जीवन में एक नई शुरूआत

अजीत तिवारी, अगस्त 2008 English
गुरूजी का मेरे जीवन में आगमन मेरे एक सहकर्मी हितेष के माध्यम से हुआ। उसने मुझे गुरूजी के बारे में, और गुरूजी की शरण में आने के बाद हुए उसके अनुभवों के बारे में कई बार बताया था, किन्तु किन्ही कारणों से मैं उनके पास नहीं जा पाया। उसकी एक वजह यह भी थी कि, यद्यपि मैं धार्मिक स्वभाव का और भगवान पर विश्वास रखने वाला व्यक्ति था किन्तु मुझे संतो, बाबाओं, और गुरूओं पर थोड़ा सा भी विश्वास नहीं था। इसके अलावा, मैं थोड़ा व्यस्त भी था और गुरूजी के पास जाने में टाल-मटोल भी कर रहा था।

एक शाम मैं 'कैलाश मानसरोवर' यात्रा पर एक वृतचित्र देख रहा था और मैंने 'ओम् नमः शिवाय' का जाप शुरू कर दिया। अगले ही दिन हितेष ने दुबारा मुझसे गुरूजी के मंदिर चलने के लिए पूछा, और यही वह पूर्व निर्दिष्ट दिन बना जिस दिन मुझे गुरूजी के दर्शन होने नियत थे। मेरा, छोटे मंदिर - जो कि एम्पायर एस्टेट में है, जाना संभव हो पाया। एक बार वहाँ पहुँचते ही मैंने अपार शाँति का अनुभव किया। गुरूजी के दर्शन से मेरे आंतरिक विश्वास को और बढ़ावा मिला और मुझे अपार खुशी का अनुभव हुआ क्योंकि मैंने वह शांति अनुभव की जिसके लिए हम आजीवन भटकते रहते हैं।

गुरूजी के दर्शन आज भी मेरे जीवन की नई शुरूआत में दृष्टिगोचर हैं, और अब भी जब मुझे वक्त मिलता मैनें उनके दर्शन के लिए जाना आरंभ कर दिया। मुझे गुरूजी के मंदिर जल्दी से जल्दी पहुँचने की तीव्र इच्छा बनी रहती। गुरूजी के मंदिर का वातावरण असाधारण है, और एक बात जो मुझे हमेशा सराहनीय लगती है, कि सारी संगत आपको वही प्रेम और स्नेह देती है, जो केवल परिवार जन देते हैं। संगत अपने अद्भुत सत्संग सबके साथ बाँटती है। कई बार मुझे आश्चर्य होता है कि गुरूजी की विशाल संगत में हर एक के पास कुछ न कुछ विशिष्ट बताने के लिए है, चर्चा के लिए सदैव कोई चमत्कार, कोई कृपा जो उन्होंने पायी।

छः महिने के अंतराल के बाद मेरा तबादला दिल्ली से चंडीगढ़ हो गया और मेरा मंदिर जाना रूक सा गया। मैं अब संगत में भी अपनी उपस्थिती नहीं दे पाता था। गुरूजी दिल्ली में थे और मैं चंडीगढ़ में, लेकिन मैं उनकी निकटता, छत्रछाया और संरक्षण सदैव महसूस करता। आज जब मैं यह अनुभव लिख रहा हूँ, मुझे गुरूजी के मंदिर गये हुए दो वर्ष से भी ज्यादा वक्त हो गया है, लेकिन मैंने गुरूजी को सदैव अपने साथ महसूस किया है।

गुरूजी की महासमाधी झकझोर देने वाली थी, किन्तु उनका सान्निध्य शारीरिक बंधनो से परे है। मैं गुरूजी के महासमाधी के बाद भी निरंतर उनका संरक्षण महसूस करता हूँ।

गुरूजी ने इस बात को चरित्रार्थ भी किया। एक दिन मैं और मेरी मंगेतर, प्रीति, फोन पर बातें कर रहे थे और मुझे गुरूजी की सुगंध आने लगी। प्रीति, जोकि उस वक्त तक गुरूजी के बारे में नहीं जानती थी, ने मुझे बताया कि उसे भी एक सुगंध आ रही है जबकि उसको आसपास कोई ऐसी चीज नहीं दिख रही थी। वह सुगंध 15 मिनट से ज्यादा समय तक निरंतर आती रही। मैंने इस मौके का लाभ उठाकर उसे गुरूजी के बारे में बताया। वह आश्चर्यचकित थी कि कैसे गुरूजी ने एक ही वक्त पर अपनी मौजूदगी का आभास फोन लाइन के दोनों छोरों पर करवा दिया जबकि हकीकत में हम दोनों हज़ारों मील दूर थे।

गुरूजी से यही प्रार्थना है कि वह हम सबको हमेशा अपनी शरण में रखें।

ओम् नमः शिवाय गुरूजी सदा सहाय।

अजीत तिवारी, एक भक्त

अगस्त 2008