विद्यालय से आइफल टावर तक - गुरूजी के संरक्षण में

आरती गर्ग, जुलाई 2007 English
गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु, गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरु साक्षात् पारब्रह्म, तस्मै श्री गुरवै नमः।।

गुरूजी से मिलने से पूर्व ईश्वर की दया और उसके प्राणी प्रेम में मेरा विश्वास सदा अस्थिर रहा था। गुरुकृपा का शब्दों में वर्णन करना अति दुसाध्य कार्य है। जिस प्रकार परमात्मा प्रार्थनाओं का फल देते हैं, उसी प्रकार गुरूजी के सत्संगों में वक्ता और श्रोता दोनों को वरदान और असीम आनंद प्राप्त होता है। मैंने सुना है कि ईश्वर हमारे कर्मानुसार परिणाम देते हैं। किन्तु मैंने गुरूजी को, अपनी दिव्य ज्वाला में, हमारे दुष्कर्मों को जलाते हुए देखा है। फलस्वरूप, हम उस जीवन से उभर सकें, जो उनके कोमल चरण स्पर्श कर कृतज्ञ हुए बिना जीना पड़ता।

गुरूजी के प्रथम दर्शन के समय मैं ग्यारहवीं कक्षा में पढ़ती थी। यद्यपि मेरा जन्म पंजाब में हुआ था, उस समय हम नोएडा में रहते थे और मुझे पंजाबी भाषा का ज्ञान बिलकुल नहीं था। अतः मुझे शबद या गुरूजी का कथन बिलकुल समझ नहीं आते थे। निःसंदेह, प्रथम दर्शन पर मुझे कितना अच्छा प्रतीत हुआ, यह वर्णन करना बहुत कठिन है।

मेरे प्रभु के शब्द - मेरी वाणी में

अपने विद्यालय के वार्षिकोत्सव पर मुझे स्वागत भाषण देना था। यद्यपि मैं यह सदा से करती आयी थी, इस बार मुख्य अतिथि अति वरिष्ट अधिकारी थे। मेरे उपसंहार पर सब उपस्थित गणों ने तालियों की गड़गड़ाहट से मेरी प्रशंसा करी। मंच से उतरते ही सबने मेरी सराहना करी और बधाईयों के पुल बांध दिए। शिक्षकों और सहपाठियों ने, अचरज भरे चेहरों से, मुझे बताया कि भाषण देते हुए मुझ में परिवर्तन स्पष्ट झलक रहा था। उससे भी अधिक अचम्भा तब हुआ जब मुख्य अतिथि का भाषण मेरे कहे हुए पर आधारित था। अंत में उन्होंने मेरे उपसंहार को महत्व देकर उससे ही अपना भाषण समाप्त किया। सबको यह आश्चर्यजनक प्रतीत हुआ पर मुझे पता था कि यह गुरूजी की कृपा से ही संभव हो सका। वास्तव में, जैसे ही मैंने अपना भाषण प्रारंभ किया, मुझमें एक अदभुत ऊर्जा का संचार होने लगा और मैं अपने शब्दों में उत्तेजना भर सकी।

इसके अतिरिक्त मैंने, अपने विद्यालय में, अनेक बार गुरूजी की पुष्पों भरी सुगंध का अनुभव किया है।

कक्षा 12 में सहायता

बारहवीं कक्षा में पहुँचने पर अध्ययन का महत्व अधिक हो गया। एक दिन प्रसाद देते हुए गुरूजी ने मेरे विषय पूछे। मैंने उन्हें बताया कि मैं वाणिज्य (कॉमर्स) की छात्रा हूँ, तो उन्होंने अर्थशास्त्र पर प्रश्न करना आरम्भ कर दिया। उन्होंने मेरे से ऋण नियंत्रण पर प्रश्न पूछा तो उत्तर पता होने पर भी मैं बुद्धि शून्य हो गयी।

