परम पिता का संतान सुख आशीष

आकाश सेठी, मार्च 2008 English
सर्वप्रथम जून 1998 में मुझे गुरूजी के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। मेरे मामाजी, गुरूजी द्वारा अपने ह्रदय रोग के चमत्कारी निवारण के सम्बन्ध में उनके बारे में चर्चा करते रहे थे। मेरे मामाजी को उनके ह्रदय रोग विशेषज्ञ ने अति शीघ्र बायपास शल्य क्रिया का सुझाव दिया था। अपने आप को मानसिक रूप से तत्पर कर वह गुरूजी का आशीर्वाद लेने गये। गुरूजी ने अपने पास बिठा कर उनको अपने पाँव दबाने को कहा। फिर उनसे उनके स्वास्थ्य के बारे में प्रश्न किया। मामाजी ने उन्हें उत्तर दिया और प्रस्थान करने की आज्ञा माँग कर उनको होने वाली शल्य क्रिया की सफलता के लिए कृपा बनाए रखने का आग्रह किया। गुरूजी बोले कि उन्होंने उनका बायपास कर दिया है। यह मामाजी जैसे श्रद्धालु के लिए विश्वास करना कठिन था, पर उन्हें प्रसन्नता थी कि गुरूजी ने उन्हें धन्य कर दिया था।

अगले दिन प्रातः मामाजी प्रवेश पूर्व परीक्षणों के लिए चिकित्सालय गये। परिणाम के अनुसार उनका ह्रदय ठीक प्रकार से कार्य कर रहा था। ह्रदय रोग विशेषज्ञ के निष्कर्ष के अनुसार उनकी अच्छी निद्रा के कारण परिणाम सही थे। उन्होंने मामाजी को एक अन्य प्रयोगशाला से परीक्षण करवाने को कहा। पुनः जब वही फल आये तो चिकित्सक अचम्भे में पड़ गये। तब मामाजी ने पूर्व रात गुरूजी का प्रसंग सुनाया तो चिकित्सक को गुरूजी के दिव्य हस्तक्षेप पर चुप्पी साधने के अतिरिक्त कोई और स्पष्टीकरण नहीं सूझा।

यद्यपि अब मुझे गुरूजी के प्रभाव के बारे में ज्ञान था, उन दिनों श्रीनगर में रहने के कारण उनके दर्शन नहीं कर पाया। मैं दिल्ली थोड़े समय के लिए कार्यवश ही आता था। सौभाग्य से अगली बार जब मैं दिल्ली आया तो मामाजी ने शुभ समाचार दिया कि गुरूजी दिल्ली में ही हैं और हम उनसे मिल सकते हैं। उसी संध्या को हम एम्पायर एस्टेट गये। हमारे पहुँचने तक बहुत देर हो गयी थी। लंगर का अंतिम चक्र चल रहा था और गुरूजी कुछ देर के लिए अपने कक्ष में चले गये थे। हम लंगर समाप्त करने के बाद संगत में बैठे थे जब गुरूजी अपने कक्ष से बाहर आये। गुरूजी के प्रथम दर्शन, काला कुर्ता धारण किये सभागृह में प्रभावशाली, निरहंकारी और मनोहर चाल से चलते हुए, आज भी मेरे मनस पटल पर अंकित हैं। उन्होंने मामाजी को पहचान लिया और हम नवागुन्तकों को देख कर हमारे पास आये। उन्होंने मामाजी को हमारा परिचय कराने को कहा और महरौली गुड़गांव मार्ग पर "दि रैंच" नामक एक कृषि भवन में अपने जन्म दिवस पर आने को कह कर हमें प्रस्थान करने की छुट्टी दे दी।

प्रथम दिवस और परीक्षा काल

संयोग से, अगले दिन दिल्ली में अपने कार्यालय पहुँचने पर, मुझे अस्थायी काल के लिए वापस श्रीनगर जाने को कहा गया। वहां पर कार्यरत एक नवीन अधिकारी से कुछ चूक हो गयी थी और एक ग्राहक ने उच्च क्षेत्रीय कार्यालय में असंतोष प्रकट किया था। गुरूजी से उनके जन्मदिवस के अवसर पर उनके दर्शन न हो पाने की निराशा के साथ मैं श्रीनगर लौट गया। मुझे सौंपे गये कार्य में सफल होने का विश्वास था, क्योंकि मुझे गुरूजी के दर्शन और आशीष, दोनों प्राप्त हुए थे। मुझे ज्ञात था कि सब कुछ गुरूजी की इच्छानुसार ही होगा। कठिन परिस्तिथियों में मैं श्रीनगर और अवंतीपुर के कार्य संभालता रहा। वह ग्राहक अत्याधिक अपेक्षा रखता था और अपने अभियोग सिद्ध करने के लिए हमसे बहुत कार्य करवाता था। संभवतः इससे पूर्व मैं यह कार्य न कर पाता, पर इस बार अंतर था। मेरे पास एक आश्रय था और कठिन काल में मैं उनको याद करता था।

