अगले दिन मेरे पति और मैंने गुरूजी के दर्शन करने का निश्चय किया। तब भी मुझे यह पता नहीं था कि जब तक वह स्वयं नियत नहीं करें उनके दर्शन नहीं हो पाते हैं। मेरी कल्पना में हम किसी वृक्ष के नीचे बैठे हुए लम्बी दाढ़ी वाले बाबा से मिलेंगे। पर उनसे मिलकर मुझे अति आश्चर्य हुआ। एक ऐसी तीव्र दिव्यज्योति वाले महानुभाव थे जो छोटे बालक की भांति मुस्कुराते थे और जिनकी आँखें आपको भेद देने की क्षमता रखती थीं; वह आपको अन्दर तक छू जाते थे।

उनसे मिलकर मैं भाव विभोर हो गयी। उनकी सुगंध इतनी प्रचंड थी, मानो उनके सब ओर गुलाब का अर्क बिखरा हुआ हो। उन्होंने हमें अपने समीप बिठाया और सुरक्षित होने का आभास दिया। किसी अज्ञात कारण से उसी समय मेरा पूरा मानसिक तनाव समाप्त हो गया। उन्होंने यह सांत्वना भी दी कि सब ठीक हो जाएगा।

अगले दिन ही मैं अपने जुड़वा पुत्रों को, जो उस समय चार वर्ष के थे, गुरूजी के पास ले गयी। मार्ग में मैंने उन्हें समझाया कि वहां पर गुरूजी को प्रणाम करना है। पर मेरे ज्येष्ठ पुत्र, दक्ष, ने सौम्यता से उत्तर दिया कि वह केवल शिवजी के चरण स्पर्श करेगा। जैसे मैंने आगे बढ़ कर गुरूजी के चरण स्पर्श किये, ध्रुव ने मेरा साथ दिया पर दक्ष अपने स्थान पर खड़ा रहा। मुझे अत्यंत बुरा प्रतीत हुआ कि दक्ष चरण स्पर्श नहीं कर रहा। अचानक मैं क्या देखती हूँ कि दक्ष ने गुरूजी के पास जाकर उनके कमल चरणों को स्पर्श किया। बाद में मैंने उसे चिढ़ाते हुए पूछा कि उसने चरण स्पर्श क्यों किया? उसने अपने भोलेपन से उत्तर दिया कि उसने तो शिवजी के चरणों को स्पर्श किया था। इस प्रकार, सब को परोक्ष में रखते हुए, गुरूजी ने दक्ष को अपने वास्तविक दर्शन करा दिए थे!

उसके पश्चात् क्रमशः परिस्थितियाँ सुधरने लगीं। गुरूजी के आशीष से मेरे पिता के उपचार के लिए सहायता हर दिशा से आयी। मेरे पति को भी अपना मनपसंद कार्य मिल गया।

"तुम्हारे बच्चे को कुछ नहीं होगा"

संवत 2000 में दक्ष को अपच के साथ ज्वर और वजन घटने की शिकायत हो गयी। उसके शरीर की गांठें सूज गयीं थीं। चिकित्सकों ने उसे प्रतिजैविक दवाओं से स्वस्थ करने का विफल प्रयास किया। एक सोमवार को हम उसे सर गंगाराम चिकित्सालय के वरिष्ट विशेषज्ञ से परीक्षण करवाने ले गये। मुझे अति भय लग रहा था; दक्ष के सब लक्षण कर्कट (कैन्सर) रोग के थे। चिकित्सक के कक्ष की ओर जाते हुए मैं गुरूजी के चित्र को अपने से जकड़े हुए थी। चलते हुए मैं गुरूजी से प्रार्थना और आग्रह कर रही थी। मुझे ज्ञात था कि वह चाहें तो दक्ष को एक क्षण में ठीक कर सकते हैं। कक्ष में घुसते ही उनकी सुगंध आ गयी। मुझे याद था कि यदि उन्हें सत्य मन से स्मरण किया जाये तो वह तुरन्त सहायता करते हैं। वह गुलाब के पुष्पों की महक उनके वहां होने का सन्देश था।