यद्यपि उस समय मुझे समझ नहीं आया, आने वाले समय में मुझे पता लगा कि गुरूजी ने क्या किया था। गुरूजी की चेतावनी से मैं इस विषय पर विशेष ध्यान देने लगी। इससे बाद जो हुआ उसके लिए मैं तत्पर थी। वर्ष की दूसरी छमाही में हमारी अर्थशास्त्र की अध्यापिका चली गयी और यह विषय हमें स्वयं पढ़ना पड़ा। गुरूजी की सावधानी से मैं सतर्क हो गयी थी और बिना किसी कठिनाई के मैंने इस विषय में 97% अंक प्राप्त किये।

जैसे जैसे मेरी परीक्षाएं समीप आ रही थीं, गुरूजी के पास दर्शन के लिए जाना कम हो गया (अंशतः उनके निर्देश थे कि मैं पढ़ाई पर ध्यान दूं)। 13 जनवरी, उत्तर भारत में लोहड़ी के दिन, मैं अपने माता पिता और भाई के साथ गुरूजी के दर्शन के लिए गयी थी। परीक्षाएँ समाप्त होने से पूर्व यह अंतिम दर्शन होने की संभावना थी। गुरूजी उस दिन स्वयं प्रसाद वितरित कर रहे थे और जब तक मेरी बारी आयी तो टॉफी दे रहे थे। प्रसाद वहीं पर समाप्त करना है, ऐसा गुरूजी का आदेश था, किन्तु टॉफियाँ अपवाद थीं। सो मैंने थोड़ा सा प्रसाद वहीं पर खा लिया और शेष अपने पास रख लिया।

मैं गुरूजी के पास आज्ञा लेने पहुँची और उनके कमल चरणों को स्पर्श करने झुकी। जब मैं उठ रही थी तो गुरूजी ने अपना एक चित्र निकाला और मुझे दिया (यद्यपि मैंने उनके पास कोई लिफाफा नहीं देखा था)। मैं अति हर्षित हो गयी क्योंकि गुरूजी का चित्र तो अमूल्य है। गुरूजी ने उस रात क्या किया था उन घटनाओं पर घर लौटते हुए चिंतन करने का अवसर मिला। उनके चित्र को अपने हाथों में पकड़े हुए मुझे आभास हुआ कि उसमें से गुरूजी की सुगंध आ रही है और यह परीक्षाएं समाप्त होने तक रही। मैं यह चित्र अपने साथ परीक्षा भवन में ले जाती थी। अंतिम परीक्षा समाप्त होते ही उसमें से सुगंध आनी बंद हो गयी, मानो गुरूजी ने अपने चित्र में परीक्षाओं के लिए ही विशेष धारा प्रवाहित करी थी।

उस रात घर पहुँचने पर जब मैंने बची हुई टॉफियाँ गिनी तो कुल बारह थीं - प्रत्येक परीक्षा के लिए दो। गुरूजी के चित्र और इन टॉफियों के साथ मैंने अपनी परीक्षाएं पूर्ण करी। बहुत अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होकर दिल्ली के ही सबसे अच्छे महाविद्यालयों में से एक में प्रवेश पाने में सफल रही।

प्रेम: आइस क्रीम और सबसे मनोहर जन्म दिवस

एक दिन गुरूजी ने कुछ भक्तों के साथ गुड़गाँव के एक होटल में जाने की योजना बनायी और मुझे भी साथ आने को कहा। कुछ ही देर में हम सब ब्रिस्टल होटल पंहुच गये। गुरूजी का पूरा ध्यान मुझ पर केन्द्रित था क्योंकि मैं सबसे छोटी थी। गुरूजी ने तीव्र गति से होटल का चक्कर काटा और फिर बैठ कर सब के लिए शीतल पेय मंगवाए। उसके साथ ही कुछ खाने का आहार आया और बाद में आइस क्रीम भी आयी। हमने अविस्मरणीय समय व्यतीत किया। निकलते हुए, कारों में चढ़ने के समय, गुरूजी ने विशेष रूप से मेरी पूछताछ करी और यह ध्यान रखा कि मैं सही प्रकार से उनके स्थान तक पहुँच सकूं। गुरूजी ने अपने यहाँ पहुँचने पर मेरे अनुभव के बारे में पूछा। वह तो अति निराला ही रहा था। गुरूजी ने मेरे से यह भी पूछा कि क्या मैंने आइस क्रीम खायी थी? गले में कष्ट होने के कारण मैंने नहीं खायी थी। गुरूजी ने कहा कि आइस क्रीम खाने से मेरा गला ठीक हो जाता। कालान्तर में मुझे पता लगा कि गुरूजी ने मेरे गले का कष्ट समाप्त कर दिया था! उस दिन के पश्चात्, मेरा गला जो हर वर्ष एक बार अवश्य खराब होता था, कभी खराब नहीं हुआ।