अन्ततः, एक मासोप्रांत उस ग्राहक ने मुझे अपने कार्यालय में बुलाया। उसने मेरे समक्ष ही क्षेत्रीय कार्यालय में फ़ोन किया और मेरे द्वारा दी गई उच्च स्तरीय सेवाओं की अति प्रशंसा करी। उसने अपना अभियोग भी वापस ले लिया और मुझे प्रशंसा पत्र भी दिया। मुझे पता था कि इसका कर्ता कौन है।

गुरूजी के पुनः दर्शन होने की उत्सुकता सहित मैं दिल्ली वापस आ गया। मेरे परिवार के सदस्य गुरूजी के जन्मदिवस आयोजन पर गये थे और नियमित रूप से एम्पायर एस्टेट भी जाते रहे थे। उन्होंने मुझे गुरूजी के जन्मदिवस के अवसर पर उपस्थित सहस्रों श्रद्धालु और उन भक्तों के बारे में बताया जिनकी गुरूजी ने सहायता करी था। मैंने सोचा, "क्या वह हमें संतान सुख का आशीष देंगे?" विवाह के सात वर्ष बीतने पर भी हम संतान सुख से वंचित थे। चिकित्सा, प्रार्थना और उपाय - सब असफल रहे थे। मेरे मामाजी ने गुरूजी का आशीर्वाद लेने का सुझाव दिया। उन्होंने अपने एक ठेकेदार मित्र का प्रसंग भी बताया।

"त्वानु बच्चे लभेंगे, भज्ज जा"

मामाजी के उन मित्र को विवाह के सोलह वर्ष उपरान्त भी कोई संतान न होने पर गुरूजी का आशीर्वाद प्राप्त हुआ था। गुरूजी ने उन्हें बोला, "पुत्तर वी दित्ते, धी वी दित्ती। होर इसी साल।" यह अविश्वसनीय प्रतीत हो रहा था, किन्तु गुरूजी के सत्य वचनानुसार, उनकी पत्नी ने 31 दिसंबर को एक साथ तीन बच्चों को जन्म दिया - दो पुत्र और एक कन्या। "गुरूजी के आशीर्वाद से सब कुछ संभव है... पर हमें उनका आशीर्वाद कब मिलेगा?" मैं उत्सुक था। हम गुरूजी के यहाँ निरंतर जाते रहे पर उन्होंने कभी हमसे बात नहीं करी। अन्य महानुभावों ने गुरूजी पर विश्वास बनाये रखने का सुझाव दिया - "वह अनुकूल समय आने पर बात करेंगे। उनके पास जाकर अपनी समस्या मत बताओ।"

एक दिन जब हम लंगर के पश्चात् संगत में बैठे हुए थे, गुरूजी ने मुझे अपने पास आने का इशारा किया। क्या वास्तव में मुझे बुला रहे थे? संगत ने आश्वस्त किया कि मुझे ही बुलाया है। मन में अनगिनित विचार समेटे, किन्तु बोलने का साहस जुटाने के असफल प्रयास सहित, मैं उनके पास पहुंचा, "एथे क्यों आया वें?" "गुरूजी, कोई बच्चे नहीं हैं।" बस, इतना बोलने का साहस ही जुटा कर मैंने उत्तर दिया। अनासक्त भाव से वह बोले, "त्वानु बच्चे लभेंगे, भज्ज जा।" कुछ सोचे बिना ही मैं बोल पडा, "गुरूजी, मैं भागने के लिए नहीं आया हूँ।" गुरूजी मुझे देख कर बोले, "चंगा, अठ्वें दिन आता रहीं।" इस बात ने मुझे अति विस्मित कर दिया। गुरूजी को कैसे पता कि हर आठवें दिन आना ही मेरे लिए सुविधाजनक है। उस समय मैं आठ दिन के पाली चक्र में कार्यरत था - दो दिन प्रातः, दो दिन अपराह्न, दो दिन रात्रि और फिर दो दिन अवकाश। इस प्रकार पहले अवकाश को ही सत्संग में आना सुविधाजनक था।

