असाध्य रोग से मुक्ति

अखिल खरे, मई 2012 English
हमारा परिवार ईश्वर में आस्था रखता है और भगवान शिव की भी पूजा करता है। हमें गुरूजी के बारे में 2002 से पता था परन्तु इस बात का विश्वास करना कि गुरूजी, भगवान शिव के अवतार हैं और सब कुछ ठीक कर सकते हैं, हमारे लिए संभव नहीं था। उन दिनों मैं गुरूजी के विषय में अपने सहकर्मियों से लगातार सुन रहा था परन्तु उन पर विश्वास करने में मुझे तीन वर्ष लग गए।

मैं एक खुशहाल विवाहित जीवन व्यतीत कर रहा था। मैं कुछ वर्षों तक विदेश में भी रहा और मेरा एक बेटा भी है। वर्ष 1999 मेरे लिए बहुत सी कठिनाइयाँ लेकर आया, और उनमें सबसे बड़ी थी कि मुझे बहुऔषधि प्रतिरोधी तपेदिक (मल्टी-ऑर्गन ड्रग-रेज़िस्टेंट टी बी) रोग हो गया। इसका प्रभाव मेरे पेट, छाती और मस्तिष्क पर पड़ा। मेरा बहुत सारे चिक्तिसालयों में इलाज हुआ - ऐम्स, बत्रा और सीताराम अस्पताल - परन्तु मैं ठीक नहीं हो रहा था।

एक दिन ऐसा भी आया कि मुझे लगने लगा कि अब शायद मैं नहीं बचूँगा, क्योंकि मुझ पर किसी भी औषधि का प्रभाव नहीं हो रहा था और मैं बहुत निराश हो गया।

वर्ष 2005 के अंत में, मैं कर्नल (सेवानिवृत्त) डी.एस. चैटर्जी से मिला जो बहुत लंबे समय से गुरूजी के भक्त थे और ज्योतिष शास्त्र में निपुण थे| मैंने उनसे विनती की, कि वह कोई ज्योतिष सम्बन्धी उपाय बताकर मेरी मेरी समस्या हल करें। मुझे ऐसा लगा शायद वह मुझे कोई कीमती रत्न या धातु की कोई अंगूठी पहनने को कह देगें जिससे मैं ठीक हो जाऊँगा। किन्तु ऐसा नहीं हुआ। कर्नल चैटर्जी ने मेरी पीड़ा बड़े ध्यान से सुनी और तुरंत मुझे गुरूजी के पास जाने को कहा। मैंने ऐसा ही किया।

वर्ष 2005 की सर्दियों में मैं नियमित रूप से एम्पायर एस्टेट जाता रहा। मैं एक कोने में बैठ कर बस मन में गुरूजी से यही प्रार्थना करता, "गुरूजी, कृपा करके मुझे ठीक कर दीजिये।" और लंगर प्रसाद करके मैं घर वापस आ जाता। मैं गुरूजी के पास बस तीन या चार बार ही गया था जब मुझे अचानक मेरे घर में उनकी सुगंध का आभास हुआ। मेरी पत्नी चकित थी कि यह सुगंध कहाँ से और कैसे आ रही है? गुरूजी की सुगंध कई बार और भी मैंने अपने घर में अनुभव की। जब भी मैं गुरूजी के यहाँ से वापस आता तो अपने अंदर ऊर्जा और ताकत का आभास होता - जोकि मेरी बीमारी ने समाप्त ही कर दी थी।

मैंने गुरूजी से अपनी बीमारी के बारे में कुछ ही बार बात की जब उन्होंने मुझसे कहा, "हो जाएगी" (बीमारी ठीक हो जाएगी)। इस समय मेरे कार्यालय की ओर से मेरी विदेश में नियुक्ति नहीं कर पा रही थी। यद्यपि मैं जाने के लिए इच्छुक भी नहीं था, किन्तु मैंने विदेश की कम से कम एक यात्रा की माँग की। मेरी यह इच्छा तब पूरी हुई जब मैं लंदन गया।

और सबसे बड़ा चमत्कार तब हुआ जब वर्ष 2007 के अंत में, गुरूजी से मिलने के दो वर्ष बाद, मेरी टी बी की बीमारी पूर्ण रूप से ठीक हो गई।

गुरूजी ने मेरे परिवार की भी रक्षा करी। उसी वर्ष हम शिमला घूमने गए तब मेरा छोटा बेटा करीब 1.5 वर्ष का था। जब हम घूमने निकले तब अचानक से वह दौड़ता हुआ पहाड़ी के किनारे पर पहुँच गया| परन्तु गुरूजी हमारा ध्यान रख रहे थे। वह गिरने ही वाला था जब अचानक से रूककर मुड़ गया। गुरूजी ने मेरे छोटे बेटे का जीवन बचा लिया।

एक वर्ष बाद पुनः गुरूजी ने उसकी रक्षा की। एक दिन किसी बीमारी के कारण वह अचानक से बेहोश हो गया और कुछ मिनटों तक उसमें जान ही नहीं थी। मेरी पत्नी ने गुरूजी को केवल याद किया और वह पुनर्जीवित हो गया।

गुरूजी के आशीर्वाद से मेरा आत्मविश्वास भी बहुत बढ़ गया था और मैं एक नयी और अच्छी नौकरी ढूंढ रहा था। 2008 में मेरी यह इच्छा भी पूर्ण हो गई।

मेरी पत्नी ने भी गुरूजी के मंदिर जाना आरंभ कर दिया है। उसने वहाँ कई बार गुरूजी की सुगंध का अनुभव किया है और उसे परम आनंद का अनुभव भी हुआ। गुरूजी के आशीर्वाद अनंत हैं। मेरी बस यही प्रार्थना है कि गुरूजी की कृपा हम सब पर सदैव बनी रहे।

अखिल खरे, एक भक्त

मई 2012