गुरूजी के उत्कृष्ट संरक्षण और प्रेम की विशेष झलक एक दिन और प्रकट हुई। हम संगत में शबद सुन रहे थे और गुरूजी द्वारा प्रसाद वितरण की प्रतीक्षा कर रहे थे। गुरूजी के आदेश पर प्रसाद लाकर उनके पास रख दिया गया। उस दिन गुरूजी ने, जिस ओर मैं बैठी थी, उधर से प्रसाद बांटना आरम्भ किया। प्रसाद लेने के लिए सबसे पहले मैं ही थी। जैसे ही मैं प्रसाद लेने के लिए उनके पास पहुँची, उन्होंने पंजाबी में यह कह कर कि मैं अपने जन्म दिवस का पूर्ण आनंद लूं, विस्मित कर दिया। संगत में किसी को मेरे जन्म दिवस के बारे में पता नहीं था और मेरे परिवार के किसी भी सदस्य ने उनको यह बताया नहीं था। वह मेरा सबसे मनमोहक जन्मदिवस रहा है।

गुरूजी असंभव करते हुए

दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक में उतीर्ण होने के बाद मैं कुछ नहीं कर रही थी। गुरूजी ने मुझे सिम्बिओसिस, एक प्रमुख संस्था से, पत्राचार द्वारा एम बी ए करने के निर्देश दिए। मैं अंतिम समय में प्रपत्र भर कर प्रवेश पाने में सफल रही। परीक्षाओं के लिए मैंने दक्षिण दिल्ली केंद्र अपना प्रथम विकल्प दिया था। किन्तु दुर्भाग्य से मुझे दिल्ली के दूसरे छोर पर केंद्र मिला। मेरे पिता ने अंतरण के लिए आवेदन दिया पर पुणे से उत्तर मिला कि एक बार केंद्र निर्धारित होने पर उसे बदलना संभव नहीं है।

प्रतिदिन परीक्षाओं के कारण मेरा एक दिशा में 45 किलोमीटर यात्रा करना संभव नहीं था। अतः निर्णय लिया गया कि मैं अपने दादा दादी के पास रहूँ जो उस केंद्र से 10 - 15 किलोमीटर दूर रहते थे। नोएडा में उनके पास रहने से मेरा गुरूजी के पास जाना असंभव था। किसी प्रकार से मैंने पहली परीक्षा तो दे दी, किन्तु मैं इतनी दुखी थी कि मेरा मन शेष परीक्षाओं को छोड़ने का बन रहा था। मैं रोई और गुरूजी द्वारा किसी प्रकार से इस स्थिति से निकालने की प्रतीक्षा में रही। उसके पश्चात् जो हुआ उसकी कल्पना भी नहीं करी थी।

अगले दिन जब सब परीक्षा में मग्न थे, एक अधिकारी ने आकर घोषणा करी कि क्या कोई परीक्षार्थी अपना केंद्र बदलने को इच्छुक है - और उनकी सूची में दक्षिण दिल्ली केंद्र का नाम भी था। मैं तो उछल पड़ी और तुरन्त अपना नाम लिखवा दिया। परीक्षा के अंत में उस अधिकारी के पास जाने पर उसने बताया कि अधिक परीक्षार्थियों के कारण इस केंद्र पर स्थान की कमी थी और मेरा आवेदन स्वीकार हो गया था। अब मैं परीक्षाएं होते हुए भी गुरूजी के दर्शन कर सकती थी। गुरूजी के अन्यथा और कौन ऐसा कर सकता था? गुरूजी की शक्तिओं को समझ पाना हमारी बुद्धि के वश की बात नहीं है - उनके कार्य तो तर्क को भी मात देते हैं।