हमने गुरूजी के दर्शन के लिए हर आठवें दिन जाना प्रारम्भ कर दिया। संगत के अनुमंत्रित भाग्यवान सदस्य अपने अनुभव सुनाते थे। इससे हमें भी आश्वासन मिलता था कि गुरुकृपा से हमारी मनोकामना भी पूर्ण होगी - पर कब? हम स्वयं से प्रश्न करते रहते थे। अन्य समस्याएँ हल हो रहीं थीं। मेरी पत्नी का कार्य स्थायी हो गया था। अपने साक्षात्कार से पूर्व उसने गुरूजी से आशीष प्राप्त किया और 42 प्रत्याशियों में वह अकेली चुनी गयी थी। हमारी आर्थिक परिस्थितियों में भी सुधार हो रहा था।

हम दोनों संतानोत्पत्ति निष्फलता का उपचार करा रहे थे, परन्तु सफलता हाथ नहीं लग रही थी। यद्यपि चिकित्सिका को आशा नहीं थी, तद्यपि उन्होंने गर्भाशय में वीर्यारोपण का सुझाव दिया था। उन्होंने कहा कि यदि यह भी असफल रहा तो फिर बाह्य प्रत्यारोपण कर गर्भाशय में बिठाने का प्रयास करा जाएगा, किन्तु वह अधिक मूल्यवान होगा। उन्हीं दिनों मुझे अपने उच्च कार्यालय से समाचार मिला कि मुझे अधिशासी एम बी ए की प्रवेश परीक्षा देने के लिए चुना गया है। जून 2000 में प्रारम्भ होने वाले इस प्रोग्राम की अवधि एक वर्ष थी। मैं दुविधा में था। मेरी पत्नी परीक्षा देने के विरुद्ध थी। मैंने उसे गुरूजी पर यह निर्णय छोड़ने को कहा। उसके अनुसार मेरे चुने जाने पर उपचार वर्ष भर बंद करना पड़ेगा। गुरूजी के अगले दर्शन के अवसर पर साहस बटोर कर मैंने उनका सुझाव माँगा। गुरूजी ने उत्तर दिया कि ऐसे अवसर जीवन में बार बार नहीं आते और मुझे जाना चाहिए। यह बात सुनकर मेरी पत्नी उदास हो गयी।

मैंने परीक्षा दी। सफल अभ्यार्थियों की सूची आने से पूर्व, कई चर्चाएँ होती थी। यह सुन कर कि मेरा नाम उन चर्चाओं में नहीं था, मेरी पत्नी चिंतामुक्त हुई।

इसी समय चिकित्सिका ने 2 जून 2000 को, अंतिम बार, पुनः पिछली प्रक्रिया दोहराने का निर्णय लिया। उन्हें इस बार भी कम आशा थी, उन्होंने कहा कि अगली बार दूसरी प्रक्रिया करेंगे। मैंने अपने कार्यालय में समाचार दिया कि मैं विलम्ब से पहुंचूंगा। इधर चिकित्सालय में प्रथम नमूना और परीक्षणों के बाद मुझे एक और नमूना देने को कहा गया। जब मैंने अपने कार्यालय में बताया कि और विलम्ब होगा और बहुत अधिक विलम्ब होने पर नहीं आऊँगा तो उस अधिकारी ने निर्देश दिया कि भले ही कितनी देर हो जाये, मुझे वहां अवश्य पहुँचना है। यहाँ पर कार्य समाप्त होने पर और अपनी पत्नी के सुरक्षित घर पहुँचने का प्रबंध कर, जब मैं अपने कार्यालय पहुंचा तो मुझे एम बी ए में अपने चयन का समाचार मिला। स्वीकृति देने के लिए तीन दिन का समय था। अगले दिन जब हम गुरूजी के दर्शन के लिए गये और मैंने यह समाचार गुरूजी को दिया (मेरा भ्रम जैसे कोई सर्वज्ञाता को कोई नवीन समाचार दे सकता है!), तो मुस्करा कर वह बोले, "फिर ते कल्याण हो गया।" मैंने सोचा, "मैंने तो गुरूजी को अपने चयन की बात बताई है और वह कह रहे हैं कि मैं धन्य हो गया। यह तो प्रत्यक्ष ही है।" उस समय गुरूजी के तात्पर्य से हम अनभिज्ञ थे। इस रहस्योद्घाटन के लिए अभी कुछ और दिन का समय शेष था।