चिकित्सक ने दक्ष का परीक्षण कर निराशाजनक रूप में मेरी ओर देखा। उनके अनुसार प्लीहा (स्प्लीन) और यकृत (हेपेटाइटिस) दोनों बहुत बड़े हुए थे, जो असाध्यता की ओर संकेत दे रहे थे।

चिकित्सक ने मुझसे भी वह अंग स्पर्श करवाए, जिससे मुझे उनकी क्षति का ज्ञान हो सके। उन्होंने तत्काल पराध्वनिक चित्रण (अल्ट्रासाउंड) की सलाह दी जिससे संकट के विस्तार का अनुमान लग सके। मेरे आँखों में आंसू भर गये: मैं उत्सुकता से गुरूजी से इस कठिनाई से निकालने के लिए प्रार्थना कर रही थी। मैंने उनके इतने चमत्कारों के बारे में सुना था और विश्वास था कि वह मेरे बेटे को पुनः स्वस्थ कर सकते हैं। प्रयोगशाला तक चालीस मिनट की यात्रा में हमारे साथ रही गुरूजी की सुगंध, यह संकेत करती रही कि सब ठीक हो जाएगा।

वहां पर जब परीक्षण चल रहा था, मेरे बेटे और मुझे, हम दोनों को गुरूजी की सुगंध आती रही। अंततः गुरूजी की कृपा से परीक्षण में कुछ नहीं निकला। यकृत और प्लीहा दोनों सामान्य थे - लक्षण बदल चुके थे। गुरूजी ने हमारी प्रार्थना स्वीकार कर मेरे पुत्र को नवजीवन प्रदान किया था।

उसी सांझ को जब हम गुरूजी के पास पहुंचे और प्रवेश करते हुए मैं उनको उस दिन के घटनाक्रम के बारे में बताने का विचार कर रही थी। उसी समय गुरूजी ने नटखट मुस्कराहट से स्वयं ही पूछ लिया कि क्या रोग निकला। मैं भावविह्वल हो गयी: उनको पहले ही उस दिन की सब घटनाओं का ज्ञान था और फिर भी उन्होंने हमारी उत्सुकता को शांत करने का अवसर दिया था।

मैंने उनको बताया कि चिकित्सक को कर्कट रोग होने का अंदेशा था। मेरी आँखों से पानी निकलने वाला था जब उन्होंने कहा कि मैं चिंता न करूं, मेरे पुत्र को कुछ नहीं होगा। मैंने उनसे प्रश्न किया कि क्या शेष परीक्षण कराने आवश्यक हैं। उन्होंने उत्तर दिया कि चूंकि मैं स्वयं चिकित्सक हूँ, मेरी चिंता परीक्षण करवाए बिना शांत नहीं होगी; यदि चाहूँ तो शेष परीक्षण करवा सकती हूँ। मेरे तार्किक मन के किसी कोने में छिपी हुई जिज्ञासा को शांत करने के लिए मैंने सब परीक्षण करवाए - सब सामान्य आये।

अंत में गाँठ की बाओप्सी हुई जो अब जुड़नी आरम्भ हो गयी थी। जो गाँठ निकाली गयी थी उसमें बदलाव दृष्टिगोचर था। मैं दुविधा में थी। यह कैसे संभव था? गुरूजी ने तो कहा था कि सब कुछ ठीक हो जाएगा फिर ऐसा क्यों हो रहा है? सब प्रकार के विचार मेरे मन में आ रहे थे। मैं हताश थी।

उसी दिन मुझे संगत में सप्ताह में एक बार ही आने को कहा गया। मैं असमंजस में थी कि गुरूजी ने ऐसा क्यों किया? अगले सप्ताह जब बाओप्सी का परिणाम आया तो सब कुछ सामान्य था। चिकित्सक यह विश्वास नहीं कर पा रहे थे; उन्होंने इसे चमत्कार ही कहा। परन्तु हमें पता था कि यह कैसे हुआ है। गुरूजी ने मेरे पुत्र को आशीष दिया था; यह तो होना ही था।

