जन संपर्क अधिकारी को पुनः वाणी प्राप्ति

अचल पॉल, जुलाई 2007 English
दिसंबर 1999 की शीत ऋतु मेरे लिए एक अति भयानक समाचार लेकर आई थी। धीरे - धीरे मेरी आवाज़ कम होती जा रही थी और थोड़े से शब्दों के उच्चारण के लिए भी मुझे विशेष प्रयास करना पड़ रहा था। कर्ण, नासिका और कंठ विशेषज्ञ से मिलने के पश्चात यह लग रहा था की दिल्ली की यह शीत ऋतु धुंध निरानंद होते हुए और भी प्रतिकूल होने वाली थी।

विस्तृत जाँच - पड़ताल के पश्चात विशेषज्ञों ने सर्जरी का परामर्श दिया जो सर गंगाराम चिकित्सालय में करी गई। मेरे बायप्सी का परिणाम आने पर हमारी आशंका की पुष्टि हो गई। कंठ में मेरी सूजन असाध्य, प्राणघातक कैंसर बन चुकी थी।

जब मेरी वाणी विकृत होने लगी, उसके मात्र दो मास पश्चात मैं जैसे नर्क में पहुँच गया था और इसका कारण समझ पाने में असमर्थ था। मैं सिगरेट, मद्य, तम्बाकू या पान का सेवन नहीं करता था। पर ईश्वर ही पालक हैं।

अपनी सर्जरी के पश्चात, तीन सप्ताह के विश्राम काल में, जिसमें मुझे कुछ भी बोलने की मनाही थी, मैं गुरूजी की शरण में रहा। मैं और मेरी पत्नी, हम दोनों गुरूजी के पास, मेरी दुर्दशा की अवस्था में पहुँचे थे। किन्तु उससे पहले एक और परीक्षा देनी थी। चिकित्सालय से आने के बाद पाँचवे दिन मेरी गुरूजी के पास जाने की अटूट अभिलाषा जागृत हुई।

संयोग से उस दिन अत्याधिक वर्षा हो रही थी। मेरे परिवार के सदस्यों ने मुझे किसी और दिन जाने की सलाह दी; पर मैं नहीं माना - मेरा मन पक्का हो चुका था। मेरे अन्दर उसी दिन जाने की आवाज़ उठ रही थी।

एम्पायर एस्टेट से गुरूजी के स्थान तक चलते हुए एक अद्भुत सुख का आभास हुआ। गुरूजी अपने रंगीन, लम्बे चोले में अपने स्थान पर आसीन थे। हमारा परिचय करवा कर हमें राजसिक रक्तिम कालीन पर आसन ग्रहण करने को कहा गया। गुरबानी के पवित्र शबद वातावरण में रस घोल कर उसे और मधुमय कर रहे थे। एक स्नेहमय किन्तु ओजस्वी ऊर्जा पूरे कमरे में फैली हुई थी। कुछ समय पश्चात चाय प्रसाद विस्तृत हुआ।

उसके एकदम बाद गुरूजी ने हमें बुलाया और मेरी घबरायी हुई पत्नी से कहा, "जा, तेरे हस्बेंड नू पचास फीसदी ठीक कर दित्ता, टेस्ट फिर करा ले।" उस समय यह विश्वास करना सरल नहीं था कि वह असाध्य रोग ठीक हो गया था। पर हमने गुरूजी की सलाह मानी। बायप्सी की शेष चार स्लाइड में से दो एम्स में दीं और दो मुंबई स्थित टाटा संस्थान में भेजीं। एक सप्ताह पश्चात परिणाम आने पर हम पुनः एम्पायर एस्टेट गए। हमारे प्रवेश करते ही गुरूजी मुस्कुराये और बोले, "क्यों, डाक्टर कंफ्यूज हो गए?" यह तथ्य था। दोनों संस्थानों से आये निष्कर्षों ने मुझे स्वस्थ घोषित किया था। प्रथम चमत्कार हो चुका था।

उसके पश्चात रोग चिकित्सकों ने रोग लक्षण प्रयोगशाला के निर्णयों की अवहेलना न कर उपचार पूरा कराने को कहा। मैंने निश्चय कर लिया था कि अब कोई भी उपचार गुरूजी के कथानुसार ही होगा। आगे यह हुआ - गुरूजी ने मुझे मिर्चों से भरा हुआ लंगर खाने को कहा। चिकित्सकों के अनुसार, जिन्होंने केवल मुझे उबला हुआ खाना खाने के निर्देश दिए थे, मिर्चें वर्जित थीं। गुरूजी ने मुझसे उच्चारण भी करवाया और घोषित कर दिया की मैं पूर्णताः स्वस्थ हूँ।

गुरूजी के परामर्श पर मैं रेडियोथेरेपी करवाता रहा परन्तु मुझ पर कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ा। मुझे कभी कोई उबकाई नहीं हुई और मेरा हिमोग्लोबिन सदा सामान्य से ऊपर रहा। एकमात्र औषधि, यदि ऐसा कह सकें तो, गुरूजी द्वारा अभिमंत्रित तांबे लोटे में जल भर कर पीने की रही। इस क्रिया में पूरी रात्रि जल भर कर रखने के पश्चात प्रातः काल आधा पीकर शेष से स्नान करना था। इस अति साधारण क्रिया पद्यति से मैं पूर्ण स्वस्थ हो गया। नव जीवन के लिए मेरा ऐसा चमत्कारिक परिवर्तन रहा है। यह सिद्ध करने के लिए मेरी दो बेटियाँ और पत्नी हैं - धन्य हैं गुरूजी!

अचल पॉल, दिल्ली

जुलाई 2007