मैंने गुड़गाँव में एम बी ए संस्था में प्रवेश कर लिया। प्रथम सत्र के बाद मैं घर गया। उसी संध्या को हम दर्शन के लिए गये। लौटते हुए मेरी पत्नी ने गर्भ परीक्षण उपकरण खरीदने को कहा। और गुरूजी के कथन का रहस्य अगले दिन प्रातः उजागर हुआ जब मेरी पत्नी ने अपना गर्भवती होने का समाचार दिया। गुरूजी की कृपा से कठिन परिस्थितियों में की गयी अंतिम चेष्टा सफल हुई थी। हम दोनों हर्ष से विह्वल और कृतज्ञ थे। चक्षुओं में अश्रु भरे हम दोनों बहुत देर तक गुरूजी के चित्र का चुम्बन लेते रहे। हम उसी सांझ को गुरूजी के पास गये और उनके चरण कमल छू कर जैसे ही मैंने उन्हें यह सूचना देने के लिए अपना मुख खोलना चाहा (एक बार पुनः सर्वज्ञाता को बताने की भूल), उन्होंने मुझे चुप रहने का संकेत दिया और बोले, "मैंनु पता है।"

मेरी अनुपस्थिति होते हुए भी मेरी पत्नी का गर्भकाल सहजतापूर्वक बीत गया। उसी अवधि में उसे महाविद्यालय परिसर में ही घर मिल गया जिससे प्रतिदिन यात्रा करने के कष्ट से भी मुक्ति मिल गयी। उसने 31 जनवरी 2001 को पुत्र को जन्म दिया। शिशु के 40 दिन पूर्ण होने पर हम उसे गुरूजी का आशीर्वाद दिलाने उनके पास ले गये। उस दिन आज्ञा लेते समय गुरूजी मेरी पत्नी को बोले, "पूनम आंटी, होर मुंडा लैना है?" मेरी पत्नी को एकाएक अत्याधिक अचम्भा हुआ पर वह कुछ नहीं बोली। उसके बाद गुरूजी हर दर्शन के समय मेरी पत्नी से यह पुनारोक्ति करते रहे। वह कभी उत्तर तो नहीं देती थी पर अचरज सदा रहता था कि इतने छोटे शिशु के साथ कैसे पुनः उस पूरी प्रक्रिया को दोहरा पाएंगे। उसके अनुसार गुरूजी परिहास कर रहे थे।

जून 2001 में मेरा एम बी ए पूरा होने पर, मेरा स्थानान्तरण राजबंध (पश्चिम बंगाल में दुर्गापुर के निकट) हो गया। छोटे शिशु एवं दिल्ली में अन्य उत्तरदायित्वों के कारण मेरे लिए इस समय बाहर जाना असंभव था। मैंने अपने कार्यालय में अपने वरिष्ट अधिकारियों से अनेक अनुनय विनय करी पर कोई सहायता करने को उद्यत नहीं था। सबकी उदासीनता देख कर अंत में मैंने दिल्ली में अपने परिवार के लिए सब प्रबंध कर, जाने का मन बना लिया था। उस संध्या को हम गुरूजी के दर्शन के लिए गये। उसी दिन सबसे वरिष्ट अधिकारी, जिनको मैंने स्थानांतरण रोकने की विनती करी थी, ने मना कर दिया था। उस दिन भी गुरूजी ने मेरी पत्नी को देख कर अपना वही प्रश्न दोहराया, "पूनम आंटी, होर मुंडा लैना है?" मेरी पत्नी ने तत्काल उत्तर दिया, "यदि मेरे पति विस्थापित हो कर चले गये तो मुझे पुत्र कहाँ से मिलेगा।" गुरूजी मुस्करा कर बोले कि यह तो वास्तव में तकनीकी समस्या है और वह मेरा स्थानान्तरण रद्द कर देंगे। हम उनके चरण कमल स्पर्श कर घर आ गये। दो दिन के पश्चात् मेरे एक वरिष्ट ने फ़ोन किया और बोले, "तुम अपनी समस्याओं के कारण न जाने की बात करते रहे हो। तुमे एक आवेदन पत्र लिख कर मुझे भेज क्यों नहीं देते? मैं देखता हूँ कि क्या हो सकता है।" मुझे उनके मन में इस विचार की उत्पत्ति के कारण का पता था। उसके पश्चात् गुरूजी के जन्मदिवस, 7 जुलाई 2001 से मैंने पुनः कार्यालय में काम प्रारंभ कर दिया। तब मैं दिल्ली दो वर्ष और रहा।