कुछ सप्ताह पश्चात् गुरूजी ने मात्र इतना ही कहा, "जा, तेरे मुंडे नु ठीक कर दित्ता।" उस दिन से दक्ष का ज्वर समाप्त हो गया, उसकी भूख ठीक हो गयी, गाँठ कम हो गयी और सब लक्षण भी मिट गये। गुरूजी धन्य हैं कि सब ठीक हो गया। उसे कभी कोई औषधि नहीं दी गयी क्योंकि कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सका था। गुरूजी के साथ हर क्षण चमत्कार है जो जीवन को और मधुर बनाता है। वह आपका हाथ पकड़ कर सही मार्ग दर्शन कराते हैं। वह आपकी हर आपदा से रक्षा कर, अपने ह्रदय से लगाकर रखते हैं जैसे एक माँ अपने शिशु को बचाती है। जब आप अपने मार्ग से भटक जाते हैं वह हल्के से अंकुश लगा कर वापस सही मार्ग पर लाते हैं। वह आपकी हर बात, हर सांस सुनते हैं और ईश्वर में विश्वास करने की प्रेरणा जागृत करते हैं - गुरूजी ऐसे हैं। निरहंकार भाव से वह सदा आप पर और आपके संपर्क में आने वालों पर सदा अपनी दृष्टि बनाए रखते हैं, सबको अपना आशीष देते जाते हैं। उनमें कोई घमंड, अहम् या चाहत नहीं है। वह सदा सहायता करने को तत्पर हैं। वह अज्ञेय हैं। उनके दर्शन के लिए आये सहस्रों भक्तों में कोई भी खाली हाथ नहीं लौटता है। प्रत्येक को यही लगता है कि वह केवल उनके साथ हैं। वह सबको इस संसार में रहने का सही मार्ग बताते हैं। जब हम कोई भूल करते हैं वह चुपचाप हमारे दुष्कर्म अपने पर ले लेते हैं और हमारे कष्ट सहन कर जाते हैं। उनके सदृश कोई नहीं है, न हुआ है और न ही होगा।

कुछ वर्ष पूर्व मेरी माँ को हिमोग्लोबिन कम होने के कारण चिकित्सालय में प्रविष्ट करवाना पड़ा था। चिकित्सकों के अनुसार उन्हें रुधिर देने की आवश्यकता थी। जैसे ही हमने गुरूजी को इस बात से अवगत कराया, उन्होंने मुस्कुरा कर उनको अनुमंत्रित कर दिया। अगले दिन माँ सब परीक्षण ठीक होने के कारण घर वापस आ गयीं।

श्वेत वस्त्रों में कल्याणकारी

मेरी मौसी, जो कभी गुरूजी से नहीं मिलीं, एक दिन अचेतनावस्था में चली गयीं और उन्हें चिकित्सालय में प्रविष्ट करवाना पड़ा। चूँकि उनका रक्तचाप अति उच्च था, चिकित्सक को संदेह था कि उनके मस्तिष्क में रक्तस्त्राव (ब्लीडिंग) हुआ है। गुरूजी उस समय दिल्ली में नहीं थे। मैंने उनके चित्र के समक्ष खड़े हो कर उनसे उपचार के लिए विनती करी। उस समय उनका केट स्केन हो रहा था। प्रार्थना करते ही उस कक्ष में गुरूजी की सुगंध भर गयी और उसका सामान्य परिणाम आया। मैं रात को अपनी मौसी को सोता हुआ छोड़ कर घर वापस आ गयी। प्रातःकाल उनके पास पहुँचने पर सुखद विस्मय हुआ - वह सचेतन अवस्था में अपने बिस्तरे पर बैठी हुईं थीं। उन्होंने बताया कि रात को श्वेत वस्त्रों में कोई आया था और उसने उन्हें उठने को कहा। मुझे एकदम पता लग गया कि गुरूजी आये होंगे। आज भी वह बिलकुल स्वस्थ हैं और हमें कभी यह पता नहीं लग पाया कि वह उस अवस्था में क्यों पहुँची - सब परिणाम सामान्य निकले थे।