एक बार गुरूजी की संगत में भूकंप आ गया। पहले तो सब बैठे रहे पर जब वह कुछ देर तक आता रहा तो कुछ हलचल आरम्भ हो गयी। यह देख कर अटल बैठे गुरूजी ने अपने मोड़ कर रखे हुए दोनों पांव पृथ्वी पर रख दिए - कम्पन तुरन्त बंद हो गये!

एक दिन गुरूजी कुछ अनुयायियों के साथ, जिनमे मैं भी थी, बड़े मंदिर गये थे। मुख्य द्वार पर निर्माणकार्य प्रगति पर था और सुविधा के लिए ईंटों पर एक लकड़ी का फट्टा रख दिया गया था। हमने फट्टे पर चल कर प्रवेश किया किन्तु गुरूजी ने गीले सीमेंट पर चल कर प्रवेश किया। हम यह देख कर अति अचंभित हुए कि उनके चलने के कोई चिह्न शेष नहीं थे, किन्तु जब हमने उसी स्थान पर बहुत हल्के से ऊँगली लगायी तो उसके भी निशान बन रहे थे!

पंद्रह दिन में विवाह

एक बार गुरूजी की शरण में आने पर वह हमारी सब चिंताओं और कष्टों का निवारण करते हैं। चूँकि हमारा ज्ञान हमारे अनुभवों और वर्तमान परिस्थितियों तक ही सीमित है, हमें स्वयं की आवश्यकताओं को समझने की सामर्थ्य भी सीमित है। इसके विपरीत गुरूजी को उनका पूरा ध्यान है और उसके लिए वह प्रावधान भी कर देते हैं। गुरूजी ने मेरे विवाह का भी प्रबंध किया हुआ था और मेरी माँ को छह वर्ष पूर्व ही बता दिया था कि यह घटना कब घटेगी, पर उसकी गति सबके लिए अति तीव्र थी।

अप्रैल के प्रारम्भ में गुरूजी ने मेरे पिता से पूछा क्या किसी प्रस्ताव पर विचार हो रहा है? मेरे पिता ने उत्तर दिया कि एक प्रस्ताव आया अवश्य है किन्तु उस पर गंभीरता से विचार नहीं हुआ क्योंकि अभी मेरे विवाह के बारे में सोचा नहीं जा रहा है। गुरूजी ने आदेश दीया कि उस पर विचार किया जाये। मेरे पिता ने तब इस बारे में परिवार में चर्चा करी।

मेरे होने वाले वर स्वीडन में रहते थे और 16 अप्रैल को एक मास के लिए भारत आ रहे थे। यह निश्चित हुआ कि दोनों परिवार 17 अप्रैल को मिलेंगे। उस दिन जब हमारी पहली भेंट हुई तो कुछ ही देर में पूरा वातावरण उल्लासित हो गया।

सब व्यवस्थाएं उसी समय तय हो गयी और थोड़ी ही देर में हमारे बीच अंगूठी का आदान प्रदान भी हो गया। एकाध दिन में विवाह की तिथि भी निश्चित हो गयी - उसी मास की 30 तारीख! विवाह के सब प्रबंध अति तत्परता से किये गये और निश्चित तिथि को मेरा पाणिग्रहण भी हो गया।

यद्यपि गुरूजी विवाह में उपस्थित नहीं थे किन्तु उनकी भावना सबमें दृष्टिगोचर थी। सबने विवाह स्थल में सजावट, वातावरण, भोजन आदि व्यवस्थाओं की भूरि भूरि प्रशंसा करी - हर व्यवस्था में गुरूजी की कृपा ही झलक रही थी।