गुरूजी उसके बाद भी मेरी पत्नी से निरंतर वही प्रश्न करते रहे। अप्रैल 2002 में एक संध्या मेरी पत्नी ने उत्तर दिया, "जैसी आपकी इच्छा।" अगले दिन ही गर्भ परीक्षण के सफल परिणाम निकले। इस बार यह बिना किसी चिकित्सा पद्धति के संभव हुआ था। गर्भकाल की अवधि में एक बार मेरी पत्नी ने मुझसे कहा कि इस बार कन्या होनी चाहिए और गुरूजी से इस बारे में निवेदन करेगी। अगले दर्शन के समय वह गुरूजी के चरण स्पर्श करते समय कहने ही वाली थी कि गुरूजी पहले बोले, "पहली वार मुंडया, ते दूजी वार वी मुंडया।" उसे अपना उत्तर मिल गया था और उसने 01 दिसंबर 2002 को पुनः पुत्र को जन्म दिया। गुरूजी ने दुसरे पुत्र का नामकरण इशुक किया।

हमारी दूसरी संतानोत्पत्ति के बाद एक दिन गुरूजी ने एक दिन मेरी पत्नी से प्रश्न किया कि क्या वह पी एच डी करने का विचार कर रही है। उसने उत्तर दिया कि दो बच्चों के साथ पठन पाठन का कार्य अति कठिन है। गुरूजी ने अपना सुझाव दोहराया और बोले, "पता है, पी एच डी दा कि मतलव होंदा है - पागल होने दा डर।"

इस सुझाव का कारण हमें देर में तब जाकर स्पष्ट हुआ जब मेरा स्थानान्तरण मुंबई हो गया। मेरी पत्नी मेरे साथ पी एच डी आरम्भ कर लंबा अवकाश लेने की अवस्था में ही मेरे साथ रह सकती थी। अपने अंतरण पत्र लेकर मैं गुरूजी का आशीष लेने गया और उन्हें अपने स्थानान्तरण के बारे में बताया। उन्होंने मुझे जाने की आज्ञा दे दी। प्रथम वर्ष मैं मुंबई में परिवार रहित रहा। इस अवधि में कुछ बार हम गुरूजी के दर्शन के लिए आये। एक ऐसे ही अवसर पर गुरूजी ने कहा कि मैं अपने परिवार को साथ ले जाऊं, नहीं तो वह एक और पुत्र दे देंगे। हमें सन्देश मिल गया और मेरी पत्नी ने पी एच डी के लिए आवेदन दे दिया। गुरूजी की दया से बहुत कम समयावधि में सब औपचारिकताएं भी पूर्ण हो गईं। फलस्वरूप मेरा परिवार मुंबई आ गया।

यहाँ पर यह बताना अनुपयुक्त नहीं होगा कि मेरे पिता के एक मित्र, जो एक निपुण ज्योतिषी भी हैं, ने मुझे बताया था कि मेरी पहली संतान 41 वर्ष की आयु में होगी। उनकी भविष्यवाणी के अनुसार मुझे दो कन्याओं के बाद ही पुत्र प्राप्ति होगी। इनसे ज्योतिष में संभवतः कभी गलती नहीं हुई थी। मैंने जब उनसे प्रश्न किया कि कैसे गुरूजी के आशीर्वाद से हमें पहली संतान मेरी 37 वर्ष की आयु में हुई और दूसरी 39 वर्ष की, और वह कैसे चूक कर गये। उन्होंने उत्तर दिया कि ईश्वर द्वारा लिखा हुआ भाग्य ही ज्योतिष से पता लगता है; किन्तु गुरूजी जैसे महापुरुष, जो मानव रूप में परम पिता हैं, भाग्य पुनः लिखने की क्षमता रखते हैं। अतः इसमें कोई शंका नहीं होने चाहिए कि हमारे प्रारब्ध कर्म को बदलने वाले स्वयं भगवान के अतिरिक्त कोई और नहीं हो सकते।

दुर्घटना से रक्षा

सितम्बर 1999 में हम अपने वाहन में शिमला गये थे। अपनी दिवास्वप्न की आदत के कारण मैं कभी भी अच्छा चालक नहीं रहा हूँ। शिमला से लौटते हुए हमने रात चंडीगढ़ में बिताई। अगले दिन प्रातः हमें चंडीगढ़ से निकलने में देर हो गई थी और यह बात मुझे नहीं भा रही थी, अतः मैं आवश्यकता से अधिक तीव्र गति से चल रहा था।

अम्बाला और करनाल के मध्य यातयात अवरोध था। हमारे आगे एक माटी प्रवर्तक जा रहा था और हमारे पीछे भी बहुत गाड़ियां थीं। मैं आगे जाने को आतुर था परन्तु प्रवर्तक के विशाल आकार के कारण आगे की दृष्टि अवरुद्ध थी और मार्ग के दूसरी तरफ का भाग निर्माण कार्य के लिए बंद था। अतः दोनों भाग का यातायात इसी तरफ से आ रहा था। मेरी पत्नी मेरे साथ ही अपने नेत्र बंद कर, अपने छोटे से वाकमैन पर शबद सुनती हुई, आगे बैठी हुई थी।