गुरूजी तीन मास के पश्चात् जालंधर से लौटे तो जैसे ही मैं उनके चरण स्पर्श करने के लिए झुकी तो उन्होंने कहा, "मौसी नु भी ठीक करा लित्ता।" मैं चकित थी। वह यहाँ पर नहीं थे और किसी को मौसी की बिमारी के बारे में पता नहीं था। पर वह तो सर्वज्ञाता हैं, यह मुझे पता होना चाहिए था। यह आश्चर्य की बात है कि गुरूजी आपके बारे में, संसार के किसी भी कोने में, आप कहीं भी हों, सब जानते हैं। समय और स्थान उनके लिए कोई अर्थ नहीं रखते हैं। काल और अंतर उनके लिए अर्थहीन हैं।

कुछ वर्ष पूर्व ज्वर, पीठ दर्द और सांस में कठिनाई के कारण मुझे चिकित्सालय में प्रविष्ट होना पड़ा। कई प्रकार की औषधियों से लाभ न होने पर शुक्रवार के दिन विशेषज्ञ ने केट स्केन करने का निश्चय किया। विकिरण विशेषज्ञ ने स्केन देख कर कहा कि वह असामान्य था और भीतर जो भी पदार्थ है उसका विस्तार फेफड़ों तक हो गया है; उसका और विश्लेषण करने की आवश्यकता है। उस दिन मैं वहां पर अकेली थी और गुरूजी को याद करने के अतिरिक्त और कुछ नहीं कर सकती थी। मैंने पूरे दिन उनसे प्रार्थना करी।

उस दिन संध्या को मैं गुरूजी के पास गयी। अचानक उन्होंने मेरी ओर देख कर मेरे बारे में पूछा। मैंने उनको अपनी अवस्था के बारे में बताया कि मैं चिकित्सालय में हूँ; मुझे सांस लेने में कठिनाई है और सोमवार की रात को रोग की अत्याधिक पीड़ा के कारण चिकित्सकों को बुलाना पड़ा। मैंने उनको स्केन के निष्कर्ष से भी परिचित कराया और मुझे ठीक करने की विनती करी। मुस्कुरा कर वह बोले कि उन्होंने मुझे पुनः स्वस्थ कर दिया है। मैं अपने आंसू नहीं रोक पायी; उन्होंने मुझे ठीक करने में एक पल भी नहीं लगाया और मेरे सब रोग समाप्त कर दिये। उस रात मैं बिना किसी औषधि के आराम से सो पायी यद्यपि पिछले चार - पांच दिन से मुझे नींद नहीं आ रही थी। रात को जब चिकित्सकों ने मुझे बिना किसी उपकरण के सोते हुए देखा तो वह आश्चर्यचकित हो कर वापस चले गये। उन्हें कैसे पता होगा कि सबसे परम शक्ति अपना कार्य कर रही थी! अगले दिन प्रातः मैं वहां से अवकाश प्राप्त कर घर आ गयी और तीन वर्ष पहले के उस दिन के बाद कभी किसी रोग से पीड़ित नहीं हुई।

कुछ समय पूर्व मेरे पति, जो स्वयं चिकित्सक हैं, कोई एक सप्ताह तक प्रातःकालीन वेदना से पीड़ित रहे। उनके ह्रदय विश्लेषण में बदलाव थे; हमने उन्हें चिकित्सालय में भरती कराना चाहा पर वह यह कह कर घर वापस आ गये कि गुरूजी के परामर्श के बिना वह ऐसा कोई कदम नहीं उठाएंगे।

अगले दिन मैं उन्हें एक और हृदयरोग विशेषज्ञ के पास ले गयी जिन्होंने तुरन्त कुछ और परीक्षण कराने का परामर्श दिया क्योंकि प्रथम विश्लेषण में बदलाव स्पष्ट और काफी अधिक थे। भयभीत हो कर हम उसी समय गुरूजी के पास भागे, यह जानते हुए भी कि उस समय गुरूजी से मिलना संभव नहीं होगा। वहां पहुँचने पर हमें अत्यंत आश्चर्य हुआ जब तुरन्त उनके दर्शन हो गये और वह बोले कि अब अरुण को ठीक कराने आये हो।

भावविभोर होकर मैंने उनको पूरी बात बतायी तो उन्होंने अपना हाथ हिला कर आश्वासन देते हुए कहा कि कुछ भी नहीं है और अरुण ठीक हो जाएगा। उन्होंने अरुण को फिर से चिकित्सक के पास न जाकर कार्यालय जाने का परामर्श दिया। गुरूजी ने रोज दो व्हिस्की के पेग और कनक का सत् खाने को कहा!