गुरूजी के साथ आइफल टावर पर

मेरे पति की मई के मध्य में वापस लौटने की योजना थी क्योंकि उन्हें उतना ही अवकाश मिला था। 15 दिन में मेरे लिए पार-पत्र और वीसा दोनों मिलना नितांत कठिन था। यथाशीघ्र स्वीडन के दूतावास को आवेदन किया गया परन्तु उन्होंने बताया कि सब आवेदन स्वीकृति के लिए स्वीडन भेजे जाते हैं और उसके पश्चात् यहाँ से वीसा दिया जाता है। अतः मेरे पति, सुशील, को अकेले ही स्वीडन लौटना पड़ा - उनके लिए अपनी यात्रा और स्थगित करना संभव नहीं था। प्रतीक्षा में एक मास व्यतीत हो गया। स्वीडन में उन्होंने भी दूतावास में शीघ्रता करने के लिए निवेदन किया। जून के आरम्भ में ऐसा लगा कि वीसा एक सप्ताह में मिल जाएगा। मेरी यात्रा के टिकट 16 जून के लिए ले लिए गये और उल्टी गिनती प्रारंभ हो गई। 16 जून को दूतावास जाने पर ऐसा लग रहा था कि हमारा वहां जाना निरर्थक रहा। वहां पर बताया गया कि अभी भी उत्तर की प्रतीक्षा है। मैं निराश हो गयी क्योंकि इसका अर्थ था - एक सप्ताह का विलम्ब। मैंने यह सूचना अपने पिता को दी और कुछ देर में पुनः प्रयास किया। वहां के अधिकारी ने जब मुझे मेरा वीसा दिया तो अति अचम्भा हुआ। अति प्रसन्न होकर मैंने यह सूचना अपने पिता को दी। आश्चर्य की बात थी कि उन्हें कोई अचरज नहीं हुआ।

बाद में मेरे पिता ने मुझे बताया कि गुरूजी ने, मेरी सूचना आने से 15 - 20 मिनट पहले ही, उन्हें वीसा मिलने की बात से अवगत करा दिया था। मैं समझ गयी कि उस दिन गुरूजी के हस्तक्षेप के बिना वीसा मिलना असंभव था। गुरूजी वास्तव में असीमित प्रेम के स्तोत्र हैं और उनमें अद्भुत प्रतिभाएं हैं। उन्हें कोई भौतिक अवरोध रोक नहीं सकते। वह त्रिकालदर्शी हैं और अपने अनुयायियों की पुकार पर सब सीमाएं पार कर सकते हैं।

स्वीडन से एक सप्ताहांत हमने पेरिस में बिताने का निर्णय लिया। वहां पर, जब मैं आइफल टावर की पहली मंजिल पर थी मुझे अचानक गुरूजी की सुगंध का आभास हुआ। फोन पर मेरे पिता के साथ हुई अगली वार्ता में उन्होंने बताया कि गुरूजी मेरे बारे में पूछ रहे थे; उन्होंने इस वार्तालाप की तिथि और समय भी बताया। थोड़ा गणित करने पर पता लगा कि जब उन्होंने मेरे पिता से मेरे बारे में पूछा था उस समय मैं आइफल टावर की पहली मंजिल पर ही थी।

गुरूजी के साथ मेरे अनुभवों का वर्णन एक गूंगी महिला द्वारा मिठास का वर्णन सदृश है। वह मेरे लिए क्या हैं और मेरे जीवन में उनका क्या अर्थ है यह शब्दों में व्यक्त करना मेरे लिए संभव नहीं है। मैं गुरूजी से प्रार्थना करती हूँ कि जैसे आप हमारे संबंधों के इन स्वर्णिम वर्षों में दया करते आये हैं उसी प्रकार सदा हमारा हाथ थामे रहिए। कहते हैं कि पारस लौह धातु को छूने मात्र से उसे स्वर्ण में परिवर्तित कर देता है पर गुरूजी तो पत्थर को हीरे में बदल देते हैं - केवल पूर्ण विश्वास और श्रद्धा बने रहने चाहिए।

आरती गर्ग, स्टॉकहोम, स्वीडन

जुलाई 2007