वह प्रवर्तक अत्यंत धीमी गति से जा रहा था। काफी देर उसके पीछे धीमी गति में उसके पीछे चलते रहने के कारण मैं अपना संयम खो बैठा और मैंने अपनी कार की गति बढ़ा कर उससे आगे निकलने की चेष्टा करी। जैसे ही मैं उसके समानांतर पहुंचा, मुझे सामने से आता हुआ यातायात दिखाई दिया। सामने से अत्यंत तीव्र गति से एक और प्रवर्तक हमारी दिशा में भागा चला आ रहा था। उसमें और हमारी कार में कुछ मीटर की दूरी शेष थी और दोनों प्रवर्तकों के आगे के हिस्से में कुछ इंचों का अंतर था।

कार के आते हुए प्रवर्तक से चीथड़े उड़ते हुए के विचार और दोनों के कर्मचारियों का चिल्लाना सुन कर मेरे शरीर में कंपकंपी छूट गयी। मेरी पत्नी ने अपनी आँखें खोलीं, मुझे देखा और हम दोनों गुरूजी को याद करने के अतिरिक्त और कुछ नहीं सूझा। एकदम मुझे अपनी दाहिनी ओर मार्ग के बीच में बने हुए विभाजक में एक टूटी हुई दीवार दिखाई दी और मैंने अपनी कार तेजी से उस दिशा में घुमा दी। गुरूजी के अतिरिक्त और कौन हमें इस प्रकार से जीवन दान दे सकता था?

फरवरी 2000 में, मैं रात्रि से प्रातः तक की पाली में विमानपतन पर कार्यरत था। उस समय मैं एक बोईंग 707, जिसमें ईंधन भरना था देखने गया। मैंने देखा कि एक भू यंत्रविद वायुयान का पल्ला खुला छोड़ कर उस पर कार्यरत था। हमारे कर्मचारी एक किनारे खड़े हुए उसका कार्य समाप्त होने की प्रतीक्षा कर रहे थे। प्रश्न करने पर उसने उत्तर दिया कि अभी बहुत कार्य शेष था और वह अकेला ही था। इंजन के पल्ले को सुरक्षित रखने वाली भुजा भी काम नहीं कर रही थी और उसे वह सीढ़ी पर टिका कर रखे हुआ था। मैंने उसकी बात सुन कर उससे ईंधन भरवाने का कार्य प्रारंभ करवा कर अपना कार्य करते रहने की विनती करी। उसने मान लिया और कहा कि हम ईंधन भरक यंत्र पर पहुंचे और वह भी शीघ्र वहां पहुँच जाएगा।

जैसे ही मैं वहां पर मुड़ा, उसने मेरे से अदृष्ट सीढ़ी पर अपनी मुद्रा बदली और उसी समय वह सीढ़ी पर अटका कर रखा हुआ पल्ला नीचे गिरने लगा। मेरी दृष्टि अत्यंत तीव्र गति से गिरते हुए पल्ले पर पड़ी और मैंने तुरन्त गुरूजी को याद किया। पल्ला जोर से मेरे मस्तक पर आ कर लगा और वहां से रक्त स्त्राव होने लगा।

मैं चेतन अवस्था में था। मुझे विमानपतन पर चिकित्सक के पास ले जाया गया तो उसने कहा कि ईश्वर ने मेरी रक्षा करी है; एक सेंटीमीटर भी ऊपर या नीचे चोट लगने पर वह घातक होती। इस बार भी मुझे पता था कि कौन से ईश्वर ने मेरी रक्षा करी है।

जलमग्न मुंबई में

26 जुलाई 2005 को, जब मुंबई जल प्लावित हुई मैं कार्यालय मैं था। कुछ कर्मचारी रेल सुविधाओं के अस्त-व्यस्त होने के भय से पहले निकल गये थे। चूंकि मुझे कार्य समाप्त करना था, मैं प्रतिदिन की भांति बाहर निकला। उस समय तक जो कर्मचारी पहले निकले थे लौटने लगे क्योंकि रेल सेवाएँ बंद हो चुकी थीं।