कुछ सप्ताहोपरांत गुरूजी ने अरुण को कहा कि उन्होंने उसका ह्रदय ठीक कर दिया है अन्यथा उसकी शल्य चिकित्सा करवानी पड़ती। गुरूजी की कृपा से अरुण अब बिलकुल स्वस्थ हैं। संगत का यह सुखी परिवार देने के लिए हम गुरूजी के अति कृतज्ञ हैं। प्रार्थना है कि वह सदा अपनी दृष्टि हमारे ऊपर बनाये रखें।

गुरूजी की दया मेरी बहन पर भी रही है। एक बार उसकी बिमारी के समय रोग विश्लेषण में गाँठ की कुछ जटिल समस्या का निष्कर्ष निकाला। हमारी व्यथा सुन कर गुरूजी ने उसको आशीष देते हुए कहा कि उसे कुछ नहीं हुआ है और सब ठीक हो जाएगा। अगले दिन प्रातः प्रयोगशाला से संदेश आया कि नमूने में कुछ गलती हो गयी; मेरी बहन तो बिलकुल ठीक है।

ऐसा भी नहीं है कि मात्र मेरे परिवार को गुरूजी का प्रेम मिला है। मेरे पड़ोस में रहने वाले श्री सेठी को गंभीर रूप से अग्नाशयकोप हो गया था और उनके ठीक होने के आसार बहुत कम थे। गुरूजी ने उनको भी आशीर्वाद दिया और कुछ ही दिनों में वह गंभीर रोग से निकल कर सामान्य होकर वापस घर आ गये और अब अपने कार्य पर भी जा रहे हैं।

एक बार मानसिंह नाम का एक व्यक्ति अपने भाई का चित्र लेकर गुरूजी के पास आया और, यद्यपि किसी ने गुरूजी को उसके बारे में बताया नहीं था, गुरूजी उसे पहचान गये। उसका भाई गंभीर रूप से मस्तिष्क ज्वर से पीड़ित था। वह श्वास यंत्रों पर था और उसका डाइलिसिस भी होता रहा था। गुरूजी ने उसको भी अपना आशीर्वाद दिया और उसके भाई को देखने चिकित्सालय भी गये। चिकित्सकों ने उसके पुनः स्वस्थ होने की आशा छोड़ दी थी पर अगले दो सप्ताह में वह वहां से अवकाश प्राप्त कर घर वापस आ गया। उसके परिवार के सदस्य उसे पुनर्जीवित करने के लिए अब भी गुरूजी को अविराम धन्यवाद देते रहते हैं।

तुम्हारे साथ सदा से

मेरे जुड़वां बच्चे सदा इस बात पर झगड़ते रहते थे कि कौन बड़ा है। एक दिन गुरूजी ने बड़े की ओर उंगली दिखा कर बोले कि वह छह मिनट के अंतर से बड़ा है, उनका संशय दूर कर दिया। मैं यह सुन कर आश्चर्यचकित थी क्योंकि जन्म के समय कुछ जटिलता के कारण चिकिसक छोटे वाले का समय नहीं देख पाये थे। मैं सोच ही रही थी कि उनको इसका ज्ञान कैसे था। तभी उन्होंने मेरी ओर मुड़ कर कहा कि उन्होंने ही मेरे को इनके लिए आशीर्वाद दिया था और इसी कारण उन्हें यह पता है!

यह बात तब की है जब मैं उन्हें मिली भी नहीं थी, मैं उन्हें "गुरूजी" से जानती भी नहीं थी, उनका अपने जीवन में कभी आभास भी नहीं हुआ था। प्रत्यक्ष रूप से वह मुझे कालांतर से जानते थे और अपनी दृष्टि हम पर बनाये हुए थे। अचम्भे की बात नहीं है कि गुरूजी के पास हर दिन चमत्कृत होता है। सदा से अपना प्रेम न्यौछावर करते रहने के लिए हम गुरूजी के अति आभारी हैं।

स्वर्गीय अमिता सिंह, दिल्ली

जुलाई 2007