उस दिन मैंने कार से यात्रा करी थी। मैं दुविधा में था कि रुकूँ या घर पहुँचने का प्रयास करूँ? उसी समय एक सहकर्मी ने कहा कि उनका पुत्र अपने विद्यालय, जो घर के मार्ग में था, में रुका हुआ है और उसे लेना है। यह बात सुनकर मैंने निर्णय ले लिया। मैंने गुरूजी को याद किया और हम उस विद्यालय के लिए निकल पड़े। जैसे ही हमने बाहर निकलने का प्रयास किया, कार्यालय के एक बंद द्वार के सामने एक कार दुरावस्था में रुकी हुई थी। हम दूसरे द्वार से बाहर निकले। सब मार्ग जलमग्न थे और वाहन चलाना बहुत कठिन हो रहा था। पूरी राह जल और अवरुद्ध यातायात की चुनौतियों का सामना करते हम दो घंटे में उस विद्यालय तक पहुँच सके।

क्योंकि विद्यालय की बसें बंद थीं, सब विद्यार्थियों को वहीं पर रात्रि में रोकने की योजना बनायी जा चुकी थी। चूंकि मेरे सहकर्मी का पुत्र अपने सहपाठियों के साथ प्रसन्न था और हमारा घर तक पहुंचना अनिश्चित था, उन्होंने उसके वहीँ पर रहने का अनुमोदन कर दिया। हम दोनों ने घर पहुँचने के प्रयास का निश्चय किया और चल पड़े। थोड़ी दूर जाने पर जल स्तर इतना बढ़ गया कि हमारा घर पहुँचना या कार्यालय तक लौटना असंभव था। अतः मैंने उसी ऊँचे स्थान पर जहाँ पर अपने सहकर्मी के विद्यालय में जाने पर कार खड़ी करी थी, कार खड़ी कर रात वहीं पर गुजारने का निश्चय किया। मैंने घर पर समाचार दे दिया कि घर पहुंचना संभव नहीं है।

हमने रात्रि कार में ही बिताई। अगले दिन जैसे जैसे जलस्तर कम होता गया मैं धीमे धीमे कार चला कर सांझ तक घर पहुंचा। घर पहुँचने पर पता लगा कि वहां पर सब कारें पानी में डूब कर ऐसी अवस्था में हो गईं थीं कि अत्यधिक धन व्यय करने पर ही उनका जीर्णोद्धार संभव था। यही दशा कार्यालय में खड़ी हुई कारों की भी हुई थी।

समाचारों में इस घटना की चर्चा करते हुए यह भी बताया गया कि अधिक जलस्तर और यातायात रुके होने के कारण, कई को राह में रात के लिए रुक कर अपने वाहनों में सोना पड़ा। जल के और बढ़ने पर जो अपनी कारों के द्वार या खिड़कियाँ खोल कर बाहर नहीं आ सके उनकी मृत्यु हो गयी। परन्तु न मुझे, न ही कार को कोई हानि हुई। यह सब इस कारण कि चलने से पहले मैंने गुरूजी को याद कर लिया था। केवल गुरूजी की कृपा मुझे उस रात बचा सकती थी और वह बनी रही।

महासमाधि के बाद भी उनकी कृपा है

फरवरी 2007 में, जब मैं दिल्ली आया था, गुरूजी के दर्शन के लिए गया था। जब मैं उनसे आज्ञा लेने के लिए झुका, वह बोले, "तू दिल्ली वापस आ गया हैं?" मैंने उत्तर दिया, "नहीं गुरूजी, हल्ले ते बॉम्बे ही हूँ।" गुरूजी ने एक और भक्त की और इशारा किया कि वह उससे पूछ रहे थे। पर यह मेरे लिए सन्देश था; यह समझ गया था कि गुरूजी किस प्रकार अपने भक्तों की इच्छा पूर्ति करते हैं। मार्च 2007 के अंत तक दिल्ली के लिए स्थानान्तरण आदेश आ गये। एक मास पश्चात् मैंने दिल्ली कार्यालय में कार्य करना प्रारंभ कर दिया और 26 मई को मेरा परिवार भी दिल्ली आ गया। सौभाग्य से एक दिन पश्चात् उनके दर्शन भी हो गये।

31 मई को उनके शरीर छोड़ने के निर्णय को सुन कर मैं ध्वस्त हो गया। बड़े मंदिर से लौटते हुए मेरे मन में अनेक विचार उभर रहे थे - ऐसे कई अवसर थे जब गुरूजी ने हमें धन्य किया था और अनेक अवसरों पर हमें वह दिया था जिसके हम योग्य नहीं थे। अब क्या होगा? अब कौन हमारा ध्यान रखेगा? यद्यपि इन प्रश्नों का मेरे पास कोई उत्तर नहीं था; किन्तु जिन्होंने सदा हमारी आवश्यकताओं, शंकाओं और प्रार्थनाओं का उत्तर दिया था, उनके पास इसका भी समाधान है, यह मुझे कुछ दिनों में पता लगने वाला था।

वर्ष 2005 से मैं अंतर - निगम उद्यम प्रतियोगिता (अन्तर-कॉर्पोरेट बिज़नेस कम्पटीशन) में भाग लेता रहा था। इस वर्ष 2007 में, क्षेत्रीय प्रतियोगिता दिल्ली में 1 - 2 जून को आयोजित थी।

गुरूजी की महासमाधि के उपरांत, मुझे प्रतीत हुआ कि मैं अपना सर्वस्व नहीं दे पाऊंगा। मैंने अपने साथियों को फोन पर कहा कि मैं अत्याधिक क्षीण हो रहा हूँ और वह मेरे ऊपर निर्भर न रहें। मेरे एक साथी ने मुझे सांत्वना दी - गुरु अपने शिष्यों को कभी नहीं छोड़ते, शरीर त्यागने के बाद भी नहीं। शोकसंतप्त होने के कारण मैंने उस पर विश्वास नहीं किया।

जैसे तैसे हमारा दल प्रथम चार दौर पार कर गया। अंतिम चक्र में हमने कुछ विपत्ति पूर्ण निर्णय लिए, जिससे हम अंतिम निर्णायक चरण में प्रवेश कर सकें। परिणाम घोषित हुए तो उनमें हमारा नाम नहीं था। मैंने अपनी जेब से गुरूजी का चित्र निकाला और कह पड़ा, "अब इसी की आशा थी। आपके रहते हुए बात कुछ और ही थी।" जैसे मैं गुरूजी का मुस्कराहट भरा मुख देख रहा था, मेरे एक साथी ने आकर बताया कि हमारे उत्तर कम्पयूटर में ठीक से नहीं डाले गये हैं। हमने आयोजकों को जाकर उनकी अशुद्धि बतायी। संशोधन के पश्चात् हम अंतिम चरण में पहुँच गये। उसके बाद हमने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। 6 जून 2007 को राष्ट्रीय प्रतियोगिता में हम द्वितीय स्थान पर रहे और तत्पश्चात सितम्बर में आयोजित एशिया - पेसिफिक प्रतियोगीता में भी द्वितीय स्थान प्राप्त किया। गुरूजी ने हमें बता दिया था कि उनकी दया अब भी उनकी संगत के साथ हैं।

हम अपने दोनों बच्चों को अच्छे विद्यालय में प्रवेश कराने को उत्सुक थे। यद्यपि हम विभिन्न सूत्रों के द्वारा प्रयास कर रहे थे पर उसमे कोई सफलता नहीं मिल रही थी। अंत में मैंने गुरूजी से प्रश्न किया, "आपने दो पुत्र दिये हैं तो इनको अच्छे विद्यालय में प्रवेश क्यों नहीं दिला देते?" इसका उत्तर मुझे अतिशीघ्र मिला। दोनों बच्चों को दिल्ली के सबसे अच्छे विद्यालयों में से एक में, बिना किसी दान या राजनैतिक सूत्र के, प्रवेश मिल गया।

जब हम दिल्ली पहुंचे तो हमारे पास कोई ऐसा निवास नहीं था जहाँ से मेरी पत्नी और मैं अपने काम-काज और दोनों बच्चों, जो अब 6 और 4 वर्ष के थे, की देखभाल कर सकें। इस समस्या का एकमात्र समाधान यही था कि मेरी पत्नी को महाविद्यालय परिसर में ही घर मिल जाये। पर कोई भी निवासी सेवानिवृत होनेवाला नहीं था और वहां पर घर वरीयता के आधार पर मिलते थे। इस बार भी हमारी इच्छानुसार चमत्कार हुआ। एक शिक्षक, जिनके पुत्र को अपने विद्यालय दूर होने के कारण कठिनाई का सामना करना पड़ता था, ने अपना घर खाली कर दिया। आश्चर्यजनक रूप से वरीयता में उच्च किसी ने उस घर के लिए आवेदन नहीं दिया। अतः मेरी पत्नी को वह घर मिल गया। गुरूजी के अन्यथा और कौन संगत के सदस्यों की सुविधानुसार ऐसे चमत्कार कर सकता है?

मैंने परम पिता गुरूजी के साथ अपने अनुभवों को बहुत सारांश में लिखा है। मैं यह हार्दिक कृतज्ञता और आदर से यहीं समाप्त करता हूँ। ॐ श्री गुरु देवाय नमः। प्रार्थना है कि गुरूजी सदा हमारे और सब भक्तों पर सुख, सौभाग्य और सुबुद्धि की वृष्टि करते रहें और हम सदा उनके भक्त होने के योग्य बने रहें। जय गुरूजी!

आकाश सेठी, दिल्ली

मार्च 2008